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कोरोना संक्रमण पर वीडियो कांफ्रेंसिंग जारी रहनी चाहिए

कोरोना संक्रमण का मामला जब हाथ से निकलता नजर आया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

के निर्देश पर गृह मंत्री अमित शाह और स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने दिल्ली के मुख्यमंत्री

अरविंद केजरीवाल के साथ बैठक की। देश में लॉक डाउन लगे तीन महीने के दौरान

विशेषज्ञों ने अनेकों बार इसके प्रति सार्वजनिक चेतावनी जारी कर दी थी। इसके बाद भी

अगर केंद्र सरकार ने अपनी तरफ से सभी सरकारों के साथ सीधा संपर्क नहीं रखा तो यह

भारतीय राजनीति का विद्रुप चेहरा भर है। कल हुई बैठक के पहले तक को भाजपा दिल्ली

में आम आदमी पार्टी और मुंबई में शिव सेना को नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़

रही थी। लेकिन इसका जनता के बीच क्या कुछ असर हो रहा है, उसे समझना शायद

भाजपा के नेताओं ने जरूरी नहीं समझा है। इसी वजह से देश के कोरोना संकट में होने के

दौरान ही अमित शाह और उसके सहयोगी पूरी तरह चुनावी मोड में आ चुके हैं। जगह

जगह पर वर्चुअल रैलियों का आयोजन हो रहा है और चुनावी माहौल बनाया जा रहा है।

जितना दम चुनावी माहौल अपने पक्ष में करने के लिए लगाया जा रहा है उसका आधा भी

अगर कोरोना संक्रमण की रोक थाम के लिए लगाया गया होता तो शायद देश में कोरोना

की स्थिति इतनी नहीं बिगड़ती। अब हालात हाथ से बाहर निकल रहे हैं तो सिर्फ दिल्ली के

लिए अलग से ट्रेनों में कोरोना अस्पताल बनाने का फैसला लिया जा रहा है। यह काम लॉक

डाउन लागू होने के दौरान क्रमवार तरीके से चालू रहना चाहिए था। भारतीय रेलवे की

तरफ से हर महत्वपूर्ण इलाकों में रेलवे कोचों को मरीजों के लिए बेड के लिए तैयार किया

गया था।

कोरोना संक्रमण की पहली तैयारियां बाद में सुस्त पड़ गयी

बाद में धीरे धीरे यह स्थिति सुस्त पड़ती चली गयी। लेकिन अगर कोरोना के निरंतर बढ़ते

आंकड़ों पर गौर करते हुए काम किया गया होता तो शायद आनन फानन में ऐसे इंतजाम

नहीं करने पड़ते। चिकित्सा विशेषज्ञों ने घनी आबादी वाले देश भारत में कोरोना के

विस्तार के बारे में जो कुछ पूवार्नुमान व्यक्त किये थे, वे क्रमवार तरीके से सही साबित हो

रहे हैं। सिर्फ देश में कोरोना जैसी वैश्विक महामारी भी राजनीति की भेंट चढ़ जाएगी,

इसका आकलन किसी स्तर पर नहीं किया गया था। नतीजा है कि अब आम आदमी को

इसी घटिया राजनीति की वजह से ईलाज तो दूर अस्पताल में दाखिल होने के लिए बेड

तक नहीं उपलब्ध हो रहे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जिन तथ्यों और

आॅनलाइन आंकड़ों के आधार पर अपनी बात रखी है, उससे स्पष्ट है कि केंद्र सरकार ने

प्रारंभ में कोरोना को नजरअंदाज कर दिल्ली की सत्तारूढ़ सरकार को राजनीतिक तौर पर

नीचा दिखाने की रणनीति पर काम किया है। अब हालात जब वाकई नियंत्रण से बाहर जा

रहे है तो बाकी इलाकों को बचाने की जद्दोजहद हो रही है। दरअसल अब कोरोना का

संक्रमण उऩइलाकों तक जा पहुंचा है जो दिल्ली में भाजपा के प्रभाव क्षेत्र समझे जाते हैं।

इसके बाद जब सरकार सक्रिय होती है तो इसे देश की जनता लॉक डाउन के दौरान पूरे

इत्मीनान के साथ देख समझ रही है।

मजदूरों के खाली हाथ लौटने का असर दूरगामी होगा

देश के अधिकांश भागों से गांव लौटत मजदूर भी अच्छी तरह इस बात को समझ चुके हैं

कि राजनीतिक विद्वेष और कुचक्रों की वजह से उन्हें खाली हाथ गांव लौटने में भी इतनी

सारी परेशानियों का सामना करना पड़ा है. अब रोजगार के मोर्चे पर जो कुछ काम प्रारंभ हो

चुका है, वह अगर और गति नहीं पकड़ पायी तो आने वाले दिनों में कोरोना संक्रमण के

विस्तार के साथ साथ रोजी रोटी के साथ साथ विधि व्यवस्था की दूसरी समस्या भी देश के

अनेक भागों से नजर आने लगेगी। कोरोना संकट पर ध्यान देने के बदले जब राजनीतिक

राज्यसभा और विधानसभा चुनावों पर अधिक ध्यान देने लगे तो ऐसा प्रतीत होता है कि

इस राजनीतिक परिवेश को भी बदलने का वक्त आ चुका है। अब देश को वैसी राजनीतिक

दलों की जरूरत है तो जनता की वास्तविक जरुरतों को शीर्ष प्राथमिकता पर रखने के बाद

ही राजनीति करें और राजनीति में भी जनता के मूल सवाल कभी गौण नहीं हों। शायद

कोरोना संक्रमण और खाली हाथ गांव लौटने वाले मजदूरों से इस बार इसी राजनीति की

नींव भी पड़ सकती है। क्योंकि देश यह देख रहा है कि लोगों को दो वक्त की रोटी का

इंतजाम देने के बदले देश का गृह मंत्री अब चुनाव पर अधिक ध्यान दे रहा है। यानी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ध्यान नहीं रहे तो भाजपा के अन्य लोगों को कोरोना के संकट

और देश की जनता की वास्तविक जरूरतों पर ध्यान देने तक की फुर्सत नहीं है। वे तो

केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश पर इनदिनों वर्चुअल रैलियों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं।


 

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