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ऑस्ट्रेलिया में अपने वैक्सिन के परीक्षण को प्रारंभ कर रही अमेरिकी कंपनी

  • नोवावैक्स परीक्षण पहली कतार के स्वयंसेवकों को

  • छह स्वयंसेवकों को दिया गया इंजेक्शन

  • प्रयोग सफल रहा तो इसी साल वैक्सिन

  • थाईलैंड में सस्ता वैक्सिन बनाने का दावा

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः ऑस्ट्रेलिया में अमेरिकी कंपनी ने अपने वैक्सिन का परीक्षण प्रारंभ कर दिया

है। जिस वैक्सिन का परीक्षण प्रारंभ हो रहा है, उस कंपनी का नाम नोवावैक्स है। यह दावा

किया गया है कि अगर परीक्षण सफल रहा तो इसी वर्ष के अंत तक कोरोना के खिलाफ यह

वैक्सिन पूरी दुनिया के लिए उपलब्ध होगा। जो जानकारी दी गयी है उसके आधार पर यह

निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अमेरिकी कंपनी ने अपनी वैक्सिन के क्लीनिकल

ट्रायल में अन्य अनुसंधान केंद्रों को फिलहाल पीछे छोड़ रखा है। कंपनी के मुख्य रिसर्च

अधिकारी डॉ ग्रेगरी ग्लैन ने कहा कि पहले चरण में 131 स्वयंसेवकों को इसका इंजेक्शन

दिया जाएगा। यह इंसानी परीक्षण का पहला चरण होगा।

वैसे कोरोना वैक्सिन के मामले में दुनिया भर में काम चल रहा है। अनेक देशों के

अनुसंधान केंद्रों में जानवरों पर वैक्सिन का प्रारंभिक परीक्षण सफल होने का दावा भी

किया गया है। वैक्सिन अनुसंधान में अलग अलग पद्धतियों का प्रयोग किया जा रहा है।

मुख्य तौर पर यह वायरस के प्रोटिन सुरक्षा कवच को तोड़ने के ऊपर केंद्रित है।

डॉ ग्लैन ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया के मेलबॉर्न में यह परीक्षण प्रारंभ किया गया है। इस बात

की तैयारी सभी अनुसंधान केंद्रो में कर ली गयी है कि इंसानी परीक्षण का पहला दौर सफल

होते ही त्वरित गति से दूसरे और तीसरे चरण का क्लीनिकल ट्रायल शीघ्र प्रारंभ कर दिया

जाएगा। इसके लिए सभी ने अपने अपने तरीके से स्वयंसेवक भी तैयार कर रखे हैं।

ऑस्ट्रेलिया में दो शहरो में क्रमवार होगा अनुसंधान

इधर अमेरिकी अनुसंधान कंपनी ने ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न के अलावा ब्रिसबेन में भी

वैक्सिन का परीक्षण होगा। इसके तहत पहले चरण में सिर्फ छह छह लोगों को इंजेक्शन

दिये जाएंगे। इस काम में ऑस्ट्रेलिया की कंपनी न्यूक्लीयस नेटवर्क भी उसका सहयोग

कर रही है। इस प्रथम चरण के ट्रायल के परिणाम जुलाई तक आने की उम्मीद है। उसके

आधार पर आगे के दोनों चरणों की तैयारी की जाएगी। यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि

पहले चरण के सफल होने के बाद इसके दूसरे चरण का क्लीनिकल ट्रायल अन्य देशों में

भी किया जाएगा। ऑस्ट्रेलिया में जिस वैक्सिन का प्रयोग किया जा रहा है, उसका मकसद

अपनी आंतरिक संरचना से कोरोना वायरस के ऊपरी आवरण के प्रोटिन कवच को

निष्क्रिय करना है। शरीर के अंदर इस वैक्सिन की मदद से प्राकृतिक तौर पर वायरस

प्रतिरोधक तैयार किया जाने वाला है। शरीर में यह प्रतिरोधक विकसित होने की स्थिति में

कोरोना का हमला होने के बाद उसके वायरस का प्रोटिन कवच ध्वस्त हो जाएगा। इस

स्पाइक प्रोटिन कवच के टूट जाने के बाद वायरस न तो जानलेवा बनेगा और न ही वह

अन्य अंगों तक पहुंच पायेगा क्योंकि यह प्रोटिन कवच ही उसे अपनी तादाद बढ़ाने के

लिए शरीर के सामान्य कोषों की मदद लेने में फायदा पहुंचाता है। वैक्सिन तैयार करने में

वायरस और उसके प्रोटिन कवच के जेनेटिक कोड की मदद ली गयी है। इस जेनेटिक

संरचना को ध्वस्त करने के लिए वैकल्पिक प्रतिरोधक तैयार करने का काम चल रहा है।

नोवाबैक्स ने इसके बारे में वैज्ञानिक तथ्य बताये हैं

नोवाबैक्स ने साफ किया है कि उनलोगों ने प्रयोगशाला में अलग से प्रोटिन कवच

विकसित किये हैं। इसी प्रोटिन को और परिष्कृत करने के बाद उसके अंदर वायरस के

आकार के नैनोपार्टिकल्स भरे गये हैं। दरअसल वैक्सिन बनाने का यह आधुनिक और

हानिरहित तरीका भी है। इसलिए यह माना जा सकता है कि दरअसल जिस वैक्सिन की

परीक्षा का काम प्रारंभ किया गया है, वह अपने आप में एक वायरस है लेकिन उसकी

क्षमता को जेनेटिक संशोधनों की वजह से पूरी तरह नियंत्रित कर दिया गया है।

थाईलैंड के वैज्ञानिकों ने बंदरों पर उस वैक्सिन का परीक्षण प्रारंभ किया है, जिसके सबसे

सस्ता वैक्सिन होने का दावा अभी से ही किया जा रहा है। वहां के वैज्ञानिकों को उम्मीद है

कि 2021 तक यह वैक्सिन तैयार कर लिया जाएगा। दुनिया के 100 से अधिक वैक्सिन

अनुसंधानों में से आठ में क्लीनिकल ट्रायल का दौर चल रहा है। सबसे पहले इंसानों पर

वैक्सिन का प्रयोग करने वालों में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय है। लेकिन अपने अब तक के

अनुसंधान के परिणामों से ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय बहुत अधिक आशान्वित नहीं है।


 

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