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टीआरपी के खेल में जांच हुई तो सरकार भी लपेटे में आयेगी

टीआरपी के खेल का राज खुला तो कई बड़े टीवी चैनलों के साथ साथ केंद्र सरकार की

परेशानियां भी बढ़ गयी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसी टीआरपी के खेल के नाम पर केंद्र

सरकार ने भी इन चैनलों पर मनमाने तरीके से पैसा लुटाया है। वैसे भी कौन सा चैनल

सरकार के लिए काम नहीं करता, यह समझना आज के दौर में बहुत आसान है और उसके

लिए किसी वैज्ञानिक ज्ञान की आवश्यकता भी नहीं है। नरेंद्र मोदी की सरकार की

उपलब्धियां भले ही अनेक हों लेकिन मीडिया जगत को प्रदूषित करने में इस सरकार की

सबसे बड़ी भूमिका रही है। नतीजा है कि लगातार तारीफ सुनते सुनते अब सरकार और

भाजपा को आलोचना सुनने की आदत नहीं रही। इसी आदत की वजह से जब हाथरस पर

मीडिया का तेवर अचानक से आक्रामक हो गया तो सरकार और भाजपा दोनों ही घबड़ा

गये थे। टीआरपी के खेल में दरअसल टेलीविजन चैनलों पर विज्ञापन के लिए निवेश करने

वाली कंपनियां दर्शकों की माप प्रणाली को छोडऩे में कोई जल्दबाजी नहीं दिखा रही हैं

जिसमें कुछ चैनलों द्वारा कथित हेरफेर की गई है। मुंबई पुलिस द्वारा रिपब्लिक टीवी

सहित कुछ चैनलों द्वारा संचालित दर्शकों के रैकेट की घोषणा के एक दिन बाद

विज्ञापनदाताओं का कहना था कि इस मामले में जांच चल रही है ऐसे में किसी निष्कर्ष पर

पहुंचना सही नहीं होगा। अमूल की निर्माता और टेलीविजन पर एक बड़ी विज्ञापनदाता

‘गुजरात सहकारी दूध वितरण संघ’ के प्रबंध निदेशक आर एस सोढ़ी ने कहा, ‘जोड़तोड़

सही नहीं है लेकिन मैं इस मामले में चल रही जांच पर टिप्पणी नहीं कर सकता।’ उन्होंने

कहा, ‘हमारे विज्ञापन से जुड़े फैसले दर्शकों के आंकड़ों पर आधारित हैं।

टीआरपी के खेल में विज्ञापनदाता अब सतर्क हुए

हालांकि, हम अपनी बिक्री टीमों से ही यह विचार-विमर्श करते हैं कि जहां हमारे उपभोक्ता

हैं हम अपने विज्ञापनों का प्रसारण वहीं करें। इस तरह की रणनीति से ही हम अपने

विज्ञापनों से जुड़े फैसले करते हैं।’ मीडिया योजनाकारों और खरीदारों का कहना है कि

समाचार चैनलों को आमतौर पर कुल टीवी दर्शकों में से महज 5 प्रतिशत का साथ मिलता

है लेकिन इसमें विज्ञापन की हिस्सेदारी दोगुनी है और करीब 10 फीसदी तक है। विज्ञापन

देने से जुड़े निर्णय आमतौर पर टेलीविजन रेटिंग अंक (टीआरपी) पर आधारित होता है

ऐसे में ज्यादा दर्शकों को जोडऩे की होड़ इसी वजह को दर्शाती है। लेकिन पर्सनल या होम

केयर उत्पाद तैयार करने वाले एक निर्माता ने कहा कि हेरफेर का मुद्दा चिंता का विषय है।

हालांकि, विकल्प के अभाव में कंपनियां इस मामले पर सफाई देने के लिए दर्शकों से जुड़े

डेटा जारी करने वाली ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल ऑफ इंडिया (बार्क) को इस

मसले पर सफाई देने के लिए समय देने को तैयार हैं। पैनल वाले घरों में सेंध लगाकर

नियमों का उल्लंघन किया जा सकता है, हालांकि बार्क ने सभी स्तरों पर हेरफेर की

गुंजाइश को कम करने के लिए एक सख्त प्रोटोकॉल भी लगाया है। लेकिन मुंबई पुलिस ने

संकेत दिया कि ऐसे मुद्दे हैं इसकी जांच में सामने आए हैं।’ बजाज ऑटो के प्रबंध निदेशक

राजीव बजाज ने शुक्रवार को कहा कि उनकी कंपनी ने नफरत फैलाने वाले तीन चैनलों को

प्रतिबंधित सूची में डाल दिया था और उनकी कंपनी जहर फैलाने वालों से नहीं जुड़ी होगी।

मुंबई पुलिस ने लोगों को रिश्वत दिये जाने की बात कही है

मुंबई पुलिस ने कहा कि टीआरपी हेरफेर में शामिल लोग पैनल वाले घरों में लोगों को

रिश्वत देते हैं और उन्हें कुछ चैनलों को चालू रखने के लिए कहते हैं, भले ही वे उन्हें नहीं

देख रहे हों या घर पर मौजूद नहीं हों। पुलिस ने कहा कि इनमें से कई उपयोगकर्ताओं ने

स्वीकार किया था कि उन्हें ऐसा करने के लिए पैसे दिए गए थे। इस मामले में अब तक

चार लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। मुंबई पुलिस ने हंसा रिसर्च द्वारा दायर पहली

एफ आईआर पर कार्रवाई की थी जिसे बार्क द्वारा दर्शकों की माप के लिए जमीनी स्तर

की निगरानी का काम दिया गया है। हंसा रिसर्च के मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) प्रवीण

निझारा ने एक बयान में कहा कि एजेंसी अधिकारियों का सहयोग कर रही थी। उन्होंने

कहा, ‘हंसा रिसर्च और बार्क ने पिछले कुछ हफ्तों में इस मामले की जांच कराई जिसके

निष्कर्ष के परिणामस्वरूप हंसा रिसर्च ने एक पूर्व कर्मचारी के खिलाफ एफ आईआर दर्ज

की जो कुछ गलत कामों में लगा हुआ था। हंसा रिसर्च हमेशा से सतर्क रही है और हम बार्क

और अधिकारियों के साथ सहयोग करते रहेंगे।’ टीआरपी के खेल से देश की जनता के

अलावा को भ्रम परोसने के साथ साथ अपने लिए अतिरिक्त धन बटोरने का यह काम

कतई समर्थन योग्य नहीं है। अब यह देखना है कि इस टीआरपी के खेल में कौन दूध के

धूले हैं और कौन कोयले सा काला है।


 

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