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शून्यता से भरे सौरमंडल भी इस महाकाश में मौजूद




हब्बल टेलीस्कोप से वैज्ञानिकों को नजर आया नजारा
ऐसे छह इलाकों की अब तक पहचान हुई है
वहां न तो तारें हैं और न ही कोई ब्लैकहोल
वैज्ञानिकों के पास अभी इसका उत्तर नहीं
राष्ट्रीय खबर

रांचीः शून्यता से भरे सौरमंडल भी इस महाकाश में मौजूद हैं। पहली बार इनके बारे में जानकारी मिली है। इस जानकारी की वजह से अब खगोल वैज्ञानिक वहां की स्थिति का गहन अध्ययन कर रहे हैं ताकि यह पता चल सके कि आखिर वहां इस किस्म की वीरानी क्यों है। आम तौर पर महाकाश में लाखों करोड़ों सौरमंडल हैं, जिसमें से हमारे सौरमंडल का आधार सूर्य है।




लेकिन उससे बाहर भी लाखों करोड़ों प्रकाश वर्षों की दूरी पर ऐसे अनेक सौरमंडल हैं। इनमें से पहली बार छह ऐसे सौरमंडलों की पहचान हुई है, जहां कुछ भी नहीं हैं यानी यह पूरी तरह शून्यता वाला इलाका है। अंतरिक्ष में लगातार चहल पहल होने के बाद भी यह इलाका ऐसा क्यों हैं, यह नया सवाल खड़ा हो गया है।

आम तौर पर अंतरिक्ष में मौजूद ब्लैक होल की वजह से वहां भी सक्रियता होने की झलक मिलती जाती है। लेकिन आस पास के सौरमंडलों में प्रकाशवान तारों की चमक के बीच यह इलाका अंधेरा है क्योंकि वहां न तो कोई तारा है और न ही ब्लैक होल है।

इसी वजह से शून्यता से भरे इस इलाके को वैज्ञानिक और गहराई से समझना चाहते हैं। इसकी पहचान करने में हब्बल टेलीस्कोप की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिसने अपनी यांत्रिक आंखों से इसके बारे में वैज्ञानिकों को बताया है।

वैसे हब्बल टेलीस्कोप ने अब तक छह अति प्राचीन सौरमंडलों की भी खोज की है। इनमें न तो तारों का निर्माण हो रहा है और न ही कोई अन्य गतिविधि दर्ज हो रही है। फिलहाल वैज्ञानिकों के पास इस प्रश्न का विज्ञान सम्मत उत्तर नहीं है। प्रारंभिक अनुमान है कि किसी कारण से इन सौरमंडलों में तारों के निर्माण लायक कोई माहौल ही नहीं हैं।

शून्यता से भरे इलाकों में कोई तारा भी नहीं

वहां तारों के बनने के लिए जो अनिवार्य आवश्यकताएं होती हैं, वे नदारत है। लेकिन वहां कोई ब्लैक होल भी नहीं हैं, जो तारों को निगलता रहता है। आम तौर पर सौर मंडल में तारों का निर्माण एक नियमित प्रक्रिया है। ब्लैक होल के करीब होने से तारों का उसमें समा जाना भी एक नियमित प्रक्रिया है। इन शून्यता से भरे सौरमंडलों में ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है।

एक खास वैज्ञानिक अभियान के तहत अलग से इनकी पहचान की गयी है। इस अभियान का मुख्य मकसद सौरमंडलों में मौजूद परिस्थितियों का अध्ययन कर उनके फायदों के चिह्नित करना है। वहां के गुरुत्वाकर्षण के बल के आधार पर ऐसे इलाकों की पहचान की जाती है और भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों में काम आने वाले आंकड़ों को दर्ज किया जाता है।




जब कभी हमारा विज्ञान प्रकाश वर्ष की दूरी तय करने में सक्षम होगा तो इन आंकड़ों का उपयोग भी उस काल के खगोल वैज्ञानिक कर सकेंगे। अंतरिक्ष अनुसंधान में इस बात की जानकारी पहले ही हो चुकी है कि हर ऐसे सौरमंडल के सामने एक ऐसा आभामंडल है, जो वहां के तारों की रोशनी से चमकती है। इसी वजह से वहां के पीछे का नजारा टेलीस्कोप सही तरीके से नहीं देख पाता है।

वहां के आंकड़ों का विश्लेषण कर सही स्थिति का पता लगाया जाता है। ऐसे ही खोज के तहत इन छह शून्यता से भरे इलाकों की पहचान हुई है। इस बारे में हुए शोध के मुख्य लेखक क्रिस्टिना विलियम्स कहती हैं कि इस किस्म का खोज कर लेना भी अपने आप में बड़ी बात है। टेलीस्कोप के माध्यम से जब आप महाकाश को देखते हैं तो असंख्य तारों के बीच किसी ऐसे इलाके को खोज लेना ही महत्वपूर्ण है।

फिर किसी महाविस्फोट से शायद प्रारंभ होगा नवनिर्माण

गुरुत्वाकर्षण आधारित विश्लेषण के बिना इन इलाकों की पहचान करना भी कठिन है क्योंकि पूरी तरह शून्यता से भरे होने की वजह से वे आम तौर पर खाली इलाके ही नजर आते हैं। गुरुत्वाकर्षण आधारित तकनीक से ही इन शून्यता से भरे इलाकों की पहचान अलग सौर मंडल के तौर पर की जा सकी है।

अब वहां मौजूद ठंडे हाइड्रोजन गैस की पहचान से उनके होने की पुष्टि हुई है। वैसे खगोल वैज्ञानिक भी मानते हैं कि इस एक समाधान को तलाशने के दौरान कई नये प्रश्न उठ गये हैं क्योंकि पहली इस बात की उम्मीद नहीं थी कि महाकाश में ऐसा इलाका भी हो सकता है जो पूरी तरह शून्यता से भरे पड़े हों।

एक अनुमान यह भी है कि यह सौरमंडल समय के साथ साथ पूरी तरह मर चुका है क्योंकि उसके अंदर मौजूद सारे तारे भी अपनी जीवन पूरा कर समाप्त हो चुके हैं। इस वजह से उन्हें अति प्राचीन सौरमंडल भी माना जा सकता है लेकिन अभी इसमें और जांच करने की आवश्यकता है।

प्रारंभिक अनुमान के मुताबिक यह इलाका पृथ्वी से करीब 4.5 बिलियन प्रकाश वर्ष की दूरी पर है और यह माना जा रहा है कि मिल्की वे, एंड्रोमेडा सौर मंडलों की जब टक्कर होगी तो शायद वे नये सिरे से तारों के बनने का गुण पूरे इलाके में जब नये सिरे से पैदा करेंगे तो इन शून्यता से भरे इलाकों में भी फिर से तारे बनते हुए दिखाई पड़ेंगे।



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