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उपेंद्र कुशवाहा की स्थिति,आधे इधर, आधे उधर, बाकी मेरे साथ वाली हो गई

  • हर डाल के पंछी बने उपेंद्र कुशवाहा

  •  आमलोगों में हो रही जमकर किरकिरी

  •  अनेक समर्थक साथ छोड़ राजद में शामिल

  •  जदयू से पिछली बार आरएसएस कहकर भागे थे


राष्ट्रीय खबर

पटना : उपेंद्र कुशवाहा वैसे तो जनता दल यू में दूसरी बार आए हैं लेकिन इनकी पहचान

हर डाल के पंछी के रूप में रही है। यह नीतीश कुमार के अलावा जॉर्ज फर्नांडिस , राकांपा

और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी शिष्यत्व ग्रहण कर चुके हैं। जब इनकी दाल नहीं गलती

है तो अपने पार्टी के मुखिया पर ही अनाप-शनाप आरोप लगाकर उसका साथ छोड़ देते हैं।

जैसा उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल का सदस्य बनने के बाद भाजपा के साथ किया। उन्होंने

भाजपा पर आर एस एस का एजेंडा चलाने का आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया था।

जबकि इनकी वहां दाल नहीं गल रही थी। भाजपा को गाली देने वाले उपेंद्र कुशवाहा पुनः

नीतीश कुमार के चरणों में बैठकर उसी एनडीए का हिस्सा बन गए हैं ,जिसे कभी गाली देते

थे। इस बार के आगमन को भी वे अपनी दूसरी बार की घर वापसी कर रहे हैं , लेकिन

जानकार प्रेक्षकों का मानना है की उपेंद्र कुशवाहा अपने राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण

हमेशा हर डाल पर बैठने के आदि बन चुके हैं।

इनको भाजपा कभी अच्छी तो कभी संप्रदायिक पार्टी दिखने लगती है

इनका कभी भाजपा प्रेम हो जाता है तो कभी भाजपा इन्हें सांप्रदायिक पार्टी दिखने लगती

है। लेकिन जानकार लोगों का कहना है कि श्री कुशवाहा में शुरू से जातीय तत्व हावी रहा

और यह इन्होंने हमेशा से ही कुशवाहा कार्ड खेला। कुशवाहा समाज का नेता बनने और

कुशवाहा के नाम पर विभिन्न दलों से बारगेनिंग करने में इन्होंने कोई कोताही नहीं की।

उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत वैसे तो नीतीश के समता पार्टी के साथ ही शुरू हो

जाती है लेकिन वर्ष 2000 में नीतीश कुमार के साथ रहते हुए उन्होंने पहली बार

विधानसभा का चुनाव जीता और उनको नेता प्रतिपक्ष तक की कुर्सी सौंपी गई। वर्ष 2005

में दो जगह से अपनी किस्मत आजमाई और दोनों विधानसभा चुनाव हार गए। इसके बाद

उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का दामन थामा वहां भी शीर्ष नेताओं से इनके मतभेद रहे।

वर्ष 2010 में वापस जनता दल यू में लौटना पड़ा इस बार भी उनकी बारगेनिंग क्षमता

काम आ गई और वह राज्यसभा भेजे गए। लेकिन कई मुद्दों पर तनातनी के बाद उन्होंने

2013 में जदयू को छोड़ दिया और 8 साल के बाद वापस लौटे।

उपेंद्र कुशवाहा मानव संसाधन केंद्रीय मंत्री भी रहे


इस दौरान शिक्षा यानी मानव संसाधन केंद्रीय मंत्री भी रहे लेकिन भाजपा ने इनकी

पहचान कर ली थी इसलिए वहां इनकी महत्वाकांक्षाओं को पंख नहीं लग पाए। कड़ी

निगरानी के कारण इनको केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा। वर्ष 2019 में लोकसभा

चुनाव में काराकाट और उजियारपुर से भी लड़े और चुनाव हार गए। इस बार के

विधानसभा चुनाव में भी जनता ने इन को ऐसा सबक सिखाया कि उन्होंने जदयू में अपनी

पार्टी रालोसपा का बिलय ही कर दिया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से इनका पिछले दशक में

3 बार से अधिक मतभेद, विवाद हो चुका है , जिसको ये हमेशा प्रेस बयानों के माध्यम से

जाहिर भी करते रहे। अबकी बार उनका कहना है कि वह कोई ख्वाहिश लेकर सामने नहीं

आए हैं, लेकिन माना जा रहा है कि यह अपनी पत्नी को मंत्री का पद दिलाने की शर्त पर ही

वापस लौटे हैं। इनकी राजनीतिक तिकड़म ऐसी है कि अपने स्तर पर सभी समीकरण को

साध लिया तो 2014 में एनडीए में शामिल हो गए। रालोसपा से काराकाट का सीट लेकर

लोकसभा चुनाव की नैया भी पार लगा ली। उपेंद्र कुशवाहा की महत्वाकांक्षा एवं

विश्वसनीयता इतनी कमजोर है कि उनके जहानाबाद से सांसद रहे अरुण कुमार ने 2018

में ही रालोसपा छोड़ दी। सीतामढ़ी के सांसद रामकुमार शर्मा भी उनका साथ छोड़ गए और

पार्टी के 3 विधायकों ने भी बगावत करके अपना अलग रास्ता अपना लिया। तब के प्रदेश

अध्यक्ष भूदेव चौधरी भी राजद में चले गए और विधायक बन गए। यहां तक कि प्रभारी

प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र कुशवाहा, कोषाध्यक्ष राजेश यादव प्रधान महासचिव निर्मल कुशवाहा

,मधुमालती मिश्रा प्रदेश महिला अध्यक्ष आदि कई दर्जन नेता इनकी हरकतों के कारण

इनको छोड़ चुके हैं।

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