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पृथ्वी के बाहर भी सौर मंडल में पानी के होने का पता चला




  • वैज्ञानिकों ने के 2 18 बी में जल होने की बात कही
  • हब्बल टेलीस्कोप के आंकड़ों से मिली जानकारी
  • कैप्लर स्पेसक्राफ्ट ने की थी इस तारे की खोज
  • तरल अवस्था में पानी से वैज्ञानिकों की रूचि बढ़ी
प्रतिनिधि

नयीदिल्लीः पृथ्वी के बाहर भी पानी है, इसका पता पहले से ही था। कई ग्रहों में यह पानी बर्फ की शक्ल में है।

लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसे तारे का पता लगाया है, जो हमारे सौर मंडल से बाहर है।

के 2-18 बी नामक इस तारे में भी पानी होने के प्रमाण मिले हैं।

पृथ्वी से आकार में आठ गुणा अधिक बड़ा यह तारा शायद इंसानी जीवन के लायक भी है।

इस बारे में पहली बार नेचर एस्ट्रोनॉमी नामक पत्रिका में जानकारी दी गयी है।

इस नई खोज के बारे में बताया गया है कि यह पृथ्वी से करीब 110 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है।

इसका स्थान सुदूर आकाश में लियो कॉंस्टेलेशन के पास है।

वैज्ञानिक इस खोज से खुश है कि वहां पानी अपनी स्वाभाविक तरल अवस्था में ही है।

इसलिए वहां जीवन के होने की भी उम्मीद है। इससे पहले अनेक ग्रहों पर पानी होने का पता तो चल गया था लेकिन सभी में यह पानी जमी हुई बर्फ की अवस्था में ही है।

अत्यधिक ठंड की वजह से इन ग्रहों का पानी जमकर बर्फ हो गया है।

कुछ में यह सतह पर नहीं होने के बाद भी अंदर की गहरी खाइयों में बर्फ बनकर मौजूद है।

यह पहला तारा है, जहां पानी तरल अवस्था में होने के संकेत मिले हैं।

वैज्ञानिकों ने साफ कर दिया कि वहां का माहौल पृथ्वी जैसा नहीं

वैसे इन बातों की जानकारी देते हुए वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कर दिया है कि वहां का वातावरण शायद पृथ्वी के जैसा बिल्कुल भी नहीं है।

वहां का सारा माहौल पृथ्वी से भिन्न है।

लेकिन पानी होने की वजह से वहां जीवन होने की उम्मीद से इंकार नहीं किया जा सकता है।

यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के वैज्ञानिक और इस शोध प्रबंध के प्रथम लेखक एंजेलोस टिसारस ने कहा है कि वहां का वातावरण पृथ्वी के मुकाबले काफी भारी हो सकता है।

इस वजह से वहां का कुछ भी पृथ्वी के जैसा तो कतई नहीं होगा।

इस तारे पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों के दल ने पिछले दो वर्ष के आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया।

यह आंकड़े नासा के हब्बल टेलीस्कोप से उपलब्ध हुए थे।

उसके आधार पर जब आंकड़ों की वैज्ञानिक गणना की गयी तो वहां पानी की मौजूदगी का पता चला।

विश्लेषण के मुताबिक वहां के वातावरण में हाइड्रोजन और हिलियम भी है।

वैज्ञानिक मानते हैं कि वहां नाइट्रोजन और मिथेन भी हो सकते हैं लेकिन वर्तमान आंकड़ों से उनका कोई पता नहीं चल पाया है।

पृथ्वी के बाहर पानी वाले इस तारे की खोज 2015 में हुई थी

अब वहां पानी का पता चलने के बाद वैज्ञानिकों का दल वहां के बादलों का आकलन करना चाहता है।




ताकि यह भी पता चल सके कि तारे में मौजूद पानी का कितना हिस्सा भाप बनकर आसमान पर तैर रहा है।

वैसे एक मृत प्राय तारा होने की वजह से उसकी सारी परिस्थितियां पृथ्वी से अलग होंगी।

वैज्ञानिक मानते हैं कि वहां के माहौल पर विकिरण का बहुत ज्यादा प्रभाव है।

ऐसे में वहां के हर कुछ विकिरण के प्रभाव में बदल चुका होगा।

इस तारे की खोज पहली बार वर्ष 2015 में हुई थी। तब से लगातार इस पर नजर रखी जा रही थी।

उसके बारे में आंकड़ों को एकत्रित किया जा रहा था। इसे नासा के केप्लर स्पेसक्राफ्ट ने पहली बार खोजा था।

इस बारे में सह वैज्ञानिक इंगो वाल्डमैन कहते हैं कि यूं तो यह आम ड्वार्फ तारा के जैसा ही है।

लेकिन इस बारे में सबसे प्रमुख भिन्नता इसमें पानी की मौजूदगी है।

वहां तरल अवस्था में पानी मौजूद क्यों है, यह बड़ा सवाल भी अंतरिक्ष के

कई अनसुलझी गुत्थियों के राज खोल सकता है।

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