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कोरोना की लड़ाई में एक ठोस सिद्धांत है माइक्रोविटा

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  • सौरमंडल में निरंतर गतिमान है अदृश्य ऊर्जा

  • ऊर्जा से ही जीवन की सृष्टि और विनाश तय

  • सकारात्मक ऊर्जा से बदल सकते हैं सब कुछ

  • आनंदमार्गी सिद्धांत पर कोरोना समाप्ति की चर्चा

रांचीः कोरोना की लड़ाई को हम कैसे जीतें, इस पर पूरी दुनिया प्रयासरत हैं। इन्हीं प्रयासों




के बीच में नया विकल्प माइक्रोविटा का सामने लाया गया है। इस सिद्धांत के बारे में डॉ

आचार्य पशुपति स्टीवन लांडू (एम डी) ने एक वैज्ञानिक शोध प्रबंध लिखा है। इसके तहत

इस किस्म की कठिन चुनौतियों के लिए ही माइक्रोविटा के सिद्धांत को प्रतिपादित किया

गया था। अब जो हालात हैं, उससे यह इंसानियत और प्रकृति के काम आ सकती है।

उन्होंने लिखा है कि आनंदमार्ग के संस्थापक श्री आनंद मूर्ति जी ( स्वर्गीय प्रभात रंजन

सरकार) ने इसके बारे में सबसे पहले बात कही थी। उन्होंने वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर

वर्ष 1986 में यह बात कही थी। इसमें बताया गया था कि पूरे सौरमंडल में अज्ञात शक्तियां

निरंतर प्रवाहमान होती हैं। वे जीवन की उत्पत्ति और दिमाग की शक्ति बढ़ाने के अलावा

रोगों को भी जन्म देती हैं। अब कोरोना की लड़ाई हमारे सामने हैं। इसके वायरस इतने

छोटे हैं कि अत्यंत शक्तिशाली माइक्रोस्कोप से ही उन्हें देखा जा सकता है। लेकिन

माइक्रोविटा के सिद्धांत के अनुसार इससे भी छोटे अंश होते हैं तो कॉस्मिक प्रकाशों के

रास्ते पूरे अंतरिक्ष में गतिशील हैं। लोगों में भला बुरा का ज्ञान का उदय होना भी इसी की

प्रतिक्रिया है।

आनंदमार्ग के संस्थापक ने पहली बार की थी चर्चा

इस बारे में जो सिद्धांत हैं, उसके मुताबिक अत्यंत सुक्ष्म किस्म के माइक्रोविटा ही आपस

में जुड़कर कार्बन के अणुओं का निर्माण करते हैं। दरअसल कार्बन का यह स्वरुप ही जीवन

का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके सकारात्मक और नकारात्मक

दोनों पहलु होते हैं। सकारात्मक माइक्रोविटा दिमाग को बेहतर बनाता है जबकि

नकारात्मक माइक्रोविटा का काम शरीर पर ध्यान देना होता है। जब शरीर पर असर

डालने वाला माइक्रोविटा अधिक शक्तिशाली और नकारात्मक सोच पैदा करने की तरफ

बढता है तो इंसान भौतिक सुख में पागल होता है। ऐसी परिस्थिति में पड़ा व्यक्ति दूसरों

के कल्याण के बारे में भी नहीं सोच पाता। उन्होंने अपने शोध प्रबंध में लिखा है कि

दरअसल यह कोरोना भी उसी नकारात्मक सोच का नतीजा है जो स्वार्थी व्यक्ति और




समूहों की सोच की वजह से पैदा हुआ है। जिन इलाकों पर यह अधिक हमला कर रहा है,

वहां की स्थिति पर भी गौर कर लेना चाहिए। अगर यह पशु वधशाला, मांसाहार की दुकान

से लेकर बड़े महानगरों तक पैर पसार चुका है तो वहां निश्चित तौर पर इस माइक्रोविटा के

लिहाज से अत्यंत क्रूरता, मौत का तांडव और आम जीवन के मूल्यों में कमी है। इनसे यह

नकारात्मक ऊर्जा फैली है जो कोरोना को आगे बढ़ा रही है।

वैज्ञानिक लेख में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि इस बात को सभी वैज्ञानिक

तौर पर जानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग का कारण मिथेन है जो खास तौर पर पिंजड़े में कैद

पशुओं से अधिक निकलता है। इसके अलावा जीवन की सुविधाओं के लिए हमलोगों ने

ईंधन का बेहिसाब खर्च किया है, उससे कार्बन की अधिकता भी गर्मी को बढ़ाने वाली

साबित हुई है। हमने अपनी भौतिक सुविधाओं के लिए जो कुछ किया है हम उसी का

कुपरिणाम भोग रहे हैं।

कोरोना की लड़ाई में हम अपने अंदर भी झांक लें

अब जब महामारी सर पर है तो हम बिना एयरकंडिशनर के भी सोने के लिए विवश हैं। उन्होंने कहा कि सौर ऊर्जा के इन अदृश्य स्रोतों से लाभ उठाने का एक ही तरीका है कि हम अपने अंदर सकारात्मक ऊर्जा का विकास करें। जैसे जैसे इस ऊर्जा का विकास होगा,मारक शक्तियों की क्षमता वैसे वैसे कम होती चली जाएगी, यही प्रकृति का नियम है।

इसके लिए इंसान को निजी स्वार्थ छोड़ समाज और पूरी

दुनिया क लिए सोचना पड़ेगा।

इस सोच की प्रक्रिया के बदलते ही ऊर्जा की जो वर्तमान गति है, वह बदल जाएगी और सब

कुछ पूर्ववत अच्छा होने लगेगा। इसमें बताया गया है कि आज से हजारों वर्ष पूर्व पतंजलि

ऋषि ने जो चिकित्सा सिद्धांत लिखे थे, उमें भी कई बातें स्पष्ट थी। इमें सामाजिक

संतुलन और व्यक्तिगत आचरण की सख्त हिदायत स्पष्ट थे। बाद में आनंदमार्ग के

संस्थापक ने इसी वैज्ञानिक सिद्धांत को आग बढ़ाया था। जिसमें इंसान को निजी लाभ से

ऊपर उठकर दुनिया के हर जीव के लिए प्यार विकसित करने की बात कही गयी थी। इसी

आधार पर जीवन चक्र में सुधार कर हम अपना, समाज और पूरी दुनिया को और बेहतर

बना सकते हैं।

(इस लेख में मुख्य लेखक अमेरिका में प्रैक्टिस करने वाले एक डॉक्टर हैं। वह आनंदमार्ग राहत टीम के अध्यक्ष भी हैं। उनके साथ लेख को बनाने में डॉ रिचर्ड गौथियर (पीएचडी, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय, डॉ सिड जॉर्डन (पीएचडी, डॉ फ्रैंस वान डेन वोभेनकैंप और आचार्य वितोमोहनामंद अवधूत शामिल हैं)।

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