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ईलाज का खर्च या सस्ते अस्पताल दोनों में से कौन ज्यादा फायदेमंद




ईलाज के मामले में केंद्र सरकार की आयुष्मान योजना का लाभ निश्चित तौर पर

उन तमाम लोगों को मिल रहा है, जो पहले इस किस्म की चिकित्सा सुविधा पाने की आर्थिक हैसियत नहीं रखते थे।

इस योजना को लागू किये जाने की वजह से ऐसे गरीब और मध्यम आय वर्ग के लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो पा रहा है।

दूसरी तरफ सरकारी पहल पर देश भर में जन औषधि केंद्रों के माध्यम से भी गरीबों को जेनेरिक दवाइयों की आपूर्ति हो रही है।

इससे भी और कुछ नहीं तो कमसे कम गरीबों की जेब का पैसा बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जेबों में जाने से बच रहा है।

दूसरी तरफ दिल्ली सरकार इस योजना से अलग सरकारी अस्पतालों में बेहतर ईलाज के उपायों पर काम कर रही है।

लेकिन गरीबों को बेहतर ईलाज के नाम पर कहीं देश किसी दूसरे किस्म की दलाली के चक्कर में तो

नहीं फंस रहा है, यह बड़ा सवाल बनकर उभर रहा है।

आष्युमान कार्ड की बदौलत जिन अस्पतालों में ईलाज हो रहा है,

वे जायज पैसा ले रहे हैं, इसकी जांच के लिए अभी कोई प्रक्रिया हमारे पास नहीं है।

गरीबों को बेहतर ईलाज मिले, इस बात पर किसी को एतराज नहीं हो सकता

लेकिन इस बहाने देश के आर्थिक संसाधन फर्जी बिल के नाम पर फिर से चंद लोगों की जेबों में चला जाए,

यह कोई अच्छी बात नहीं है।

देश में जेनेरिक दवाइयों का कारोबार सरकारी संरक्षण में चालू किये जाते ही चिकित्सा व्यवस्था में फैली दलाली का राज भी सामने आने लगा था।

इस बात का सभी को अच्छी तरह पता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बेशकीमती दवा लिखने का

कारोबार भी कोई साफ सुथरा नहीं रहा है।

जेनेरिक दवाई की व्यवस्था सिर्फ नरेंद्र मोदी की पहल से चालू हो पायी है

इसलिए जेनेरिक दवाइयों के कारोबार को चालू करने तक में काफी प्रतिरोध और अड़चनों का सामना करना पड़ा था।

यह तो सरकार और खास तौर पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इच्छा थी जिसकी वजह से

देर से ही सही लेकिन यह काम धीरे धीरे पटरी पर आता गया।

अब इन्हीं जेनेरिक दवाइयों की वजह से बहुराष्ट्रीय कंपनियों का एकाधिकार का कारोबार धीरे धीरे कम हो रहा है।

लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि इन सस्ती दवाइयों की बदौलत लोगों की जेबों पर पड़ने वाला

अतिरिक्त आर्थिक बोझ कम हो रहा है।

यह प्रत्यक्ष तौर पर राष्ट्रीय बचत की स्थिति है।

वरना पहले इसी मुद्दे पर विभागीय मंत्री मनसुख लाल मांडविया ने मंगलवार को संसद को बताया है कि

ईलाज पर होने वाले खर्च की वजह से देश में हर साल तीन करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं।

श्री मांडविया ने एक पूरक प्रश्न के उत्तर में कहा कि देश में हर साल तीन करोड़ आठ लाख लोग

दवाई और इलाज के खर्च के कारण गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं।

ईलाज के आर्थिक बोझ से गरीब हो जाते हैं अनेक लोग

उन्होंने कहा कि जनौषधि केंद्रों पर 714 दवाएँ और 53 शल्य चिकित्सा सामग्रियाँ सस्ते में मिल रही हैं

उनमें मिलने वाली जेनरिक दवाओं की कीमत ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 50 से 90 प्रतिशत तक कम हैं।

इससे मध्यमवर्गीय तथा गरीब परिवारों को सालाना दो हजार रुपये की बचत हो रही है।

उन्होंने कहा ‘‘हमारी सरकार गरीबों को सस्ती दवाएँ उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है।

आज जनौषधि केंद्र मोदी जी की दुकान के नाम से मशहूर हो रहे हैं। यह सेवा भी है, रोजगार भी।

’’ उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा स्टेंट की अधिकतम कीमत तय किये जाने से

हृदय रोगियों को 4,547 करोड़ रुपये और घुटना बदलने की

अधिकतम लागत तय करने से मरीजों को 1,500 करोड़ रुपये की बचत हुई है।

श्री मांडविया ने कहा कि अमेरिका में बिकने वाली हर पाँचवीं दवा और दुनिया में बिकने वाली हर छठी दवा भारत में बनी जेनरिक दवा है।

देश में जनौषधि की इनकी लोकप्रियता बढ़ी है और दवा बाजार में इनकी हिस्सेदारी पाँच साल में दो प्रतिशत से बढ़कर आठ प्रतिशत पर पहुँच गयी।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आयी थी उस समय देश में कुल 72 जनौषधि केंद्र थे।

अब इनकी संख्या बढ़कर 5,410 पर पहुँच गयी है।

इस दौरान इनकी बाजार हिस्सेदारी भी दो फीसदी से बढ़कर आठ फीसदी पर पहुँच गयी है।

इससे स्पष्ट हो जाता है कि इससे पहले बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दवा के नाम पर

देश की गरीब जनता का कितना धन लूटा जाता रहा है।

लेकिन आयुष्मान योजना और दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में

मुफ्त सेवा के फायदों का तुलनात्मक अध्ययन होना चाहिए ताकि यह तय हो सके कि

देश की जनता को फायदा मिलने के साथ साथ किस रास्ते पर

चलने से देश को अधिक आर्थिक और स्वास्थ्य लाभ का फायदा मिल सकता है।



Rashtriya Khabar


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