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अति सुक्ष्म एंटीबॉडी कोरोना का प्रभाव खत्म करेगा

पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ी राहत की सूचना सामने आयी

  • पहले से इस्तेमाल होता है दूसरी दवा में

  • एबी 8 के नाम से पहले से ही परिचित है

  • क्लीनिकल ट्रायल शीघ्र पूरा होने की उम्मीद

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः अति सुक्ष्म एक एंटीबॉडी की पहचान हुई है, जो कोरोना वायरस को पूरी तरह

निष्क्रिय कर सकता है। प्रयोग में सफलता मिलने के बाद ही वैज्ञानिकों ने इसके बारे में

जानकारी सार्वजनिक कर दी है। कोविड 19 के आतंक और संक्रमण से पीड़ित पूरी दुनिया

के लिए यह सबसे बड़ी राहत वाली सूचना है । जिस सुक्ष्म एंटीबॉडी का खोज हुई है वह

आकार में सामान्य किस्म की एंटीबॉडी का दसवां हिस्सा है। लेकिन प्रयोग में यह पाया

गया है कि यह सार्स कोव 2 के वायरस को शरीर में सक्रिय होने से रोक देता है। वैसे इस

अति सुक्ष्म एंटीबॉडी का वैज्ञानिकों को पहले से पता था क्योंकि यह पहले से ही एक दवा

बनाने में इस्तेमाल होता है। जिस दवा में इसका प्रयोग होता है। इस अति सुक्ष्म एंटीबॉडी

को लोग एबी 8 के नाम से जानते हैं।

भारत के लिए इसके साथ ही दूसरी अच्छी सूचना यह भी है कि इस खोज में भी एक

भारतवंशी वैज्ञानिक का योगदान रहा है। इसके बारे में विस्तृत जानकारी एक वैज्ञानिक

शोध पत्रिका में प्रकाशित की गयी है। जिस भारतीय मूल के वैज्ञानिक का नाम इसके साथ

जुड़ा है वह कनाडा के ब्रिटिश कोलबिंया में कार्यरत हैं। उनका नाम श्रीराम सुब्रमणियम है।

शोध दल ने यह देखा है कि यह एबी 8 नाम का अति सुक्ष्म एंटीबॉडी कोरोना वायरस के

नियंत्रण में बहुत ही कारगर है। इसका प्रयोग चूहे और हैमस्टर पर सफलतापूर्वक किया

जा चुका है। वैज्ञानिक पत्रिका में इसके काम करने के तरीकों के बारे में भी वैज्ञानिक

आंकड़े दिये गये हैं। साथ ही वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यह अति सुक्ष्म

एंटीबॉडी इंसानी शरीर के कोष के साथ नहीं जुड़ता।

अति सुक्ष्म एंटीबॉडी के साइड एफेक्ट्स भी नहीं

इसलिए तय है कि कोरोना मारने के दौरान इसके इस्तेमाल की वजह से कोई पार्श्व

प्रतिक्रिया भी नहीं होगी।  यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग के वैज्ञानिक इस पर काफी समय से

ही काम कर रहे थे। उन्हें अब जाकर इसमें सफलता मिल पायी है। दूसरी तरफ पूरी दुनिया

टकटकी लगाये इस कोरोना से बचाव के लिए किसी भी दवा अथवा वैक्सिन की प्रतीक्षा

कर रही है। शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का मानना है कि चूंकि पहले से ही यह दवा में इस्तेमाल

होती आयी है इसलिए इसका क्लीनिकल ट्रायल समाप्त करना भी बेहद आसान और कम

समय वाला होगा। खास कर पिट्सबर्ग के विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ मेडिसीन की इस

खोज से पूरी दुनिया में उम्मीद की नई किरण दिखाई पड़ी है। लेकिन इसके वृहद

इस्तेमाल के पहले वैज्ञानिक एक बार फिर से इसका क्लीनिकल ट्रायल चाहते हैं क्योंकि

यह किसी भी दवा के इस्तेमाल से पहले की कानूनी बाध्यता है। वैसे चूंकि पहले से यह

इंसानी दवा के लिए इस्तेमाल होती आयी है, इसलिए उम्मीद है कि क्लीनिकल ट्रायल में

भी कोई साइड एफेक्ट नहीं आयेगा। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक और संक्रामक रोग विभाग

के प्रमुख जॉन मिलर ने कहा कि इस बात को लोगों को समझ लेना होगा कि यह कोरोना

की दवा नहीं है। यह सिर्फ लोगों को कोरोना के संक्रमण से बचाने का एक नया हथियार है,

जिसका प्रयोग पहले से ही किसी अन्य दवा के लिए होता आया है।


 

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