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वैश्विक संकट को भी अवसर में बदल लें भारतवर्ष

वैश्विक संकट की वजह से अनेक देशों को अपनी चिकित्सा व्यवस्था में काफी सुधार

करना पड़ा है। यह एक ऐसी चुनौती है, जिसके बारे में कभी कल्पना भी नहीं की गयी थी।

दुनिया के विकसित देशों में परमाणु हमला होने अथवा उल्कापिंड गिरने से आने वाली

तबाही से बचाव तक के प्रबंध है। लेकिन कोरोना का नजर नहीं आने वाला वायरस इन

दोनों संकटों से कहीं बड़ा संकट बनकर पूरी दुनिया पर अभी छाया हुआ है। लेकिन

भारतीय परिदृश्य में बात करें तो इस वैश्विक संकट ने भारत को दवा उद्योग के मामले में

एक नई वैश्विक पहचान भी दिलायी है। दुनिया के अनेक देशों को यह पता भी नहीं था कि

कई मामलों में भारतवर्ष दवा उद्योग में दुनिया के पहले नंबर का देश है। दरअसल दवा

और चिकित्सा उद्योग पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कब्जे के बीच से इस बात को आगे ले

जाने में भारतीय भी मददगार नहीं रहे। एक कड़वी बात है कि यहां की अच्छी दवाइयों के

मुकाबले बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दवा कारोबार चिकित्सकों तक को अधिक फायदा

पहुंचाता रहा है। नतीजा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कोशिशों के बाद भी जेनेरिक दवा

का कारोबार पूरे देश में अब तक सही तरीके से नहीं फैल पा रहा है। दुर्भाग्यजनक स्थिति

यह है कि जिनलोगों पर जेनेरिक दवा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है, वे भी बहुराष्ट्रीय

कंपनियों से निजी लाभ पा रहे हैं और जेनेरिक दवाइयों की आपूर्ति में ऐसा घालमेल कर

रहे हैं कि मरीजों को मजबूरी में फिर से बहुराष्ट्रीय कंपनियों की महंगी दवाई खरीदना पड़

रहा है।

वैश्विक संकट की वजह से दुनिया जान पायी भारत की क्षमता

लेकिन कोरोना का यह वैश्विक संकट बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तमाम कोशिशों के बाद भी

इस बात को छिपा नहीं पाया कि सारी दुनिया में सबसे अधिक वैक्सिन बनाने की क्षमता

भारत की है। कोरोना के वैश्विक संकट के बीच अनेक शोधकेंद्रों को अब भारत में अपनी

वैक्सिन के उत्पादन की तैयारी करनी पड़ी है। इसलिए हम चाहें तो इस संकट को भी एक

अवसर में बदल सकते हैं। लेकिन इसके लिए स्पष्ट तौर पर निजी हितों को दरकिनार तो

करना ही पड़ेगा। अचानक सर पर मंडराने वाली इस आपदा की वजह से देश की स्वास्थ्य

की आधारभूत ढांचा की कमियों को महसूस करने का यह वक्त हमें यह बता रहा है कि

हमारी वास्तविक जरूरतों और वर्तमान संसाधनों के बीच कितनी कमी है। इसी क्रम में

हम अगर इसमें गुणात्मक सुधार करें और मरीज की जेब से उसका दिल निकाल लेने का

कारोबार बंद कर दें तो हम भविष्य में इसी चिकित्सा सुविधाओं की बदौलत चिकित्सा

पर्यटन के क्षेत्र में भी दुनिया में सबसे आगे निकल सकते हैं। वैसे भी पिछले एक दशक में

भारत एलोपैथिक और प्राकृतिक चिकित्सा के लिहाज से चिकित्सा पर्यटन का महत्वपूर्ण

केंद्र बनकर उभर रहा है। कोरोना संकट के हमें अपनी कमजोरियों को समझने का जो

अवसर प्रदान किया है, वैश्विक संकट में हम इन्हीं कमजोरियों को दूर कर अपने देश के

लिए एक वैश्विक अवसर भी पैदा कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर दिल्ली में कोरोना के

लिए की जाने वाली आपात व्यवस्थाओं पर गौर कर सकते हैं।

कोरोना से जो काम तेज हुआ उसे और बेहतर बनाना होगा

वैसे भी कोरोना के मामले में दिल्ली ने यह साबित कर दिया है कि वहां की सरकार ने

वाकई चिकित्सा के क्षेत्र में अन्य सभी सरकारों के मुकाबले अधिक बेहतर काम किया है।

पहले से किये गये इंतजामों की बदौलत ही दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था इस वैश्विक

संकट के दौर में पूरी तरह धराशायी होने से बच गयी है। वरना बिहार में पूरी तरह धराशायी

हो चुकी चिकित्सा व्यवस्था का हाल तो हम देख रहे हैं। तमाम कोशिशों के बाद भी पड़ोसी

राज्य पश्चिम बंगाल अपने यहां के बिगड़ते हालात को काबू में नहीं कर पा रहा है। उत्तर

पूर्व के राज्यों में यह संकट देर से आया है लेकिन तेजी से फैलता ही चला जा रहा है।

लिहाजा महानगरों में हो रहे इंतजाम के साथ साथ हम अपनी प्राथमिक चिकित्सा

इकाइयों को भी सुधार रहे हैं और इसी गुणात्मक सुधार को अगर हम आगे भी कायम रख

पाये तो हम ईलाज के मुद्दे पर हर साल विदेश जाने वाले हजारों करोड़ की विदेशी पूंजी की

भी बचत कर पायेंगे। यह वैश्विक संकट की यह अवसर पैदा कर चुका है कि पहले ईलाज

के लिए विदेश भागने वालों को भी अब अपना देश और अपना घर ही प्यारा लग रहा है।

बदलाव के जारी दौर में जो प्रवासी भारतीय देश लौट रहे हैं, उनकी बदौलत भी भारतवर्ष

इस वैश्विक संकट को अपने लिए बेहतर अवसर में बदलने का पूरा और पर्याप्त लाभ उठा

सकता है। इसके लिए हमें अपने आप में गुणात्मक और ढांचागत सुधार ही तो करना

पड़ेगा। कोरोना संकट में यह काम चल रहा है और इसी काम को आगे बढ़ाते जाने की

जरूरत है।


 

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