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पृथ्वी की तरफ तेजी से आ रहा है एक और उल्कापिंड




  • एक से बचे तो दूसरा खतरा मंडराने लगा फिर से 

  • डिडोमॉस नाम रखा है इस उल्कापिंड का

  • दो अभी हाल ही में करीब से गुजरे हैं

  • डार्ट अभियान से दिशा बदलने का काम होगा

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः पृथ्वी की तरफ एक और उल्कापिंड तेजी से भागता हुआ चला आ रहा है।

इस उल्कापिंड से बचाव की तैयारियां भी प्रारंभ कर दी गयी हैं।

इससे पहले ही दो उल्कापिंड पृथ्वी के बगल से गुजर चुके हैं।

वैसे ये दोनों उल्कापिंड एक साथ ही गुजरे थे।

एक समय ऐसा भी आया था जब इन दोनों उल्कापिंडों के बीच की दूरी महज 3.2 लाख मील रह गयी थी।

अब नये उल्कापिंड के बारे में यह जानकारी मिली है कि इसकी धुरी भी पृथ्वी के करीब आने की बन चुकी है।

इसे पहले से ही डिडीमॉस भी कहा जाता है।

वीडियो में देखिये उन्हें कैसे नष्ट करना चाहती है नासा

इसके बारे में बताया गया है कि यह आकार में थोड़ा छोटा है।

इसकी लंबाई करीब 780 मीटर है और चौड़ाई करीब 160 मीटर आंकी गयी है।

इसके चारों तरफ भी एक और पत्थर चक्कर काटता हुआ घूम रहा है।

उस उल्कापिंड के बारे में वैज्ञानिकों को पता है कि यह हर दो साल में सूर्य का चक्कर काट लेता है।

इससे पहले गत नवंबर 2003 में भी यह पृथ्वी के काफी करीब आया था।

उस वक्त पृथ्वी से उसकी दूरी करीब साढ़े चार लाख मील थी।

अब वैज्ञानिकों की गणना है कि वर्ष 2123 में यह पृथ्वी के बिल्कुल करीब होगा।

उस वक्त पृथ्वी के वायुमंडल से मात्र 5.9 किलोमीटर की दूरी से यह गुजर जाएगा।

जाहिर है कि इतने करीब से उल्कापिंड के तेजी से गुजरने का प्रभाव पृथ्वी पर पड़ेगा।

पृथ्वी की तरफ आते उल्कापिंड को हटाने के लिए नासा का डार्ट अभियान

इसी सोच के तहत नासा ने अपने डार्ट अभियान को प्रारंभ किया है।

इस डबल एस्ट्रायड रिडायरेक्शन मिशन (डार्ट) की तैयारी उल्कापिंड को पृथ्वी से दूर नष्ट करने अथवा उसे दूसरी दिशा में धकेल देने की है।

यह तैयारी इसलिए भी की जा रही है कि पृथ्वी के इतने करीब से गुजरने के दौरान पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव भी इस पर पड़ सकता है।

वैसी स्थिति में यह दिशा बदलकर पृथ्वी पर भी आ सकती है।

वर्तमान में इसकी गति काफी तेज आंकी जा रही है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक अभी यह उल्कापिंड 6.6 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से आगे बढ़ रहा है।

नासा के इस डार्ट अभियान से जुड़े वैज्ञानिक इसे बाहरी धक्के की मदद से पृथ्वी की धुरी से दूसरी तरफ धकेल देना चाहते हैं।

डार्ट अभियान के तहत अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले उपकरण को सौर ऊर्जा से ही मदद मिलेगी।

यह इसी सौर ऊर्जा की मदद से आगे बढ़ता जाएगा।

इस महाकाश यान के सितंबर 2022 में डिडीमॉस के करीब पहुंचने की तैयारी की गयी है।

उस वक्त यह उल्कापिंड भी पृथ्वी से करीब 110 लाख किलोमीटर की दूरी पर रहेगा।

इसका स्पेस एक्स फॉल्कन राकेट ही उल्कापिंड की दिशा बदलने का काम करेगा।

डार्ट अभियान से भविष्य की तकनीक को सुधारन में मदद भी मिलेगी

वैज्ञानिक मानते हैं कि इस तकनीक के सफल रहने पर उल्कापिंड की चारों तरफ चक्कर काट रहे छोटे उपग्रह की रफ्तार भी एक प्रतिशत कम हो जाएगा।

लेकिन इसके बाद भी वैज्ञानिक इसके आगे बढ़ने पर नजर बनाये रखेंगे ताकि भविष्य में इसके घूमकर फिर पृथ्वी की तरफ आने का पहले से ही पता चल सके।

वैज्ञानिक इस डार्ट अभियान के माध्यम से इस बात की भी जांच कर लेना चाहते हैं कि

उल्कापिंडों को पृथ्वी की तरफ आने से रोकने के लिए यह उपाय भविष्य के लिए कितना कारगर साबित होता है।

प्रथम परीक्षण के आंकड़ों के आधार पर भविष्य के लिए इस किस्म के अभियानों में अन्य संशोधन भी किये जाएंगे।

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Rashtriya Khabar


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