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पेड़ पौधों के जीवन चक्र से कोरोना से बचाव की तलाश शुरु

  • पौधे के बीज पर सबसे अधिक हमला होता है

  • बिना किसी बाहरी मदद के इनसे लड़ता है बीज

  • इस विधि की तकनीक से इंसान भी लेगा लाभ

  • वनस्पति जीवन का अध्ययन कर रहे हैं वैज्ञानिक

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः पेड़ पौधों के जीवन की अपनी बचाव तकनीक है। इसके बारे में विज्ञान सम्मत

जानकारी भी है। अब कोरोना वायरस का भय अब वैज्ञानिकों को पेड़ पौधों की जीवन शैली

पर नये सिरे से विचार करने को प्रेरित कर रहा है। इस बारे में कुछ प्रकाशित शोध प्रबंधों में

उल्लेखित तथ्यों पर नये सिरे से विचार किया जा रहा है। ऐसा सिर्फ इसलिए किया जा रहा

है ताकि पेड़ पौधों के जीवन चक्र में सांकेतिक संदेशों को समझने और पकड़ने की विधि को

देखकर इंसान भी अपने ऊपर मंडराते खतरों से बचाव कर सके। यह पहले से ही पता है कि

पेड़ पौधे अपने स्तर पर अपने ऊपर होने वाले फंगस और कीटों से बचाव का भरसक

प्रयास करते हैं। अनेक ऐसे उदाहरण मौजूद हैं, जहां इस किस्म का जैविक हमला होने की

स्थिति में पौधे अपनी आतंरिक संरचना से ही ऐसे रसायन पैदा कर लेते हैं, जो अपने ऊपर

होने वाले हमलों को बेकार कर देता है।

पूर्व में शोध के निष्कर्षों के आधार पर आगे काम

वैज्ञानिकों ने पूर्व में हुए शोध के आधार पर जिनोम आधारित इस अनुसंधान को काम में

लगाने पर काम प्रारंभ किया है। पहले हो चुके इस प्रयोग में एक छोटे से फूल वाले उस पौधे

को शामिल किया गया है, जिसके सभी जिनोम की पहचान पहले से हो चुकी थी। इसे कई

प्रतिकूल परिस्थितिओं में रखने के बाद उसमें होने वाले परिवर्तनों को देखा गया है। इस

क्रम में जासोमोनिक एसिड नाम के हारमोन की भूमिका स्पष्ट हुई है तो बचाव में अग्रिम

पंक्ति में आकर काम करता है। अमेरिका के हावर्ड हूज्स मेडिकल इंस्टिट्यूट में वैज्ञानिकों

ने यह काम किया है। इस बारे में एक शोध प्रबंध भी प्रकाशित किया गया है। जिसके

आधार पर अब कोरोना वायरस का भय दूर करने के लिए वैकल्पिक विधि की तलाश की

जा रही है।

पेड़ पौधों के जीवन से बचाव के विकल्प की तलाश

शोधकर्ताओं ने पाया है कि विशेष परिस्थिति में ही किसी भी पौधे की प्रोटिन उत्पादन की

गुणवत्ता में परिवर्तन आता है। इससे स्पष्ट है कि अपने ऊपर हमला होने की स्थिति में

ऐसे पौधे की संदेश प्रसारित करते हैं। पौधे की आंतरिक संरचना में इसी संदेश के माध्यम

से प्रोटिन उत्पादन की दिशा और दशा बदल जाती है। इसी बदलाव की वजह से जो नये

हारमोन पैदा होते हैं, वे फंगस अथवा कीटों को मारने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

शोध से जुड़े वैज्ञानिक बताते हैं कि जब कोई बीज मिट्टी में डाला जाता है तो वह मिट्टी में

मौजूद कीटाणुओं से लड़कर विजयी होता है। इसी जीत के बाद पौधा जमीन के ऊपर

निकलता है। अगर यह जंग बीज हार जाता है तो वह पौधा नहीं बनता। हर किस्म की

फसल की पैदावार में इस प्रारंभिक कड़ी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कोरोना वायरस

का भय इसलिए भी अधिक क्योंकि इसके इंसानी शरीर में प्रवेश से लेकर बीमारी को

अत्यधिक बढ़ा देने के बीच शरीर अपने स्तर पर कोई प्रतिक्रिया अथवा बचाव की तकनीक

नहीं अपना पा रहा है।

मिट्टी के अंदर होने वाला हमला समझ में आया तो रास्ता मिलेगा

पौधों के जीवन के विकास की पद्धति को समझने के बाद वैज्ञानिकों ने बताया है कि मिट्टी

के अंदर होने वाले हमलों से जीत हासिल करने के लिए बीज में मौजूद कई गुण एक दूसरे

की मदद करते हैं। उसमें मौजूद अनेक जीन एक दूसरे के साथ संपर्क स्थापित कर उसे

बीज से पौधा बनाने में मदद करते हैं। इस प्रक्रिया को बेहतर तरीके से समझ लेने के बाद

कोरोना वायरस का भय भी नियंत्रित होने की श्रेणी में लाया जा सकेगा।

पेड़ पौधे से के विषाणु हमला से बचाव प्रारंभ होने की तकनीक बनेगी

इससे हमला होने के दौरान ही शरीर के आंतरिक अंगों को इस हमले की जानकारी मिलते

ही विषाणु को मारने वाले रसायनों का तैयार होने और उनका काम करना प्रारंभ किया जा

सकेगा। इसके लिए नये सिरे से जेनेटिक विज्ञान की अनसुलझी गुत्थियों को तेजी से

सुलझाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। पौधों की यह जीवन प्रक्रिया कमोबेशी

इंसानी अथवा किसी अन्य गर्भस्थ शिशु के विकास जैसी ही है। मिट्टी के अंदर अंधेरे में ही

बीज से पौधा बनता है ठीक उसी तरह गर्भ के अंधेरे में शिशु का विकास होता है।

बीज के अंदर की गतिविधियों से ज्यादा जानकारी मिलेगी

इस शोध से जुड़े लॉ ट्रोवे विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक मैथ्यू लीवेसे कहते हैं

कि विकास की यह पहली कड़ी ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दौरान बीज सबसे अधिक

असहाय अवस्था में होता है। अपने ऊपर होने वाले तमाम हमलों को विफल करने के लिए

उसे कोई बाहरी मदद तो नहीं मिलती है। अमेरिका के साल्क इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिक भी

इस शोध से जुड़े हुए हैं। वे पौधों के हारमोन प्रक्रिया और उससे तैयार होने वाले कीटनाशक

एसिडों के बनने को विस्तार से समझना चाहते हैं। कोरोना वायरस के भय से पीड़ित

दुनिया को इससे चुनौती से राहत दिलाने में जुटे वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को भी बारिकी से

समझ रहे हैं। इसपर आधारित जेनेटिक इंजीनियरिंग की तकनीक का विकास होने की

स्थिति में कोरोना वायरस का भय अपने आप ही कम किया जा सकेगा।


 

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