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साइबेरिया के इलाके की धरती पर अजीब धारियां

  • नासा के सैटेलाइटों में दिखा यह अजीब बदलाव

  • साल का अधिकांश समय बर्फ से ढका रहता इलाका

  • क्यों बन रहे ऐसे आकार अब तक कोई वैज्ञानिक तर्क नहीं

  • अंतरिक्ष से बिल्कुल साफ नजर आते हैं ऐसे धारीदार बदलाव

राष्ट्रीय खबर

रांचीः साइबेरिया के इलाके में अजीब किस्म की धारियां बन रही हैं। इनके बनने के

वैज्ञानिक कारणों के बारे में अब तक कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका है।

अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान नासा के द्वारा अंतरिक्ष में स्थापित उपग्रहों ने इसका चित्र

लिया है। इन चित्रों के वैज्ञानिक विश्लेषण के बाद वैज्ञानिक भी यह मान रह हैं कि वहां की

धरती में यह अजीब किस्म की धारियां बनती नजर आ रही है। लेकिन शोध करने वालों के

पास फिलहाल इस बात का कोई तर्क नहीं है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है।

वीडियो में समझिये यह इलाका और वहां के अजूबा

साइबेरिया के इलाके में इस किस्म की नई जानकारी आने के बाद फिर से उस बात की

चर्चा होने लगी है जब वहां के एक बहुत बड़े झील में अजीब किस्म के गोलाकार इलाके भी

नजर आने लगे थे। उस वक्त भी यह नहीं पता चल पाया था कि आखिर झील के अंदर इस

किस्म के गोलाकृति क्यों बन रही है। इस बार नई उलझन वहां के मारखा नदी के आस

पास के इलाकों में आयी है। नासा की तरफ से इस बारे में एक साथ कई चित्र सार्वजनिक

कर उसकी जानकारी दी गयी है। इन सैटेलाइट चित्रों को देखने से यह साफ हो जाता है कि

साइबेरिया के इलाके में ऐसा हो रहा है। हर मौसम में इनपर सैटेलाइट की नजर तो रहती है

लेकिन जाड़े के मौसम में यह धारियां और उभरकर स्पष्ट हो जाती हैं। दरअसल कड़ाके की

ठंड में बर्फ की चादरों के बिछने के बाद इसे और साफ साफ देखा जा सकता है। ऐसा क्यों

है, इस बारे में अब तक कोई सर्वमान्य वैज्ञानिक तर्क सामने नहीं आ पाया है।

साइबेरिया के इलाके में मारखा नदी के किनारे का दृश्य

वैसे इस बारें में प्रारंभिक आकलन है कि साल का अधिकांश समय बर्फ में ढके रहने वाले

इस इलाके में इसी बर्फ के बीच बीच में पिघलने की वजह से ऐसी धारियां बनी हैं। दरअसल

साल का करीब नब्बे प्रतिशत समय इन पर बर्फ बिछी रहती है। जब कभी भी इस बर्फ को

पिघलने का मौका मिलता है तो वह गुरुत्वाकर्षण के नियमों का पालन कर ऊंचे इलाकों में

ढलाने में पिघलती चली जाती है। इस इलाके का बर्फ पिघलकर भी उसी मारखा नदी में

मिलता रहता है। शायद इसी निरंतर प्रक्रिया की वजह से वहां ऐसी धारियों का निर्माण हो

रहा है, जिन्हें सैटेलाइट पकड़ पा रहे हैं।

साइबेरिया के इलाके में कड़ाके की ठंड यानी शून्य के नीचे का तापमान होने की वजह से

वहां के पत्थर दूसरे इलाकों के पत्थरों से दूसरे किस्म और आकार के होते हैं। बर्फ जमने

और उसके गलने के दौरान पत्थरों पर भी इसका असर निरंतर पड़ता रहता है। इसी वजह

से वह किसी खास तरीके से खुद को गुरुत्वाकर्षण के नियमों के अनुकूल बदलते चले जाते

हैं। शायद इस वजह से भी बर्फ के दौरान उनके अलग तरीके से प्राकृतिक तौर पर

व्यवस्थित होने की वजह से ऐसा हो रहा होगा। लेकिन ऐसी स्थिति नार्वे के भी कुछ

इलाको में हैं। फिर भी वहां इस किस्म की धारियां बनती नजर नहीं आती हैं।

बर्फ का अतिरिक्त बोढ ढलान भी पैदा करता रहता है

साइबेरिया के इलाके में बन रही धारियों के बारे में यूएसजीएस के भूवैज्ञानिक थॉमस

क्राफर्ड कहते हैं कि ऐसी धारियां पत्थरों पर लगातार बर्फवारी होने का ही नतीजा है।

समतल इलाको में बर्फ दूसरे तरीके से टिकी रहती है जबकि ऊंचाई पर पड़ी बर्फ पर

गुरुत्वाकर्षण का बोझ ज्यादा होता है। लिहाजा वे मौका पाते ही सबसे पहले पिघलकर

नीचे की तरफ आती हैं। इस वजह से शायद साइबेरिया के इलाके में ऐसी धारियां बन रही

हैं। लेकिन यह सारे सिर्फ आकलन हैं और वैज्ञानिक इस बार में अब तक किसी ठोस

नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं। लाखों वर्षों के निरंतर भूक्षरण और बर्फ के पिघलते रहने की वजह

से वहां की भौगोलिक स्थिति दूसरे इलाकों से भिन्न है। लेकिन इन तमाम तर्कों के बाद भी

वैज्ञानिक इस मुद्दे को और गहराई से समझकर किसी विज्ञान सम्मत नतीजे पर पहुंचना

चाहते हैं। वैसे साइबेरिया के इलाके में बन रही धारियों को नीचे से भले ही नहीं समझा जा

सके लेकिन सैटेलाइट चित्रों से उनकी बनावट स्पष्ट और अत्यधिक आकर्षक नजर आने

लगी है।

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