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विकास दुबे की जुबान खुलने से आखिर डर किसको था

विकास दुबे फिल्मी अंदाज में पुलिस मुठभेड़ में मार डाला गया। अपराधी घटनास्थल पर

कभी पकड़े नहीं जाते हैं। अगर पुलिस मारा गया या घायल हुआ तो कार्रवाई के तेवर बदल

जाते है। यहां तो आठ पुलिसवालों की हत्या का सवाल था। नतीजा है कि छह दिनों के

भीतर एक के बाद एक विकास दुबे और उनके गुर्गों का सफाया हो गया है। एक सामान्य

समझ की बात हो सकती है कि इस किस्म के जघन्य अपराध के लिए जिम्मेदार लोगों के

खिलाफ पुलिस को सख्त तेवर अपनाना ही चाहिए। यह एक सामान्य की बात है। कुछ

लोग इसे त्वरित न्याय की संज्ञा भी देकर मामले को उचित ठहराने की भरसक कोशिश

करेंगे। लेकिन जो अपराधी पुलिस को लगातार चकमा दे रहा था। दिल्ली सीमा पर होटल

के सीसीटीवी कैमरे में उसकी तस्वीर कैद हो रही थी, वह किस रास्ते से और किसकी मदद

से उज्जैन तक पहुंचा, इस बारे में चुप्पी साध लेने से काम नहीं चलेगा। इस पूरे घटनाक्रम

के अंदर से जिस तथ्यों का स्पष्ट संकेत मिल रहा है, वह सत्तारूढ़ भाजपा के अंदर भी

चल रहे एक भीषण जातिसंघर्ष के संकेत दे रहा है। घटनाक्रम और विकास दुबे के बारे में

जिस तरीके से परस्पर विरोधी बयानबाजी होती रही है, उससे साफ है कि राजनीति में

सक्रिय एक तबका उसे आधुनिक रॉबिनहुड बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता है।

अजीब स्थिति यह है कि वहां के थानेदार और अन्य अफसर भी पुलिस को छोड़ उसकी

तरफदारी करने की वजह से गिरफ्तार भी हो चुके हैं। यह साफ है कि जातिवादी संघर्ष के

इस दौर में आदमी किस पद पर है और उसकी राष्ट्रीय और सरकारी जिम्मेदारी क्या है,

यह मायने नहीं रखता है।

विकास दुबे दरअसल जातिवादी चुनावी समीकरणों की उपज है

वह अपने जातिवर्ग के समूह को आगे बढ़ाने की असफल कोशिश कर रहा है। दरअसल

किसी भी कीमत पर चुनाव जीतने की ललक ने ही इस जातिवादी लोभ को बढ़ावा दिया है।

दरअसल यह भारतीय लोकतंत्र का विद्रूप चेहरा है, जहां अब योग्यता नहीं दूसरे हथकंडों से

चुनाव जीते जाते हैं। चुनाव जीतने के बाद ही व्यक्ति की आर्थिक परिस्थितियां कुछ इस

तरह बदलती हैं कि एक एक कर लोगों का इसमें हाथ आजमाने की चाह भी बढ़ती गयी है।

जाहिर है कि गांव के सामान्य मवाली किस्म के गुंडे से आठ पुलिस वालों को मारने वाला

विकास दुबे बिना राजनीतिक संरक्षण के तो आगे नहीं बढ़ा होगा। अब उसके पकड़े जाने

पर किनलोगों ने विकास का बतौर चुनावी हथियार इस्तेमाल किया है, उसका राज खुलने

का भय किसी एक को नहीं बल्कि बहुतों को सता रहा होगा। इस परिस्थिति को शायद

विकास दुबे खुद भी अच्छी तरह जान रहा था। लेकिन जिस बात की तरफ अधिक ध्यान

देना चाहिए कि जो थानेदार और पुलिस अफसर उसे पुलिस की रेड होने की सूचना दे रहे

थे, क्या उन्हें पता नहीं था कि पुलिसवालों की हत्या के बाद के दूरगामी परिणाम क्या

होंगे। स्पष्ट है कि वे अच्छी तरह जान रहे थे कि अगर विकास ने पुलिस वालों पर हमला

कर दिया तो उसके बाद क्या कुछ हो सकता है। इसलिए यह भी जांच के दायरे में आना

चाहिए कि आखिर इन पुलिस अफसरों को कहां से संरक्षण प्राप्त था या फिर से कांटा से

कांटा निकालने के खेल में सिर्फ मोहरे ही थे।

किसने कांटा से कांटा निकालने का यह खेल खेला है

मामला सिर्फ एक विकास दुबे का नहीं है। भारतीय राजनीति खास कर हिंदी पट्टी की

राजनीति में ऐसे अनेक विकास दुबे भरे पड़े हैं। चुनाव के वक्त हर बार दस बीस नये

विकास दुबे पैदा होते हैं, कुछ को यह राजनीतिक व्यवस्था ही पैदा करती है। फिर

उपयोगिता समाप्त होने के बाद वे फिर से गुमनामी के अंधेरे में खो जाते हैं या फिर

अधिक महत्वाकांक्षा रखने की कोशिश में उनका परिणाम भी विकास दुबे के जैसा ही होता

है। घटनाक्रम यह साफ कर रहे है कि यह दरअसल किस्म किस्म का एनकाउंटर है।

हमलोगों ने कई फिल्मों में और खासकर विकास दुबे के मामले में अजय देवगम की

फिल्म सिंघम पार्ट 2 में ऐसे दृश्य देखें हैं। इसलिए इस मुद्दे को सिर्फ पुलिस वालों के बदले

की भावना समझने की भूल न करें। विकास दुबे की जुबान खुलने का भय किन्हें सता रहा

था, इस सच को समझकर ही भारतीय राजनीति के इस गंदे परिवेश को बेहतर तरीके से

समझ पायेंगे। वैसे भी अगर भारतीय लोकतंत्र को और मजबूत करना है तो विकास दुबे की

जुबान को राजनीतिक शक्ति ना मिले, इसके लिए तो जनता को प्रयास करना होगा। यह

शक्ति सिर्फ और सिर्फ वोट की ताकत से उत्पन्न होती है। जब मतदाता अपनी जातिवादी

सोच और भय के माहौल से अलग हटकर स्वतंत्र मतदान करेगा तो धीरे धीरे बाहुबलियों

के सहारे चुनाव जीतने की प्रथा भी कमजोर पड़ जाएगी।


 

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