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दो उपमुख्यमंत्रियों का मसला बिहार में उलझन वाला है

  • वरिष्ठ पत्रकारों की राय में राजग पर अब भाजपा हावी

  • अब तो नीतीश कुमार अकेला फैसला नहीं ले पायेंगे

  • नीतीश कुमार ने सभी वर्गों के लिए काम तो किया

दीपक नौरंगी

भागलपुरः दो उपमुख्यमंत्रियों का मसला बिहार की राजनीति खासकर सत्तारूढ़ गठबंधन

की राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़े कर रहा है। अधिकांश लोग यह मानते हैं कि सुशील

कुमार मोदी को भी उनके नीतीश प्रेम की वजह से ही हटाया गया है। उनके स्थान पर दो

दो उपमुख्यमंत्रियों को भाजपा ने नीतीश कुमार को काबू में रखने के लिए ही बैठाया है।

इस बारे में उर्दू अखबारों के दो वरिष्ठ पत्रकारों से हुई चर्चा में भी यही बात सामने निकल

कर आयी। जिनसे इस मुद्दे पर बात हुई उनमें आफाक असद आजाद और मिनहाज आलम

ने अपनी स्पष्ट राय रखी।

वीडियो में समझिये इस पूरी चर्चा को

भागलपुर में इनसे बातचीत के दौरान इन तमाम मुद्दों पर चर्चा हुई। यह बात निकलकर

आयी को प्रथमतः बिहार में दो मुख्यमंत्रियों की आवश्यकता ही नहीं थी। इसे भाजपा भी

अच्छी तरह समझती है। बावजूद इसके अगर भाजपा के कोटे से दो दो उपमुख्यमंत्रियों को

जिम्मेदारी सौंपी गयी है तो यह समझना सरल है कि नीतीश कुमार पर अंकुश रखने की

यह राजनीतिक चाल है। खुद नीतीश कुमार भी इस बात को भली भांति समझ रहे होंगे कि

दरअसल दो उपमुख्यमंत्रियो के होने का राजनीतिक निहितार्थ दरअसल क्या है।

बात-चीत में यह बात भी निकली कि आखिर नीतीश कुमार के घर को चिराग से इतनी

आग लगने के बाद भी भाजपा ने उसे अपने साथ क्यों रखा है। आम तौर पर गठबंधन के

सहयोगी के खिलाफ इस तरीके से आग उगलने को गठबंधन धर्म तो नहीं माना जा सकता

है। इसलिए यह माना जाना चाहिए कि चिराग की आग से नीतीश को झूलसाने की भाजपा

की चाल कामयाब रही है। इसका नतीजा है कि बिहार विधानसभा के चुनाव में अब भाजपा

सबसे बड़ी पार्टी है जबकि राजग में नीतीश कुमार के जदयू की भूमिका सीमित हो गयी है।

दो उपमुख्यमंत्रियो के अलावा विभाग का बंटवारा भी स्पष्ट संकेत है

बिहार मंत्रिमंडल में भी विभागों की जिम्मेदारी दिये जाने से यह स्पष्ट होता जा रहा है कि

इस गाड़ी के चालक की सीट पर भले ही नीतीश कुमार नजर आ रहे हैं लेकिन असली

नियंत्रण अब भाजपा के पास है।

दोनों पत्रकारों ने बेबाक तरीके से यह स्वीकार किया कि अपने पूरे कार्यकाल के दौरान

नीतीश कुमार ने समाज के सभी वर्गों को समान नजर से देखा है। काम के मामले में

उनका विरोधी भी यह शिकायत नहीं कर सकता कि नीतीश कुमार ने काम नहीं किया है।

लेकिन अपना यह रिकार्ड नीतीश कुमार आगे भी कायम रख पायेंगे, इस पर संदेश की पूरी

गुंजाइश है।

बिहार में शराबबंदी का मसला भी नीतीश कुमार की लोकप्रियता को कम करने वाला

साबित हुआ है। दरअसल शराबबंदी का फैसला बहुत अच्छा था। लेकिन लगातार बिहार में

जहां कहीं भी शराब के बरामद होने से यह स्पष्ट है कि यह शराबबंदी सिर्फ दिखावे की

चीज है। वैसे अनुभवी पत्रकारों की जोड़ी यह मानती है कि इसमें नीतीश कुमार नहीं बल्कि

प्रशासनिक अधिकारियो की जिम्मेदारी अधिक है। जिन्हें इस शराबबंदी को रोकना था वे

अपनी जिम्मेदारियों का सही तरीके से पालन नहीं कर पाये हैं।

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