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टीआरपी के खेल में सेलिब्रिटीज की चर्चा में राष्ट्रभक्ति का तड़का




  • प्रसिद्ध लोगों की टिप्पणियों पर डब्ल्यूडब्ल्यूएफ का खेल

  • देशी हस्तियों ने भी अब आकर देश का मोर्चा संभाला है

  • अंतर्राष्ट्रीय लोगों की टिप्पणी से दुनिया में चर्चा बढ़ी

  • किसान आंदोलन पर होने लगी है बहस

रजत कुमार गुप्ता

रांचीः टीआरपी के खेल अब दूसरे तरीके से चल रहा है। दरअसल अर्णव गोस्वामी और

बीएआरसी के पूर्व प्रमुख के फर्जीवाड़ा का खुलासा होने के साथ यह माना जा रहा था कि

टीआरपी का यह फर्जीवाड़ा फिलहाल बंद है। लिहाजा टीआरपी बढ़ाने के लिए अब प्रमुख

चैनल उन अंतर्राष्ट्रीय चर्चित हस्तियों के बयानों का सहारा ले रहे हैं, जिनके फॉलोवरों की

संख्या करोड़ो में है। इसे देश में अधिकाधिक प्रसारित करने के लिए उसमें देशभक्ति का

त़ड़का लगाया जा रहा है। इसके बहाने अर्णव गोस्वामी और किसान आंदोलन को लेकर

सोशल मीडिया में हो रही फजीहतों का दाग धोने की कोशिशें भी जारी हैं। वैसे यह स्पष्ट है

कि मात्र चालीस हजार मीटरों के सहारे जो टीआरपी का आकलन होता है, उसे सिर्फ इस

किसान आंदोलन के सोशल मीडिया प्रसारण ने काफी पीछे छोड़ दिया है। अब लोग अपनी

पसंद की चीजों को देखने के लिए टीवी चैनल नहीं बल्कि सोशल मीडिया का सहारा ले रहे

हैं। इनमें यूट्यूब और फेसबुक ही सबसे आगे हैं। किसान आंदोलन के दो चर्चित ताऊ

इनदिनों देश के प्रमुख फिल्मी लोगों से अधिक प्रसिद्धि बटोर चुके हैं। चूंकि यह आंकड़ा

सार्वजनिक होता है, इसलिए तय माना जा सकता है कि सारे टीवी चैनलों की टीआरपी को

अगर एक साथ मिलाकर भी देखें तो सोशल मीडिया के चंद चर्चित वीडियो उनपर भारी पड़े

हैं क्योंकि उनके दर्शकों की संख्या न सिर्फ अधिक है बल्कि उन्हें बार बार देखा भी जा रहा

है। इससे भी बड़े चैनल अपनी नैय्या डूबने का एहसास कर पा रहे हैं।

टीआरपी का खेल अब अंतर्राष्ट्रीय मंच पर

अब प्रसिद्ध लोगों की टिप्पणी का वह उल्लेख कर दें, जिसके सहारे अपनी टीआरपी

सुधारने की कवायद चल रहा है। इनमें से पहला नाम पॉप स्टार रिहाना का है। सोशल

मीडिया पर उनके एक सौ मिलियन से अधिक फॉलोवर हैं। किसान आंदोलन के संबंध में

सीएनएन की रिपोर्ट को संलग्न करते हुए उन्होंने लिखा था कि हमलोग इस बात चर्चा

क्यों नहीं कर रहे हैं। उनके इस ट्विट को दस लाख से अधिक लोगों ने रि ट्विट कर पूरी

दुनिया में इस बात को फैला दिया है। जिसमें लगातार प्रतिक्रियाएं भी आ रही हैं। यह भी

बताते चलें कि रिहाना ने अपने फाउंडेशन के माध्यम से हाल ही में कोरोना की लड़ाई में

पचास लाख अमेरिकी डॉलर का दान भी दिया है।

दूसरा नाम स्वीडिश पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग का है, जिन्होंने भी इंटरनेट बंद

किये जाने पर अपनी नाराजगी जताये हुए कहा है कि हम लोग किसानों के आंदोन के पक्ष

में खड़े हैं। तीसरा नाम जो भारत को शायद सबसे अधिक नागवार गुजरा है, वह नाम है

अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की भांजी मीना हैरिस का। मीना की माता का जन्म

से भारतीय हैं। उन्होने भी किसान आंदोलन का समर्थन किया है। वह पेशे से वकील हैं।

इनकी टिप्पणी के तुरंत बाद अब तक सुस्त पड़े भारतीय सेलिब्रिटी भी मैदान में उतरे हैं।

सभी ने इसे भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप करार दिया है। लेकिन भारत में

जब अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव अथवा वाशिंगटन की हिंसा पर चर्चा होती है तो वहां के

लोग ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं देते क्योंकि वे मानते हैं कि जो सूचनाएं सार्वजनिक हो चुकी

हैं, उनपर सार्वजनिक चर्चा हो होगी।

किसान आंदोलन पर चुप थे अब बयानों पर हो हल्ला

लेकिन असली मुद्दा इनके बयानों की चर्चा की है। अगर टीवी चैनल इन पर चर्चा नहीं करते

तो शायद अधिसंख्य भारतीयों को उनके बारे में पता भी नहीं चल पाता। लेकिन असली

सच्चाई यही है कि इन प्रमुख हस्तियों के फॉलोवरों की संख्या अत्यधिक होने के लाभ भी

टीवी चैनल उठाना चाहते हैं। उनके नाम पर किसी भी विषय को जोड़ने से गूगल सर्च में वे

मुद्दे भी ऊपर दर्ज होते हैं, जिनके की बर्ड में ऐसी प्रमुख हस्तियों के नाम होते हैं। लेकिन

इस मुद्दे को चर्चा में बनाये रखने के लिए ही उसमें राष्ट्रभक्ति का तड़का लगाया गया है।

ताकि इस मुद्दे पर देश के अंदर भी बहस जारी रहे और टीआरपी के इस खेल में उनका

कारोबार सही तरीके से चल सके। दरअसल सोशल मीडिया में लगातार लताड़े जा रहे

चैनलों को अपनी भक्ति प्रदर्शित करते हुए खुद को दौड़ में बनाये रखने का यह नया

हथियार मिल गया है। अंत में बता दें कि दुनिया का सबसे प्रमुख सर्च इंजन गूगल के

की वर्ड का खेल इसमें अहम भूमिका निभायेगा, जिसके सहारे टीआरपी में अपनी डूबती

नैय्या को पार लगाने की कोशिश हो रही है।



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