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विटामिन डी से कोरोना संकट और मौत का खतरा कम

  • बोस्टन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने किया शोध

  • अस्पताल में भर्ती कोरोना मरीजों पर हुआ यह शोध

  • विटामिन डी के अलावा जेनेटिक गड़बड़ियों पर भी खोज

  • वायरस की सक्रियता को रोक देती है सूरज की गर्मी और रोशनी

रांचीः विटामिन डी के बारे में फिर से यह बात सामने आयी है कि इसकी प्रचुरता से लोगों

में कोरोना के दौरान होने वाली परेशानी और मौत का खतरा बहुत हद तक कम हो जाता

है। इस बारे में पहले भी कई शोधकर्ताओं ने संकेत दिये थे। पहले भी यह उम्मीद जतायी

गयी थी कि सामान्य वैज्ञानिक संरचना की वजह से ही कोरोना अथवा कोई भी ऐसा

वायरस सूर्य की रोशनी के संपर्क में आकर कमजोर हो जाता है। अब उसके आगे के शोध

के आंकड़ों को सार्वजनिक किया गया है। प्रमुख वैज्ञानिक पत्रिका प्लोस वन में प्रकाशित

एक आलेख में इसके बारे में वैज्ञानिक तथ्यों की जानकारी दी गयी है। इसमें अस्पताल में

भर्ती कोरोना के मरीजों की शारीरिक स्थिति और विटामिन डी की उपलब्धता के आधार

पर उनका विश्लेषण किया गया है। यह बताया गया है कि जिन मरीजों में विटामिन की

कमी नहीं थी, उन्हें बहुत कम परेशानी हुई लेकिन जिन मरीजों में विटामिन डी कम था

उनकी परेशानियां बहुत अधिक रही। विटामिन डी की मात्रा नापने के आंकड़े के मुताबिक

जिन मरीजों में यह 30 एनजी/एमएल थी, उन्हें दूसरों के मुकाबले कम पहले रही। एक

जैसी हालत में होने वाले दूसरे मरीज, जिनमें विटामिन डी कम था, काफी कष्ट से गुजरे

और कुछ की मौत भी हुई। शोध से जुड़े वैज्ञानिक मानते हैं कि सूर्य किरणों के प्रभाव से

हमारे शरीर में कई सकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं। इससे सी रियेक्टिव प्रोटिन का स्तर ठीक

रहता है और साथ ही खून में लिंफोसाइट्स की मात्रा अधिक रहती है। इससे शरीर का

प्रतिरोधक प्रणाली बेहतर तरीके से काम करता रहता है। इसी आधार पर वैज्ञानिक सूर्य

किरणों के साथ कोरोना के घटते प्रभाव को जोड़ रहे हैं।

विटामिन डी के आंकड़ों पर रिपोर्ट जारी की गयी है

वैज्ञानिकों ने शोध के तहत पाया है कि जिनके शरीर में विटामिन डी की कमी होती हैं, उन्हें

कई किस्म की परेशानियां बहुत अधिक होती है। खास कर शरीर के अंदर साइटोकिन

तूफान जैसी स्थिति, जिसमें एक साथ कई किस्म के प्रोटिन बनने लगते हैं, मरीज को

परेशानी करता है और कई मामलों में इसका परिणति मौत होती है। अमेरिका के बोस्टन

विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक माइकल एफ हॉलिक ने अपने प्रबंध में यह निष्कर्ष निकला

है। शोध के तहत अस्पताल में कोरोना संक्रमण से पीड़ित 235 मरीजों के ऐसे आंकड़ों का

गहन विश्लेषण किया गया था। उन मरीजों की तमाम आंतरिक स्थितियों के आंकड़ों का

क्रमवार तरीके से विश्लेषण किया गया। इनमें से अनेक को कोरोना संक्रमण से होने वाली

अत्यधिक परेशानी थी। उनके रक्त के अंदर मौजूद सी रियेक्टिव प्रोटिन और

लिंफोसाइट्स के आंकड़ों के विश्लेषण से शोधकर्ताओं का दल इस नतीजे पर पहुंचा है।

इसी से पाया गया कि जिनमें विटामिन डी पर्याप्त था उनलोगों को अन्य मरीजों की

तुलना में बहुत कम परेशानी हुई। यानी सूर्य की किरणों के प्रभाव में रहने वालों पर इस

वायरस का असर कम हुआ। इससे फिर से यह बात सामने आयी है कि अपने प्रोटिन

आवरण के सुरक्षा कवच को ही यह वायरस सूर्य की गर्मी की वजह से खोने लगता है।

सूरज की गर्मी वायरस के सुरक्षा कवच को कमजोर करता है

गर्मी से जब यह प्रोटिन कवच पिघल जाता है तो अंदर का वायरस अपने आप ही कमजोर

पड़ जाता है। इस अनुसंधान के बाद जो आंकड़े दिये गये हैं, उसके मुताबिक जिन मरीजों

के शरीर में विटामिन डी सही था, उनकी मौत का खतरा पचास फीसदी से अधिक कम हो

चुका था। इसी आधार पर वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि सूर्य किरणों से मिलने वाले

विटामिन डी की वजह से शरीर के अंदर यह सारे बदलाव होते रहे जो मरीजों को कोरोना

वायरस से लड़ने की प्रतिरोधक शक्ति प्रदान करते रहे।

जेनेटिक गड़बड़ियां भी अधिक परेशानी के लिए जिम्मेदार

इसके अलावा भी एक अन्य शोध में यह पाया गया है कि जो युवक और कम उम्र के लोग

विटामिन डी की कमी से पीड़ित हैं, उनपर भी कोरोना वायरस का हमला तुलनात्मक तौर

पर अधिक तेजी से होता है। लेकिन कोरोना का प्रभाव एक जैसा होने के बाद भी अलग

अलग मरीज पर उसका अलग अलग प्रभाव संबंधित व्यक्ति की जेनेटिक संरचना पर

निर्भर है। यह जेनेटिक संरचना सभी की अलग अलग होती है। कुछ मामलों में यह भी

देखा गया है कि शरीर के अंदर प्राकृतिक तौर पर उत्पन्न होने वाले प्रतिरोधक भी जेनेटिक

गड़बड़ियों की वजह से वायरस को छोड़कर शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पर ही हमला बोल

देते हैं। इसके लिए उन 17 प्रोटिनों की भी पहचान की गयी है, जो इस उल्टी कार्रवाई के

लिए मुख्य तौर पर जिम्मेदार होते हैं।

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