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धातु में तब्दील होते ही सुनहरे रंग का हो गया पानी


  • 11 शोध केंद्रों के पंद्रह वैज्ञानिकों ने किया अनोखा प्रयोग

  • सौर मंडल में अन्यत्र इस अवस्था में है जल

  • उच्च दबाव से उसकी आणविक संरचना बदली

  • विस्फोट से बचने के भी प्रबंध किये गये थे

राष्ट्रीय खबर

रांचीः धातु में तब्दील होना उसके लिए अपने आप में बड़ी बात थी। दरअसल पानी को बर्फ

या भाप के अलावा हमलोगों ने किसी दूसरी अवस्था में न तो देखा है और न ही इसका कोई

कल्पना की गयी थी। लेकिन वैज्ञानिकों ने उसे धातु में तब्दील करने में सफलता पा ली है।

इस शोध के सफल होने के बाद धातु में बदले इस पानी के वैज्ञानिक उपयोग के लिए उसके

गुणों को ध्यान से देखा परखा जा रहा है। पानी को धातु में बदलने के लिए उसपर

अत्यधिक दबाव का प्रभाव डालना पड़ा है । इस पूरे परीक्षण को बेस्सी 2 (बीईएसएसवाई

2) नाम दिया गया था। इस परीक्षण के बारे में नेचर पत्रिका में जानकारी दी गयी है। पानी

के बारे में हमलोगों ने पूर्व में स्कूल में पढ़ा है कि पानी बिजली का सुचालक इसलिए होता

है क्योंकि उसमें नमक के अंश होते हैं। जब उसे सुधारकर डिस्टिल वाटर बना दिया जाता

है तो वह बिजली का कुचालक बन जाता है। इस डिस्टिल्ड वाटर की अवस्था में पानी के

अंदर मौजूद अणु एक दूसरे से हाइड्रोडन की मदद से ही जुड़े होते हैं। चूंकि वे स्थिर अवस्था

में होते हैं, इसलिए वे बिजली के कुचालक बन जाते हैं। इन सारी बातों को समझते हुए ही

वैज्ञानिकों ने शोध की गाड़ी को आगे बढ़ाया था। इन स्थिर कणों को गतिमान बनाने के

लिए ही उस पर अत्यधिक दबाव का इस्तेमाल किया गया था। वैसे अंतरिक्ष विज्ञान की

खोज है कि सौरमंडल के दूसरे इलाकों में भी पानी इसी अवस्था में भी मौजूद है। इसमें

पानी के धातु बनने के बाद उसका बाहरी हिस्सा ही इस दबाव को झेलता है। ग्यारह शोध

संस्थानों के 15 वैज्ञानिकों ने मिलकर इस प्रयोग को प्रारंभ किया था।

धातु में तब्दील होने के पूर्व कई बातों पर ध्यान देना पड़ा

चूंकि अपने किस्म का यह प्रयोग अनूठा था इसलिए वैज्ञानिक भी निरंतर हर तथ्य की

बारिकी से जांच कर शोध को आगे बढ़ा रहे थे। पहले चरण में वैसे धातुओं पर शोध विधि

को आजमाया गया था, जो प्रकृति में अलकाली मेटल थे। उनमें बाहरी छोर पर मौजूद

इलेक्ट्रॉन को निकालना अपेक्षाकृत आसान काम था। लेकिन इस बात पर वैज्ञानिकों ने

पूरा ध्यान दिया था कि इस रासायनिक प्रक्रिया के दौरान विस्फोट नहीं हो जाए क्योंकि

अलकाली प्रवृत्ति के धातु और पानी का मिश्रण विस्फोट की परिस्थितियां पैदा करता है।

सोडियम जैसे धातु तो पानी में जाते ही जलना प्रारंभ कर देते हैं। इस खतरे से बचने के

लिए उन्होने दोनों को अलग रखकर यह काम किया। इस विस्फोट की आशंका को दूर

करने के लिए उन्होंने एक बूंद अलकाली मेटल पर पानी का एक बहुत ही छोटा हिस्सा

डाला था। बताते चलें कि सामान्य कमरे के तापमान में सोडियम और पोटिशियम के

मिश्रण तरल अवस्था में ही होते हैं। बेस्सी 2 के इस प्रयोग में एक उच्च शून्यता वाला चैंबर

बनाया गया था। इसमें एक तरफ से बहुत पतले छेद से वह तरल अलकाली के बूंदे गिरायी

जाती थी। टोंटी से गिरने में उसे करीब दस सेकंड लगते थे। सामने के शून्यता चैंबर में एक

सीधी रेखा से दबाव डालने का इंतजाम किया गया था। अपनी टोंटी से गिरने के पहले यह

तरल बूंद रंग बदलकर सूर्ख हो जाती थी। जैसे ही यह बूंद गिरने लगती वहां एक दूसरे

माध्यम से पानी के छोटे छोटे भाप छोड़े जाते थे, जो गिरती हुई अवस्था में मौजूद इस

अलकाली तरल के चारों तरफ एक घेरा बना लेते थे। यानी अलकाली तरल के चारों तरफ

पानी का एक मजबूत घेरा बन जाता था। लेकिन यह पानी का आवरण बहुत ही पतला

होता था।

खास उपकरणों की मदद से इसे तैयार किया गया है

इस बीच दोनों के मिश्रण से जो ठोस पदार्थ बन रहा था वह दरअसल पानी के बूंद का धातु

बनना ही था। इसमें भी मौजूद इलेक्ट्रान अन्य धातुओं के जैसा ही आचरण करते पाये गये

थे। इस बदलाव के दौरान पानी अपनी रंगहीन अवस्था को छोड़कर सुनहरे रंग का हो जाता

था। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने पूरी प्रक्रिया को खुली आंकों से देखा है। शोध दल के

अगुवा डॉ राबर्ट्स सेइडेल ने बताया कि चांदी के रंग के तरल धातु जब पानी की बूंदों का

घेरा अपने चारों तरफ बना लेते थे तो वह सुनहरे रंग का हो जाता था। बहुत कम समय के

लिए ही इस बदवा को देखा जा सकता था। अत्याधुनिक माइक्रोस्कोप की मदद से इस

प्रक्रिया और बाद के घटनाक्रों को भी वैज्ञानिको ने बड़ी सावधानी के साथ कैद किया है।

इस परीक्षण के बाद वैज्ञानिकों ने कहा है कि अन्य ग्रहों की तरह धरती पर भी धातु की

शक्ल में पानी बनाया जा सकता है और यह बदलाव देखने में सुनहरा होने के साथ साथ

सुंदर भी है।

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