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कांग्रेस की बैठक में गैरहाजिर रहे तृणमूल कांग्रेस के सदस्य




  • भाजपा विरोधी मोर्चा के पहले ही शुरु हो गयी खटपट
  • गोवा में ममता ने कहा उनके गठबंधन में आ जाए
  • पिछली बार दिल्ली दौरे पर सोनिया से नहीं मिली
राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः कांग्रेस की बैठक में टीएमसी के सदस्यों का नहीं होना यह स्पष्ट कर देता है कि अभी भाजपा विरोदी मोर्चा का बन पाना दूर की कौड़ी है। संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान कांग्रेस की बैठक में टीएमसी के नेताओं की अनुपस्थिति से यह बात साफ हो गयी है कि दोनों दल फिलहाल एक दूसरे से दूरी बनाकर चल रहे हैं।




इससे पहले गोवा में भी तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने यह कह दिया था कि गोवा में अगर कांग्रेस चाहे तो टीएमसी के गठबंधन में शामिल हो सकती है। इसका सीधा अर्थ यह निकाला गया था कि अब ममता बनर्जी हर मुद्दे पर कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं।

वैसे इसके पहले भी वह जब नईदिल्ली गयी थी तो उन्होंने श्रीमती सोनिया गांधी से मुलाकात नहीं की थी। इसी वजह से भाजपा विरोधी मोर्चा का फिलहाल बन पाना कठिन हो चला है। लेकिन यह भाजपा के लिए चिंता का विषय है कि उसके विरोधी खेमों में शरद पवार मौजूद हैं।




महाराष्ट्र में भी भाजपा की रणनीति को शरद पवार से ही विफल करते हुए भाजपा को सरकार से दूर कर दिया था। शरद पवार के साथ ममता बनर्जी का नजदीकी रिश्ता है जबकि कांग्रेस की बैठक में भी शरद पवार मौजूद थे। वैसे कांग्रेस की बैठक में टीएमसी के प्रतिनिधियों के नहीं होने के बारे में कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि इस बैठक में टीएमसी को आमंत्रित ही नहीं किया गया था।

कांग्रेस की बैठक में मौजूद थे शरद पवार

यानी कांग्रेस भी टीएमसी को अलग रखकर अपनी रणनीति बनाने में जुटी है। इस बैठक में शरद पवार के अलावा डीएमके के टीआर बालू, शिवसेना के संजय राउत, एनसी के फारुख अब्दुल्ला, सीपीएम के सीताराम येचुरी मौजूद थे। दरअसल यह बैठक राज्य सभा में 12 विपक्षी सांसदों के निलंबन के मुद्दे पर बुलायी गयी थी।

इसमें श्री पवार को ही राज्यसभा के सभापति वेंकेय्या नायडू से बातचीत करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है। भाजपा खेमा भी कांग्रेस और टीएमसी के बीच आ रही इस दूरी पर बारिक नजर रखे हुए हैं। उसकी सोच वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले हो रही भाजपा विरोधी मोर्चाबंदी को लेकर है। जिसमें अब जाहिर तौर पर तृणमूल कांग्रेस की सक्रियता भाजपा के लिए परेशानी का सबब बन चुकी है। दूसरी तरफ कांग्रेस के अंदर की गुटबाजी की वजह से भाजपा अब भी कांग्रेस को बहुत अधिक भाव देने के लिए तैयार नहीं है।



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