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जल संशोधन की नई विधि विकसित करने में सफलता पायी वैज्ञानिकों ने

जल संशोधन की नई विधि विकसित करने में सफलता पायी वैज्ञानिकों ने
  • पानी साफ करने की यह नई तकनीक बहुत काम की

  • अंतरिक्ष में भी खेती के लायक मिट्टी बनायेगा

  • पृथ्वी पर अनेक जगह मौजूद है अशुद्ध जल

  • एक ही बार में साफ हो जाता है सारा पानी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः जल संशोधन की आवश्यकता दुनिया के अनेक इलाकों में महसूस की जाती रही है।

खास तौर पर कम विकसित देशों में पानी की अशुद्धि से होने वाली बीमारियों की वजह से

भी अनेक लोग न सिर्फ बीमार पड़ते हैं बल्कि मरते भी हैं। अब पानी की इसी अशुद्धि को

दूर करने की नई विधि विकसित की गयी है। जल संशोधन की इस विधि के बारे में

वैज्ञानिक मान रहे हैं कि यह तकनीक सिर्फ पृथ्वी पर ही नहीं बल्कि अंतरिक्ष अभियान में

भी काम आने वाली है। इसके जरिए अंतरिक्ष में जहां पानी मिट्टी में मिला हुआ है, वहां से

भी पानी एकत्रित किया जा सकता है। हो सकता है कि इस तकनीक की मदद से मंगल ग्रह

पर खेती के लायक जमीन और पानी दोनों उपलब्ध कराया जा सके। दरअसल इस विधि

से जल संशोधन किये जाने की वजह से हानिकारक रसायन अलग होकर शुद्ध जल प्राप्त

होता है। रिवर साइड के यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के वैज्ञानिकों ने इस तकनीक को

तैयार किया है। इस तकनीक में एक उप्रेरक का इस्तेमाल कर जल संशोधन का काम होता

है। धरती पर अनेक स्थानों पर विभिन्न कारणों से जिस पानी में हानिकारक रसायन मिल

गये हैं, उन्हें भी यह अलग कर साफ पानी उपलब्ध कराने की क्षमता रखता है। पानी साफ

करने के लिए शोध दल ने परक्लोरेट नामक रसायन का उपयोग किया है। यह प्राकृतिक

तौर पर यहां और मंगल ग्रह की मिट्टी में उपलब्ध है। इसकी रासायनिक संरचना के बारे में

यह बताया गया है कि इसमें क्लोरिन का एक अणु ऑक्सीजन के चार अणुओं के साथ

जुड़ा हुआ रहता है। यह स्वाभाविक तौर पर ऑक्सीडाइजर भी है।

जल संशोधन की आवश्यकता गरीब देशों में भी है

अंतरिक्ष अभियानों के लिए भी इस रसायन का उपयोग होता है। कुछ कीटनाशकों और

उर्वरकों के उत्पादन में भी यह सह उत्पाद के तौर पर तैयार होता है। इसी की मदद से यह

काम किया जाना संभव हो पाया है। इस रसायन की मौजूदगी की वजह से ही पानी अशुद्ध

हो जाता है। ऐसे जल के सेवन से थाइरॉयड की बीमारी होती है। रसायनशास्त्र के मुताबिक

क्लोरिन का अणु खुद कोई नुकसान नहीं पहुंचाता लेकिन ऑक्सीकृत होने के बाद यह

हानिकारक बन जाता है। वर्तमान में इस परक्लोरेट को पानी से अलग करने की विधि

काफी पेचिदगी पूर्ण है। लेकिन इसे ही अलग करने की सरल विधि विकसित करने में

वैज्ञानिकों ने सफलता पायी है। आम तौर पर इसके संपर्क से उपजे अनाज भी किसी न

किसी रुप में नुकसानदायक बन जाते हैं। इसके लिए शोध दल ने प्रकृति का अध्ययन कर

प्राकृतिक तकनीक को भी आजमाया है। इसकी मदद से एक बार में यह सारी अशुद्धि दूर

हो जाती है। प्राकृतिक तौर पर यह पाया गया है कि मॉलिबडेनूम में मौजूद सुक्ष्माणु अपने

एंजाइनों की मदद से इस परक्लोरेट को कम कर सकते हैं। पूर्व में इस विधि को आजमाने

की कोशिशों में सफलता नहीं मिली थी। दूसरी तरफ दूसरे धातव उत्प्रेरक पानी के साथ

काम भी नहीं करते हैं। इसे सफल बनाने के लिए शोधकर्ताओं ने एक सामान्य उर्वरक

सोडियम मोलिमडेट का प्रयोग किया। इसकी रासायनिक प्रक्रिया को भी शोध दल ने

स्पष्ट किया है। इस पूरी लेकिन सरल प्रक्रिया की वजह से परक्लोरेट बड़ी आसानी से और

एक ही बार में पानी से अलग हो गया है। सामान्य तापमान पर भी यह तकनीक सही

तरीके से काम करता है। यानी इसे आजमाने के लिए अतिरिक्त किसी और इंतजाम की

आवश्यकता नही पड़ती है।

अंतरिक्ष अभियान और मंगल में खेती के काम आयेगी तकनीक

मंगल ग्रह के संदर्भ में वैज्ञानिकों ने बताया है कि वहां की मिट्टी में भी यह प्रचुरता में

मौजूद है। इसके प्रयोग से जब 99.99 प्रतिशत जल शुद्ध हो जाता है तो इसी विधि से मंगल

ग्रह की मिट्टी से भी हानिकारक रसायन अलग कर वहां की मिट्टी को शुद्ध पानी भंडारण

और खेती के लायक बनाया जा सकता है। वैज्ञानिक अनुसंधान में यह पाया गया है कि

प्रति लीटर में एक मिलीग्राम से यह काम किया जा सकता है। इससे धरती पर मौजूद गंदा

पानी साफ हो जाएगा। लेकिन वैज्ञानिक अंतरिक्ष जाने वाले रॉकेटों के ईंधन में इस्तेमाल

होने वाले इस रसायन की अल्प मात्रा से वहां भी शुद्ध जल उपलब्ध कराने की विधि के

सफल होने की उम्मीद करते हैं। वैसे पहले ही मंगल ग्रह पर कृत्रिम तकनीक की मदद से

सांस लेने लायक ऑक्सीजन पैदा करने पहले ही सफलता मिल चुकी है। इस वजह से

पृथ्वी के अलावा कहीं और भी जीवन बसाने की सोच पर काम कर रहे वैज्ञानिकों के लिए

भी यह विधि कारगर साबित होगी, ऐसा शोध दल का मानना है।

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