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यू टर्न सरकार के वित्त मंत्री की हास्यास्पद सफाई




यू टर्न सरकार का तमगा शायद यूं ही नहीं मिला है। पंद्रह लाख हरेक के बैंक खाते में आने




को जुमला बताने के बाद से ही अनेक अवसरों पर नरेंद्र मोदी सरकार का अपना पूर्व के

स्टैंड से हट जाना अब कोई नई बात नहीं रही। इसके बीच ही केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला

सीतारमण ने ब्याज दरों के कटौती के बारे में जो सफाई दी है, एक और यू टर्न है और यह

केंद्रीय वित्त मंत्री के बयान के तौर पर हास्यास्पद भी है। कोई केंद्रीय मंत्री अगर इतनी गैर

जिम्मेदारी से इतनी गंभीर बातें कह रहा है तो यह आरोप फिर से स्वतः सिद्ध हो जाता है

कि इस सरकार का हर मंत्री अपने विभाग का काम छोड़कर दूसरे का काम काज देखता है

और मंत्रिमंडल की सारी शक्तियां अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बीच कैद होकर रह

गयी हैं। यह जान लें कि केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोक भविष्य निधि

(पीपीएफ) जैसी लघु बचत योजनाओं पर ब्याज दरों में कटौती के निर्णय को आज वापस

लेने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि ‘चूक’ के कारण ब्याज दरों में कटौती की अधिसूचना

जारी हुई थी। सीतारमण ने ट्वीट किया, भारत सरकार की लघु बचत योजनाओं पर ब्याज

दर वही रहेगी जो 2020-2021 की अंतिम तिमाही में थी, यानी जो दरें मार्च 2021 तक थीं।

पहले दिया गया आदेश वापस लिया जाएगा। आर्थिक मामलों के विभाग द्वारा ब्याज दरों

में कटौती के आदेश के बाद वित्त मंत्री ने यू टर्न लेकर वापस लेने की घोषणा की।

बाद में आर्थिक मामलों का विभाग ने लघु बचत योजनाओं की ब्याज दरों में कटौती के

फैसले को निरस्त करने का औपचारिक आदेश जारी किया।

यू टर्न लेने के पहले ही विरोधियों के निशाने पर

इससे विपक्षी दलों को मौका मिल गया और उन्होंने आरोप लगाया कि चार राज्यों में जारी

विधानसभा चुनावों को देखते हुए ऐसा किया गया है। सरकार ने बुधवार को नए वित्त वर्ष

की पहली तिमाही के लिए लघु बचत योजनाओं पर ब्याज दरों में 50 से 100 आधार अंक

की कटौती की घोषणा की थी। बीते एक साल में यह दूसरा मौका था जब लघु बचत पर

ब्याज दरें घटाई गईं हैं। इससे पहले 2020-21 की अप्रैल-जून तिमाही के लिए लघु बचत

योजनाओं पर ब्याज दरों में 70 से 140 आधार अंक की कमी की गई थी। वित्त मंत्री के

बयान से स्पष्ट है कि लोक भविष्य निधि (पीपीएफ) पर ब्याज दर पहले की तरह 7.1

फीसदी बरकरार रहेगी जबकि बुधवार को इसे घटाकर 6.4 फीसदी किया गया था। अन्य

लघु बचत योजनाओं पर भी ब्याज दरें पहले की तरह ही बनी रहेंगी। उदाहरण के लिए




राष्ट्रीय बचत प्रमाण पत्र (एनएससी) पर 5.9 के बजाय पहले की तरह 6.8 फीसदी और

किसान विकास पत्र पर 6.5 फीसदी ब्याज मिलता रहेगा। सुकन्या समृद्घि योजना की

ब्याज दरों में कटौती कर 6.9 फीसदी कर दिया गया था लेकिन वित्त मंत्री द्वारा कटौती

वापस लेने से अब इस पर 7.6 फीसदी ब्याज बरकरार रहेगा। जब तक श्रीमती सीतारमण

सफाई दे पाती, वे विरोधियों के निशाने पर आ चुकी थी। विपक्षी दल वित्त मंत्रालय के इस

कदम की आलोचना कर रहे हैं। सीतारमण को टैग करते हुए कांग्रेस की नेता प्रियंका गांधी

वाड्रा ने ट्वीट किया, सरकार का गुरुवार का निर्णय चुनाव को देखते हुए लिया गया है।

यानी इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि सरकार की सोच में यह कदम है, जिसे

चुनावी कारणों से अभी वापस लिया गया है लेकिन बाद में मौका देखकर लागू किया जा

सकता है।

इससे साफ है कि सरकार आगे ऐसा करने वाली है

वैसे इस बीच यह जान लेना भी जरूरी है कि पश्चिम बंगाल के चुनाव में तृणमूल से

जबर्दस्त प्रतिरोध का सामना कर रही भाजपा को इन आंकड़ों की जानकारी थी कि 2017-

18 के अनुसार राष्ट्रीय लघु बचत कोष (एनएसएसएफ) में करीब 15 फीसदी सकल

योगदान पश्चिम बंगाल का ही है। शुद्ध योगदान की बात करें तो पश्चिम बंगाल की

हिस्सेदारी 2017-18 के दौरान एनएसएसएफ में 13.2 फीसदी रही। 15 फीसदी शुद्घ

योगदान के साथ महाराष्ट्र पहले नंबर पर है। तमिलनाडु में भी विधानसभा चुनाव हो रहे हैं

और एनएसएसएफ में इस राज्य का योगदान 6.6 फीसदी है। पश्चिम बंगाल उन गिने-चुने

राज्यों में है जहां एनएसएसएफ योगदान में वृद्धि देखी जा रही है। 2007-08 में

एनएसएसएफ में इसकी हिस्सेदारी 12.4 फीसदी थी, जो 2009-10 में बढ़कर 14.1 फीसदी

हो गई। 2015-16 में यह 14 फीसदी से ज्यादा थी। दूसरी ओर तमिलनाडु का

एनएसएसएफ का योगदान इस दौरान थोड़ा घटा है। ऐसे में बंगाल के माहौल के अपने

खिलाफ करने का खतरा तो भाजपा अभी नहीं उठा सकती है। लेकिन ऐसे यू टर्न से जनता

के बीच यह सरकार जिस तरीके से अपनी विश्वसनीयता खो रही है, उसमें किसान

आंदोलन की आग और बड़ा खतरा बनता जा रहा है। ऊपर से यू टर्न  का आरोप फिर से

साबित भी हो रहा है। 



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