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बिहार में बहार लेकिन किसके फायदे में

बिहार में बहार की चर्चा फिर हुई है। पिछले चुनाव में यह नारा अत्यंत लोकप्रिय हुआ था।

इस बार भी काफी जद्दोजहद के बाद अंततः नीतीश कुमार ही अगले मुख्यमंत्री होंगे, यह

तय हो गया है। लेकिन इस चुनाव परिणाम से बिहार में बहार आखिर किसकी आयेगी,

इस पर सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि इस बार राष्ट्रीय जनतांत्रिक

गठबंधन में जदयू छोटी पार्टी है। इस गठबंधन में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी

बनकर उभरी है। ऐसे में सबसे बड़ी पार्टी का दबाव सरकार पर होना स्वाभाविक है।

झारखंड में हमलोग इसका नमूना निर्दलीय मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के कार्यकाल में देख चुके

हैं। बेचारे मधु कोड़ा को सामने रखकर जो कुछ गड़बड़ियां की गयी, उनका खामियजा

अकेले मधु कोड़ा ने ही भुगता है। इसलिए बिहार में एक अत्यंत सशक्त विपक्ष की

मौजूदगी में नीतीश कुमार के लिए शासन चलाना कोई आसान काम तो नहीं होगा। आम

तौर पर मंत्रिमंडल के गठन में भी सारे समीकरणों पर ध्यान दिया जाता है। ऐसे में तय है

कि भाजपा के कोटा से अधिक मंत्री बनेंगे। दूसरी तरफ राजग में छोटी पार्टी होने के बाद

भी जदयू के भीतर भी मंत्री पद की चाह रखने वालों की कोई कमी तो नहीं है। ऐसे में सबके

साथ तालमेल बैठाना कोई आसान काम नहीं होगा। ऊपर से चुनावी दौड़ में किये गये वादों

का बोझ भी नीतीश कुमार के माथे पर होगा। भाजपा ने 19 लाख रोजगार देने का वादा कर

तेजस्वी यादव के दस लाख नौकरी के एलान की धार कम करने की भरपूर कोशिश की थी।

तीसरे चरण का चुनाव संभाल नहीं पाये तेजस्वी यादव

लिहाजा जिन इलाकों में राजग के प्रत्याशियों की जीत हुई है, कमसे कम वहां तो रोजगार

की मांग तुरंत ही सरकार पर हावी होगी। वैश्विक संकट की वजह से वैसे भी सारी

परिस्थितियां बिगड़ी हुई है और लोग कोरोना काल में हुए मतदान के तुरंत बाद ही

अपेक्षित परिणाम की मांग भी करेंगे। इन्हें पूरा करना भी कोई आसान काम नहीं होगा।

राजग के भीतर भी भाजपा का एक खेमा इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जीत बताने से पीछे

नहीं हट रहा है। यह सच भी है कि अंतिम दो दौर के चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी ने काफी

परिश्रम किया है। उनके परिश्रम का नतीजा भी चुनाव परिणामों पर दिख रहा है। लेकिन

इन तमाम मुद्दों के बीच बिहार के विकास के लिए धन का प्रबंध करना है। यह भी माना जा

सकता है कि बिहार में नीतीश कुमार के एक फैसले की वजह से महिलाओं का एक बड़ा

हिस्सा उनके पक्ष में मौन समर्थन व्यक्त कर चुका है। नीतीश कुमार द्वारा शराबबंदी की

घोषणा पर कई किस्म के दावे और प्रतिदावे किये जा सकते है। लेकिन यह एक फैसला

महिलाओं को पसंद आया है, इस बात से कोई इंकार भी नहीं कर सकता है। बहस के लिए

हम भले ही यह कह दें कि बिहार में चोरी छिपे हर जगह शराब बिक रही है लेकिन असली

मुद्दा महिलाओं का शराबबंदी के फैसले के समर्थन में होना ही है। इसलिए बिहार में अब

नीतीश कुमार सरकार के मुखिया तो होंगे लेकिन दरअसल सरकार पर उनका पूर्ण

नियंत्रण होगा अथवा नहीं, यह बहस का मुद्दा बना है। अब दूसरी तरफ झांक लें तो सत्ता

और विपक्ष के बीच सीटों का अंतर बहुत कम है। ऐसे में बहुमत के 122 का आंकड़ा भी

राजग के लिए निश्चित तौर पर खतरे की घंटी है।

बिहार में बहार के पेंच दोनों खेमा में उलझे हैं

भाजपा और जदयू के अलावा इस गठबंधन को हम के चार और वीआईपी पार्टी के चार

विधायकों के समर्थन से ही बहुमत का यह आंकड़ा प्राप्त हुआ है। भाजपा ने ही अन्य

राज्यों में कुर्सी पाने के खेल में जो चालें चली हैं, उसका उल्टा असर यहां भी दिखना

स्वाभाविक है। जाहिर है कि मौके देखकर यह दोनों समर्थक दल भी मंत्रिमंडल में भाजपा

और जदयू के मुकाबले अधिक सीटों की मांग कर सकते हैं। दूसरी तरफ अगर इन दो

समर्थक दलों में से एक भी इस खेमा से छिटक गया तो बाजी पलट सकती है। ऐसे में

नीतीश कुमार अपनी आदतों के खिलाफ जाकर कितना समझौता कर पायेंगे, यह भी

देखने लायक बात होगी। किसी किस्म के असंतोष को शांति करते हुए मंत्रिमंडल का गठन

कर पाना भी कोई आसान काम नहीं होगा। सामान्य समीकरण के तहत इसके अलावा

नीतीश नहीं लेकिन राजग खेमा में लोजपा का एक विधायक और छह प्रतिशत वोट शेयर

भी है। लिहाजा राजग खेमा में शामिल होकर चुनाव लड़ने वाले हर किसी को संतुष्ट करना

भी कोई आसान काम नहीं रहा है। जरा सी चूक में बिहार में नीतीश कुमार की सरकार

तुरंत ही अस्थिर हो सकती है, इस बात को खुद नीतीश कुमार भी अच्छी तरह जानते हैं।

सबसे बड़े दल के तौर पर उभरे राष्ट्रीय जनता दल का भी सरकारी मशीनरी पर जबर्दस्त

प्रभाव रहेगा, इस बात से भी अब इंकार नहीं किया जा सकता है।


 

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