मौसम में बदलाव की खतरनाक चेतावनी, अटलांटिक का जल प्रवाह घटा

आगे मिलेगी कड़ाके की ठंड और उल्टा मौसम

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  • बढ़ जाएगा समुद्र का जलस्तर 
  • समुद्री जीवन पर भी मंडरा रहा खतरा
  • आयेंगे बड़े तूफान और बवंडर
प्रतिनिधि
नईदिल्ली : अटलांटिक महासागर में जल का प्रवाह कम हो गया है।
यह प्रवाह पिछले एक हजार साल में इतना कम कभी नहीं हुआ था।
इससे मौसम में होने वाले बदलाव के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस समुद्री जल प्रवाह के बाधित होने की वजह से आने वाले वर्षों में जाड़े का मौसम और कष्टदायक होगा।
इसके अलावा मौसम भी पहले की भांति आचरण नहीं करेगा। कभी भी बेमौसम माहौल बिगड़ सकता है।
यह सब कुछ पृथ्वी के निरंतर गर्म होने की वजह से यानी ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हो रहा है।
नेचर नामक पत्रिका में प्रकाशित एक वैज्ञानिक शोध प्रबंध में यह बताया गया है कि समुद्रों के बीच जल के
प्रवाह का कम हो जाना खतरे की घंटी है।
आम तौर पर दूसरे समुद्र का पानी गर्म होकर समुद्र के सतह पर आता है।
अभी स्थिति यह है कि अटलांटिक में ग्लेशियरों के गलने से बना ठंडा पानी इसे ऊपर आने से रोक रहा है।
इससे मौसम का बदलना तय है। समुद्र में यह जल प्रवाह पहले से ही तय है।
यह गर्म अवस्था में आर्कटिक की तरफ भागता है जबकि ठंडा होने पर नीचे चला जाता है।
इस बार ऐसा नहीं हो पा रहा है। जल का यह प्रवाह पिछले एक हजार वर्षों में सबसे कम है।
इससे समुद्र के अंदर के जीवन पर भी खतरा मंडरा रहा है।
शोध से पता चला है कि ग्रीनलैंड और उत्तरी ध्रुब के आस-पास के समुद्र समुद्री जल के इस प्रवाह की गति धीमी कर रहे हैं।
इससे पृथ्वी के मौसम में बदलाव होना तय है। वैज्ञानिक निष्कर्ष यह है कि अत्यंत कष्टदायक सर्दी के अलावा समुद्री
जल स्तर में भी अचानक बढ़ोत्तरी से कई इलाकों में डूब का खतरा बढ़ता ही जा रहा है।
वैज्ञानिक यह भी मान रहे हैं कि इसी वजह से दुनिया के अनेक इलाकों में अत्यंत खतरनाक किस्म के अंधड़ या साइक्लोन भी पैदा हो सकते हैं।
अभी जल प्रवाह की स्थिति को वैज्ञानिकों ने रेंगने की श्रेणी में डाला है।
समुद्र में जल के प्रवाह की गति अत्यंत धीमी होने की वजह से समुद्र में भाप का बनना भी प्रभावित हो सकता है।
इससे भी पृथ्वी का स्थापित मौसम बदलने की पूरी आशंका है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि गर्म पानी ज्यादा तरल और
तेजी से प्रवाह करने वाला होता है।
दूसरी तरफ ग्लेशियरों के पिघलने से बना जल घना और धीमी गति का होता है।
जल प्रवाह के बीच ठंडे जल की मात्रा बढ़ जाने की वजह से पूरे चक्र का पानी अत्यंत धीमी गति से चल रहा है।
समुद्र के अंदर इस प्रवाह के कुपरिणाम भी दिखने लगे हैं।
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