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महागठबंधन का वोट ट्रांसफर सभी नेताओं की बड़ी चुनौती







  • सीटों के तालमेल के बाद भी समर्थकों पर टिकी है जान
  • अंतिम समय में हुआ है सीटों का बंटवारा
  • सभी दलों नेता अब भी सीटों के दावेदार
  • समर्थकों का सामूहिक प्रयास संदेह के घेरे में
संवाददाता

रांचीः महागठबंधन की गांठ खुलकर एक स्वरुप बन चुका है।

काफी जद्दोजहद के बाद इसमें सीटों का बंटवारा भी तय हो चुका है।

लेकिन इसके बाद भी भाजपा के जैसी ही इस महागठबंधन में भी आंतरिक चुनौतियां कम नहीं हैं।

इस बार के चुनाव में भाजपा के खिलाफ यह दल सामूहिक तौर पर मोर्चाबंदी कर पायेंगे, इसकी बहुत कम उम्मीद थी।

इसकी खास वजह सीटों की दावेदारी थी।

इस समस्या से किसी तरह दल तो उबर चुके हैं।

लेकिन प्रत्याशियों के नामों की घोषणा के बाद क्या कुछ नजारा देखने को मिलेगा, यह देखने लायक बात होगी।

इसके पहले भी कई अवसरों पर इस किस्म के चुनावी गठबंधन का सार्थक नतीजा नहीं निकला है।

हाल के दिनों में लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में भी बसपा और सपा के गठबंधन में यही खामी उभरकर सामने आयी थी।

आने वाले दिनों में इस किस्म की व्यवस्था की नई परीक्षा पश्चिम बंगाल में होने जा रही है,

जहां माकपा और कांग्रेस तृणमूल और भाजपा से अलग एक साथ चुनाव लड़ने जा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में यह देखा गया है कि आपसी तालमेल होने के बाद भी अंततः राजनीतिक दलों के वोट बैंक एक दूसरे के समर्थन में खड़े नहीं होते हैं।

इसलिए यह सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण है कि सीटों पर समझौता होने के बाद भी

क्या झारखंड के भाजपा विरोधी दल अपने अपने समर्थकों को वोट बैंक के तहत एकजुट कर पायेंगे।

महागठबंधन पर भारी पड़ सकता है नेताओं की निजी महत्वाकांक्षा

दूसरा सवाल तो उभरता नजर आ रहा है, वह पार्टियों के नेताओं की निजी महत्वाकांक्षा है।

तीनों दलों में अनेक ऐसे नेता हैं, जो टिकट नहीं मिलने की स्थिति में निर्दलीय अथवा किसी अन्य दल से भी चुनाव लड़ना चाहते हैं।

ऐसे लोगों ने अपनी राय छिपाने का कोई प्रयास तक नहीं किया है।

इसलिए चुनाव के दौरान वोट ट्रांसफर महागठबंधन में शामिल सभी दलों के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

इसके अलावा टिकट नहीं मिलने से नाराज नेता और उनके समर्थक मन से किसी अन्य प्रत्याशी के लिए

चुनाव प्रचार और वोट जुटाने का काम करेंगे, इस उम्मीद पर भी पानी फिरता नजर आ रहा है।



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