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पेड़ पौधे भी एलार्म लगाकर सोने का समय तय करते हैं

  • सिर्फ इंसान ही घड़ी का इस्तेमाल नहीं करते

  • जैविक घड़ी से उन्हें संकेत मिलते रहते हैं

  • जटिल जैविक प्रक्रिया से तैयार हुई है विधि

  • फूल खिलने और मुरझाने का भी रिश्ता है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः पेड़ पौधे खुद को जिंदा रखने के लिए कई किस्म के उपाय करते हैं। इनमें जेनेटिक

स्तर पर वायरसो के हमलों से बचाव का आंतरिक सुरक्षा प्राप्त करन की जानकारी

वैज्ञानिकों को पहले से है। अब पहली बार यह जानकारी सामने आयी है कि पेड़ पौधे

नियम समय पर सो जाने के लिए अपनी जैविक एलार्म का इस्तेमाल करते हैं। पूर्व में

स्थिर जीवन में मौजूद इस गुण का पता वैज्ञानिकों को नहीं चल पाया था। इस संबंध में

किये गये शोध के बाद इसके संबंध में कई किस्म की नई जानकारियां मिल पायी हैं। हर

पेड़ पौधे के अंदर एक ऐसी जैविक घड़ी होती है जो शाम होते ही उन्हें सो जाने का एलार्म

देने लगती है। इस एलार्म के मिलते ही पेड़ पौधे निद्रा की तरफ चले जाते हैं। वैसे भी बता

दें शायद प्राचीन काल में इस अवस्था की जानकारी लोगों को थी। इसी वजह से हिंदू धर्म

में यह पौराणिक और सामाजिक मान्यता है कि सूर्य डूबने के बाद पेड़ों को काटा नहीं जाता

है अथवा पौधों को उखाड़ा नहीं जाता है। यहां तक कि अंधेरा होने के बाद पेड़ पौधों से फूल

तोड़ना भी सामाजिक परंपराओं में वर्जित है।

वीडियो में जान लीजिए प्रकृति के इस अद्भूत नियम को

इस तरीके से एलार्म बजने के बाद सो जाने वाले पेड़ पौधों को इससे जिंदा रहने में मदद

मिलती है। नींद की अवस्था में उनकी शरीर यानी तना और डालियों में नये सिरे से ऊर्जा

का संचार होता है। अगली सुबह जब सूर्य की किरणें पेड़ पौधों की पत्तियों पर पड़ती है तो

फिर से फोटो संश्लेषण की विधि से वे ऊर्जा संचय करने में नई ताकत के साथ जुट जाते

हैं। जब वे सो जाते हैं कि दिन भर की संचित ऊर्जा से उन्हें ताकत मिलती रहती है।

इसकी खास विशेषता के बारे में वैज्ञानिकों को यह जानकारी भी मिली है कि इन पेड़ पौधों

को एलार्म के साथ साथ अगले दिन के सूर्योदय का भी पता होता है। इसी हिसाब से वे

अपनी निद्रा की अवस्था को व्यवस्थित कर लेते हैं। दरअसल दिन के वक्त सूरज की

रोशनी से पत्तों में जो फोटो संश्लेषण की प्रक्रिया होती है, उससे यह ऊर्जा खास किस्म के

शक्कर में तब्दील हो जाती है। यह अत्यंत परिष्कृत किस्म का शक्कर ही उनकी ऊर्जा का

असली आधार है। जिस घड़ी के आधार पर इनमें यह प्रक्रिया चलती रहती है, उसे

वैज्ञानिकों ने सिरकाडियन घड़ी का नाम दिया है। यह दरअसल ऐसे जीवन के अंदर मौजूद

जीन पर आधारित जैविक घड़ी है। यह चौबीस घंटे तक अपनी जरूरत के हिसाब से

लगातार काम करता रहता है।

पेड़ पौधों की यह अंदर की संरचना की खास विशेषता है

यार्क विश्वविद्यालय के पूर्व और वर्तमान में मेलबोर्न विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ

माइक हेइडन कहते हैं कि यह उनकी शारीरिक संरचना का आंतरिक हिस्सा है। इस घड़ी के

सही होने पर पेड़ पौधों के जीवित रहने का मसला निर्भर है। अपने सुनने में भले ही एक

आसान सी बात लगे लेकिन आंतरिक तौर पर यह एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया है। जो

क्रमिक विकास के तहत पेड़ पौधों में इस तरीके से विकसित हुई है। इस मामले की जांच

करने वाले वैज्ञानिक दल ने यह पाया कि इनके अंदर ऐसे मेटाबॉलिक प्रक्रिया होती है।

इसके तहत ही अलग अलग जरूरतों के लिए मौजूद जिन सक्रिय होते रहते हैं। इनका

नियंत्रण एक रसायन करता है, जिसे सुपरॉक्साइड नाम दिया गया है। शाम तक यह सभी

जिन सक्रिय रहते हैं।

अंधेरा होने पर सिर्फ चंद जीन ही घड़ी का काम करते रहते हैं

उसके बाद सिर्फ जैविक घड़ी को सक्रिय रखने वाले जिन काम करते रहते हैं और बाकी

जिन निष्क्रिय पड़ जाने की वजह से पेड़ पौधे निद्रा की अवस्था में चले जाते हैं। फोटो

संश्लेषण पर आधारित इस जीवन चक्र में जितना महत्व सूर्य की रोशनी का है उससे कम

महत्व इस जैविक घड़ी का नहीं है। वे जहां मौजूद होते हैं, वहां के जिनों को कब और

कितना सक्रिय होना है, यह बताते रहते है। इससे पेड़ पौधों के विकास का क्रम जारी रहता

है। फसल का चक्र बदल देने के लिए इस जैविक घड़ी के इस्तेमाल से बेहतर परिणाम पाये

जा सकते हैं, ऐसा वैज्ञानिकों का मानना है लेकिन इस किस्म के बदलाव से जेनेटिक तौर

पर संबंधी प्रजाति पर क्या कुछ असर पड़ सकता है और उसके नफा नुकसान को कृषि

वैज्ञानिक अभी तौल लेना चाहते हैं ताकि अचानक से इसे आजमाने का कोई बड़ा नुकसान

ना उठाना पड़े। ब्रिस्टल के विश्वविद्यालय के डॉ एंटोनी डॉड ने कहा कि यह पेड़ पौधों के

अंदर की प्रक्रिया की जानकारी है। इसलिए अगर इस प्रक्रिया को बदला जा सका तो उसके

परिणाम भी बदले जा सकेंगे। कई पौधे शाम होते ही बंद हो जाते हैं और सूर्य के उगते ही

खिल जाते हैं, यह भी उसी आंतरिक प्रक्रिया का एक हिस्सा ही है।

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