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तीस वर्षों बाद इंग्लैड के आकाश पर दिखा उल्कापिंड का जलता हुआ टुकड़ा




  • कुछ टुकड़े मिले जबकि अधिकांश हिस्सा जलकर राख हो गया

  • आसमान में शानदार आतिशबाजी का नजारा

  • अंतरिक्ष विज्ञान केंद्र में दर्ज हुई पूरी घटना

  • घरों के दरवाजों में लगे कैमरों में तस्वीर

राष्ट्रीय खबर

रांचीः तीस वर्षों बाद इंग्लैंड के आसमान पर उल्कापिंडों की आतिशबाजी का नजारा दिखा।




इससे पहले वर्ष 1991 में लोगों ने ऐसा ही नजारा देखा था। यह वैज्ञानिक सत्य है कि पृथ्वी

के वायुमंडल में प्रवेश करते ही गुरुत्वाकर्षण के वेग और घर्षण की वजह से ऐसे आसमानी

पिंड जलने लगते हैं।

वीडियो में देखिये घटना और उल्कापिंड के असली खतरे

अधिकांश छोटे आकार के उल्कापिंड को आसमान में ही जलकर राख हो जाते हैं। इंग्लैंड में

इस पर गत 28 फरवरी को आतिशबाजी दिखाने वाले उल्कापिंड की अच्छी बात है कि

उसके कुछ टुकड़े सही सलामत बरामद किये जा सके है। अब इन पिंडों के आधार पर

उनकी संरचना तथा अतरिक्ष के हाल का पता चल पायेगा। पिछले 28 फरवरी की रात को

जब यह उल्कापिंड गिरा तो अधिकांश लोगों की नजर इस पर नहीं गयी थी। इसके बाद भी

अनेक घरों में दरवाजों पर लगे कैमरों ने इसे कैद किया था। इसके अलावा अंतरिक्ष

अनुसंधान के क्षेत्र में काम करने वाले केंद्रों में लगे कैमरों में भी इस घटना को रिकार्ड किया

गया था। आग की लपटों बीच गिरते इस उल्कापिंड का एक टुकड़ा विंचकोम्बे में भी पाया

गया है। ग्लूशेस्टरशायर के एक छोटे से कस्बे में यह पगडंडी पर यह टुकड़ा पड़ा मिलाहै।

इसका वजन मात्र तीन सौ ग्राम है। इसकी तलाश होने के बाद वैज्ञानिकों ने यह भी दावा

किया है कि वर्ष 1991 के बाद यह इंग्लैड की धरती पर पाया जाने वाला पहला उल्कापिंड

का टुकड़ा है।

तीस वर्षों बाद इसे खोजने वाले को पता नहीं था कि यह क्या है

तीस वर्षों बाद आसमान से गिरे इस पत्थर में कार्बोनसियस चोंडराइट के हिस्से हैं। यह

खनिज सिर्फ प्राचीन उल्कापिंडों में ही पाया जाता है। इनमें काफी आर्गेनिक पदार्थ होते हैं

तथा एमिनो एसिड की अत्यंत जटिल संरचना से यह बना होता है इसी वजह से इनके

अध्ययन से हमारे सौर मंडल की प्राचीन स्थिति के बारे में भी नई नई जानकारी मिल

जाती है। इस पत्थर को सावधानी के साथ लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्युजियम भेज दिया

गया है, जहां पहले से भी उल्कापिंड के टुकड़े रखे हुए हैं। इस म्युजियम की वैज्ञानिक सारा




रसेल ने कहा कि यह वैज्ञानिक तथ्य है कि इस किस्म के करीब 65 हजार पत्थर अब तक

पृथ्वी में खोजे गये हैं। लेकिन उनमें से सिर्फ 51 में कार्बोनसियस चोंडराइट पाया गया है।

इसलिए इस बार का आसमानी पत्थर भी महत्वपूर्ण है, जो विज्ञान में नई जानकारी जोड़

सकता है।

सुबह काले रंग के धब्बे दिखे तो उत्सुकता बढ़ी

जहां यह पत्थर था, वहां के स्थानी निवासियो ने अपनी साफ सुथरी पगडंडी में जब काले

रंग के धब्बे देखे तो उनकी उत्सुकता बढ़ी। वहां से मिले पत्थरों को एकत्रित किया गया।

वैज्ञानिकों तक यह पत्थर पहुंचा जो जांच में यह उल्कापिंड का टुकड़ा साबित हुआ। उसके

बाद उसे म्युजियम भेज दिया गया है।

तीस वर्षों बाद आसमान में नजर आने वाली आतिशबाजी के बाद उस आसमानी पिंड के

जलते हुए गिरने से पड़े निशानों को साफ करते हुए जिस व्यक्ति ने यह उल्कापिंड एकत्रित

किया, उसे पता भी नहीं था कि उसके हाथ वैज्ञानिक महत्व का यह बेशकीमती पत्थर है।

इस उल्कापिंड के गिरने और आसमान में आतिशबाजी करने के दृश्य के बारे में वैज्ञानिकों

ने बताया है कि यह 28 फरवरी की रात को जब गिर रहा था तो उस वक्त उसकी गति 50

हजार किलोमीटर प्रति घंटे की थी। इसी वजह से उसके अधिकांश छोटे टुकड़े हुए और

आसमान में ही जलकर राख हो गये। कुछ बड़े टुकड़े थे तो गिरने के क्रम में पूरी तरह नहीं

जले और पत्थर की शक्ल में जमीन पर आ गिरे। वैसे अनुमान है कि इस उल्कापिंड के

और भी टुकड़े जमीन पर गिरे हैं, जिनकी तलाश अभी जारी है। एहतियात के लिए लोगों

को इस बात का भी सुझाव दिया गया है कि ऐसे किसी पत्थर पर संदेह होने पर उसे

दस्ताना पहनकर ही उठाये और उठाने के बाद किसी एल्युमिनियम के पर्त में लपेटकर

रखें। इसके लिए सभी लोग म्युजियम को इसकी सूचना दे सकते हैं ताकि यहां के

वैज्ञानिक जाकर उन पत्थरों का अध्ययन कर सकें। वैसे इनके अध्ययन से इस बात का

पता चल जाएगा कि प्राचीन सौरमंडल की संरचना में किस किस माहौल का कैसे कैसा

प्रभाव पड़ा है।



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