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त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाने जाने के मायने हलचल बढ़ने वाली है

त्रिवेंद्र सिंह रावत को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया। उनके स्थान पर संघ

के एक अन्य पुराने कार्यकर्ता तीरथ सिंह रावत को राज्य की कमान सौंपी गयी है। इस

घटनाक्रम से सबसे पहले यह स्पष्ट हो गया कि उत्तराखंड के साथ साथ दिल्ली के भाजपा

के अंदर भी गुटबाजी उभर चुकी है। कांग्रेस के गुटबाजी अब खुलकर सामने आ चुकी है

जबकि कई नेता राहुल गांधी के नेतृत्व पर ही सवालिया निशान लगा चुके हैं। दूसरी तरफ

अभी तक भाजपा में खुलकर यह बात सामने नहीं आने के बाद भी गुटबाजी का स्पष्ट

प्रदर्शन झारखंड के स्तर पर भी देखने को मिलता रहता है। एक गुट दूसरे गुट को काटने

की कोशिशों में जुटा है, यह शायद वर्तमान में सिर्फ भाजपा और कांग्रेस की ही बीमारी है।

अन्य दलों में ऐसा नहीं होता क्योंकि नेता एक दल छोड़कर दूसरे दल में चले जाते हैं। यानी

आया राम और गया राम का खेल वहां चलता रहता है। त्रिवेंद्र सिंह रावत को क्यों हटाया

गया, इस बारे में भाजपा नेतृत्व की तरफ से कोई औपचारिक जानकारी न तो दी गयी है

और न भविष्य में दी जाने वाली है। लेकिन यह स्पष्ट होता जा रहा है कि पार्टी की कमान

अब धीरे धीरे नरेंद्र मोदी के हाथों से सरकते हुए अमित शाह के हाथों में जा रही है।

उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत खुद मोदी की पसंद थे। और यह बात पहले से ही स्पष्ट थी

कि नरेंद्र मोदी की पहली पसंद को ही उत्तराखंड की कमान मिलने जा रही है। औपचारिक

तौर पर त्रिवेंद्र सिंह रावत को उत्तराखंड भाजपा विधायक दल का नेता चुने जाने के पहले

से यह बात स्पष्ट थी।

त्रिवेंद्र सिंह रावत का हटना नरेंद्र मोदी की पकड़ कमजोर होना है

अब जबकि उन्हें हटाया गया है तो यह स्पष्ट है कि अन्य व्यस्तताओं में उलझे रहने की

वजह से अब खुद नरेंद्र मोदी ही अपना किला नहीं बचा पा रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह

किसानों के आंदोलन का लगातार जारी रहना भी है। किसानों से जिन इलाकों की

अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है, उन इलाकों में भाजपा को पिछले लोकसभा चुनाव में

भाजपा को जीत प्रचंड बहुमत से जीत मिली थी, उसमें किसानों के वोट का बड़ा महत्व था।

अन्य दलों के तमाम प्रचार के बाद भी किसानों के खाते में सीधी जो रकम दी गयी थी,

उसने भी चुनाव में कमाल दिखाया था। अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और

राजस्थान के किसानों से भाजपा का भय स्वाभाविक है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि इस

किसान आंदोलन से उपजी परिस्थितियों का परिणाम क्या हो सकता है, यह पंजाब के

चुनाव में दिख चुका है। अगले पांच राज्यों के चुनावों में भी जो परिस्थितियां भाजपा के

पक्ष में दिख रही थी, वे धीरे धीरे बदलती जा रही हैं। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री वाले दौर

की दो सांसदों वाली भाजपा हर दूसरे दिन जंतर मंतर को प्रदर्शनकारियों से पाट देती।

आज का विपक्ष नाराज होकर ट्वीट करता है और अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पा लेता है।

खुद को जनता का हितैषी बताकर कभी छाती पीट पीट कर रोने वाले भाजपा नेता भी

इनदिनों जनता के सवालों पर चुप्पी साधे बैठे हैं। उनकी भी हालत कांग्रेस के जैसी ही हो

चुकी है। उनमें से भी अधिसंख्य ऐसे हैं जो अब सरकार की नाराजगी झेलने की स्थिति में

ही नहीं है। खुद को ऐसे मसलों से अलग रखने वाले विपक्ष के नेता अब किसान आंदोलन

का राजनीतिक लाभ उठाने की सोच रहे हैं लेकिन पूर्व के अनुभवों की वजह से किसान भी

अब चालाक हो गये हैं।

किसान आंदोलन ने भाजपा को चारों तरफ से घेर रखा है

भाजपा भले की इस किसान आंदोलन से अप्रभावित दिखा रही हो लेकिन खुद को आगामी

चुनाव के लिए किसने कितनी परेशानी में डाल रखा है, यह तो भाजपा नेता बखूबी समझ

रहे हैं। उनकी मजबूरी है कि खुद को सत्ता के कोप से बचाये रखने के लिए चुप्पी साधे

रहना उनकी अपनी मजबूरी है। उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव से पहले भाजपा के लिए

सबसे अधिक प्रतिष्ठा का प्रश्न पश्चिम बंगाल का चुनाव है। ऐसे में त्रिवेंद्र सिंह रावत को

हटाये जाने के बाद अब हरियाणा पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। वहां के संकट दूसरा

है क्योंकि सरकार में साझेदार जेजेपी के विधायक देवेंद्र सिंह बबली ने कहा है कि 15 दिनों

में किसानों के मुद्दे का हल कर देना चाहिए नहीं तो फिर हमें अपना समर्थन वापस ले लेना

चाहिए। इसलिए त्रिवेंद्र सिंह रावत पर हुए फैसले जिस चीज की शुरुआत हुई है, वह आगे

भी जारी रहेगी, ऐसा अनुमान एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन भाजपा के लिए यह

सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या अमित शाह को नरेंद्र मोदी का योग्य उत्तराधिकारी माना

जा सकता है। अभी इस सवाल पर संतोषजनक उत्तर तो भाजपा के नेता भी नहीं दे सकते

हैं। लेकिन आसमान पर छाये बादलों को देखकर मौसम का अंदाजा हो ही जाता है। 

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