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राजस्थान से देश की राजनीति का असली हाल समझ लीजिए

राजस्थान से आया राम गया राम की राजनीति को कोरोना काल में समझने का सबसे

आसान तरीका है। यह सिर्फ राजस्थान की बात नहीं है बल्कि यह पूरे देश खासकर हिन्दी

भाषी प्रदेशों की राजनीति का असली हाल है। अब राजस्थान से बाजी किस तरफ पलटेगी

इसे समझना दिनोंदिन कठिन होता जा रहा है। दरअसल यह शह और मात का खेल

इसलिए भी पेचिदा हो गया है क्योंकि दोनों तरफ में जिन्हें भरोसे राजनीति चल रही है, वे

कब तक पार्टी के साथ रहेंगे, यह पार्टी के नेता भी नहीं जानते। दरअसल भारतीय

राजनीति के निरंतर पतन की वजह से अब नैतिकता के साथ साथ निष्ठा और नीति-

आदर्श पर कहीं चर्चा तक नहीं होती है। यह भारतीय राजनीति का नैतिक पतन है और

बाजारवाद के निरंतर हावी होते जाने की वजह से ही अपने से ऊपर के नेतृत्व का हाल

देखकर ही नेताओं ने अपने अंदर यह बीमारी पाल ली है। ताजा सूचना के मुताबिक सचिन

पायलट मान गये हैं यानी कांग्रेस के अंदर का विवाद फिलहाल स्थगित हो गया है। लेकिन

भारतीय राजनीति में यह कोई अंतिम स्थिति नहीं होती। कल की तारीख में कौन किधर

भाग जाएगा और अपने साथ किन्हें बटोर ले जाएगा, इसकी गारंटी तो खुद पार्टी के नेता

भी नहीं दे सकते। वैसे अभी की सूचना के मुताबिक गांधी परिवार के सीधे हस्तक्षेप से

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच

महीने भर से चली आ रही खींचतान सुलझ गई। पायलट ने सोमवार दोपहर को पूर्व

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ अपनी चिंताओं को साझा किया, शाम को कांग्रेस

आलाकमान ने उनकी शिकायतों को सुनने के लिए समिति गठित करने की घोषणा की।

राजस्थान से समझ लीजिए अब निष्ठा  की कोई कीमत नहीं

ऐसा माना जा रहा है कि एक समझौता हुआ है, जिसमें तय किया गया है कि पायलट

समूह के विधायक गहलोत सरकार में हस्तक्षेप नहीं करेंगे और बदले में, यह आश्वासन

मिला कि बागियों पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। 200 सदस्यीय विधानसभा में

गहलोत को 100 से अधिक विधायकों का समर्थन प्राप्त है। इसके पहले के घटनाक्रमों पर

नजर डाल लें तो सचिन पायलट को 14 जुलाई को राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष और उप-

मुख्यमंत्री के पद से हटा दिया गया था। इसके अलावा, पायलट गुट के दो विधायकों को भी

उनके मंत्री पद से हटा दिया गया था। कांग्रेस के एक शीर्ष नेता के अनुसार, सोनिया गांधी

का स्पष्ट संदेश था सचिन पायलट को पार्टी से जाने नहीं देना है। जब गहलोत ने

सार्वजनिक रूप से पायलट पर निजी हमला किया, तो उन्हें निर्देश दिया गया कि वे ऐसा न

करें। प्रियंका और राहुल गांधी ने शुरुआत में पायलट को बहुत समझाने की कोशिश की।

बातचीत समाप्त होने के बाद भी, प्रियंका पायलट के संपर्क में थीं। इधर अशोक गहलोत

के खिलाफ कोई भी बयान देने से बच रही पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने अब

जाकर एक परिवार के सभी लोगों की मौत पर पहली बार बयान दिया है। इससे स्पष्ट है

कि वह अब भी राजस्थान को लेकर भाजपा नेतृत्व की कोशिशों में खुद को शामिल करने

से परहेज कर रही हैं। यह स्पष्ट हो चुका है कि राजस्थान भाजपा में अब भी श्रीमती राजे

के समर्थकों की संख्या अधिक है और वे पार्टी नहीं सिर्फ वसुंधरा राजे के निर्देश पर ही काम

करते हैं। इसी वजह से सब कुछ अनुकूल बनाने में भाजपा को लगातार परेशानी हो रही है।

वसुंधरा राजे ने साबित कर दिया कि उनका कद बड़ा है

अब राजस्थान का विवाद सामयिक तौर पर स्थगित होने के बाद राजनीति का ध्यान

मुंबई की तरफ जाना स्वाभाविक है। फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के मौत की

जांच के बहाने केंद्र सरकार में गृह मंत्री अमित शाह को उद्धव ठाकरे को सबक सीखाने का

मौका मिला है। लेकिन राजनीति के दांव पेंच यह बार बार बता जाते हैं कि भारतीय

राजनीति में अब न तो कोई स्थायी दोस्त होता है और न स्थायी दुश्मन। इसलिए गाड़ी

आगे किस मोड़ पर किस तरफ मुड़ जाएगी, इसका अंदाजा लगाना कठिन है। इन दोनों

परिस्थितियों के बाद असली टकराव की स्थिति पश्चिम बंगाल के चुनाव में देखने को

मिल सकती है। जहां इस दल से उस दल में जाने और फिर उस दल से इस दल में चले

आने का खेल लोकसभा चुनाव के पहले से ही जारी है। इससे एक बात साफ हो जाती है कि

राजनीतिक दलों ने सूचना तकनीक के आधार पर अपने सदस्यों की संख्या कागजी तौर

पर जो बढ़ा ली है लेकिन राजनीतिक जमीन पर इनका कोई दम नहीं है। राजनीति में

चुनावी रणनीति के तहत जिस भीड़ को आवश्यकता है, वह अब भी एक दल से दूसरे दल

की तरफ आती जाती रहती है। इसी दांव पेंच से ऊपर पहुंचे नेता को नीति और आदर्श की

नहीं बल्कि अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता सताती है।


 

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