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बेकाबू कोरोना संक्रमण में आंकड़ा छिपाने का खेल

बेकाबू कोरोना संक्रमण पर अब बहस जैसी कोई गुंजाइश नहीं बची है। पहले ही कई

विशेषज्ञ इसके और भयावह होने की आशंका जता चुके हैं क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान

सारे गाइड लाइनों के उल्लंघन का खामियजा अब एक एक कर सामने आने लगा है। आज

भी देश में 3.79 लाख नये संक्रमण के मामले पाये गये हैं। 18 से 45 वर्ष के आयु वर्ग के

1.33 करोड़ लोगों ने अब तक कोरोना वैक्सिन लेने के लिए अपना पंजीयन कराया है।

लेकिन इसके बीच सबसे दुखद स्थिति मौत के आंकड़ों की हेराफेरी है। दिल्ली सहित देश

के हर बड़े शहर में यह गड़बड़ी देखने को मिल रही है। बेकाबू कोरोना संक्रमण के बीच

सरकारी आंकड़ा कुछ कहता है जबकि अंतिम क्रिया के स्थानों के आंकड़े कोई और कहानी

बयां कर रहे हैं। दरअसल मौत के आंकड़ों को कम दर्शाकर सरकार अब भी अपनी नाकामी

छिपाने की अगर कोशिश कर रही है तो इसे निहायत ही मुर्खतापूर्ण फैसला ही कहा जा

सकता है। केंद्र सरकार के अधिकांश मंत्री अब ट्विटरों पर कैद हो चुके हैं। उनका काम

सिर्फ ट्विटर पर सूचना देना अथवा प्रधानमंत्री की बातों को रि ट्विट करना भर रह गया

है। इन सभी ने पिछले छह महीनों के दौरान कोरोना की रोकथाम के लिए अपनी तरफ से

न तो कोई काम किया है और न ही सरकार का अंग होने के नाते सरकार को कोई

महत्वपूर्ण सुझाव ही दिया है। मौत के आंकड़ों की बात करें तो दिल्ली के 23 शवदाह केंद्रों

में तथा जहां लोगों को दफनाया जाता है, वहां के आंकड़ों का मेल सरकारी कोरोना मौत से

नहीं हो रहा है।

बेकाबू कोरोना संक्रमण में मौत के आंकड़ों की हेराफेरी

पहले से ही इस बात की चर्चा हो रही है कि सरकारी आंकड़ों में कोरोना से मृत दर्शाये गये

लोगों की तुलना में काफी अधिक लोगों की मौत कोरोना से हुई है क्योंकि उनका अंतिम

संस्कार भी कोरोना प्रोटोकल के तहत ही किया जा रहा है। इस सच्चाई को छिपाने के लिए

अब नये शब्दों का भी इस्तेमाल हो रहा है। यह कहा जा रहा है कि कोविड प्रोटोकॉल के

तहत जिनलोगों का अंतिम संस्कार किया गया है, यानी वे कोरोना के मरीज नहीं हैं।

जबकि सच्चाई यही है कि लगभग हर शहर के श्मशान घाटों में चिता की आग इनदिनों

बूझती हुई नजर ही नहीं आती है। कई बार तो शव इतने अधिक हो रहे हैं कि उनका अंतिम

संस्कार पास के पार्कों तक में करना पड़ रहा है। भारतवर्ष में बेकाबू कोरोना महामारी के

बीच इन आंकड़ों का छिपाया जाना भी अपने आप में नये किस्म की धोखाधड़ी है। जिसके

सहारे देश की जनता को नये सिरे से भूलावा देने की साजिश रची जा रही है। दैनिक

संक्रमण के सरकारी आंकड़े यह दर्शाते हैं कि अभी दुनिया में सबसे अधिक तेजी से कोरोना

भारतवर्ष में फैल रहा है। पिछले अनुमान और रिकार्डों को ध्वस्त करता हुआ यह पूरी तरह

बेकाबू होता नजर आ रहा है और उसके अभी और विकराल रुप धारण करने की आशंका

पहले ही जतायी गयी है। भारत में बेकाबू कोरोना के प्रारंभिक चरण में अस्पताल में

मरीजों के लिए बेड की कमी पड़ गयी थी। उसे किसी तरह राज्य सरकारें अपने अपने स्तर

पर संभालने की कोशिश कर रही हैं तो ऑक्सीजन की कमी से अनेक लोगों की मौत होने

की नई सूचना हमारे सामने है। अब उस समस्या को भी मिलजुलकर निपटाने तथा विदेश

से उसके लिए नये इंतजाम करने का काम तेज हुआ है।

ऑक्सीजन की घटिया राजनीति के बाद अब यह खेल

साथ ही ऑक्सीजन को लेकर जारी घटिया राजनीति और कालाबाजारी का खुलासा होने के

बाद स्थिति में थोड़ी सुधार है। लेकिन सरकारी स्तर पर खतरे को भांपने के बाद भी पूर्व

इंतजाम नहीं किया जाना अपने आप में एक बहुत बड़ी विफलता के तौर पर दर्ज हो चुकी

है। सभी राज्य सरकारों के पास अब अपने अपने कोरोना संक्रमण के विस्तार और किन

इलाकों में बेकाबू हो रहा है, उसके आंकड़े मौजूद है। उसके आधार पर अग्रिम योजना के

तहत सारे इंतजाम अभी भी किये जा सकते हैं क्योंकि इसकी लहर का शीर्ष पर आने का

समय अभी शेष है। मई में कोरोना का और विकराल रुप हमें देखने को मिलेगा, ऐसा

बताया गया है। लिहाजा इस बीच में अस्थायी अस्पताल, ऑक्सीजन की व्यवस्था तथा

दवाइयों का इंतजाम राज्य सरकारों के लिए कोई कठिन चुनौती नहीं है। अग्रिम योजना के

तहत अब विकेंद्रित चिकित्सा सुविधा की आवश्यकताओं को समझते हुए सारे उपाय किये

जा सकते हैं। खास तौर पर ऑक्सीजन वितरण के नाम पर दिल्ली के साथ जो राजनीति

की गयी है, उससे अभी बचने के समय है। पड़ोसी राज्यों से कम समय में कितना

ऑक्सीजन प्राप्त किया जा सकता है, इस पर काम किया जाना चाहिए। इन तैयारियों ने

हम आ रहे संकट के और बेकाबू होने के पहले ही अपने बचाव की पर्याप्त तैयारियां कर

सकते हैं।

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