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वक्त ने किया क्या हंसी सितम कोरोना के बहाने भी हो रहा शिकार

वक्त ने किया ऐसा कमाल कि चाहते हुए बहुत कुछ नहीं कर पा रहे हैं और दूसरी तरफ न

चाहते हुए भी बहुत कुछ करना पड़ रहा है। जी नहीं डरिये मत मैं तो सबसे पहले कोरोना

वायरस की बात कर रहा हूं। यह अलग बात है कि डराने लायक दूसरी बातें नीचे आ ही

जाएंगी। बताइये जिनकी हैसियत थी कि सिंगापुर में जाकर शादी की पार्टी करते थे, वे नहीं

जा पा रहे हैं। सोचा था ठंड थोड़ी कम हो जाएगी तो नेपाल घूम आयेंगे। मौसम ठीक रहा तो

अपने वाघा बॉर्डर पर देशभक्ति दिखाने का भी यही मौका होगा। सब कुछ चौपट हो गया

है। बताइये कहां इस ठंड के बाद आने वाली भीषण गर्मी की सोच सोच कर परेशान थे। अब

कोरोना का प्रकोप कुछ ऐसा है कि जल्दी जल्दी तापमान 23 डिग्री पार कर जाए तो हम

लोग चैन की सांस ले सकें। वरना तो अपना अपना भी कोई खांसता है तो मन में कुछ कुछ

होता है।

मध्यप्रदेश में भी वक्त ने किया क्या हंसी सितम जैसी स्थिति है। महाराज भी दिग्गी राजा

और कमल के नाथ को छोड़कर कमल फुल की खेती करने में जुट गये। पता नहीं

अंदरखाने का क्या खेल है वरना कांग्रेस की बात करें तो अपने महाराजा ही उसके सबसे

करीबी नेता के तौर पर जाने जाते थे। मेरे दिमाग में एक खुराफाती विचार आ रहा है कि

कहीं यह सारे दून स्कूल वाले पुराने लोग आपस में मिलकर कोई खिचड़ी तो नहीं पका रहे

हैं। इधर का मोर्चा मैं संभाल लेता हूं और उधर की तुम संभाल हो। अब जिसे भी आना होगा

आयेगा तो इसी जाल में। या तो मेरी तरफ आकर फंसेगा नहीं तो तुम अपनी तरफ फांस

लेना। बाहर जाने का कोई तीसरा रास्ता तो रहेगा नहीं।

किसी ने सोचा था कि अपने पंखा बाबा की ऐसी हालत होगी

अब मध्यप्रदेश में किसी ने सोचा था कि अपने पंखा बाबा यानी मुख्यमंत्री कमलनाथ

अपनी बात की वजह से इतनी बड़ी परेशानी में पड़ जाएंगे। बस इतना ही तो कहा था कि

सड़क पर उतरना है तो उतर जाए। वैसे पंखा बाबा ने भाई लोगों के ठगकर यह बुलवा लिया

था। लेकिन मुंह ने निकली बात कहीं वापस भी आती है क्या। महाराजा साहिब नाराज हो

गये। इसी वजह से एक काफी पुराने जमाने की फिल्म के गीत की याद आ रही है। फिल्म

का नाम था कागज के फुल। इस गीत को लिखा था कैफी आजमी साहब ने और संगीत में

ढाला था सचिव देव वर्मन साहब ने। इस गीत को खुद गीता दत्त ने अपनी आवाज में

गाया था। गीत के बोल कुछ इस तरह थे।

वक़्त ने किया क्या हंसीं सितम

तुम रहे न तुम हम रहे न हम
वक़्त ने किया क्या हंसीं सितम
तुम रहे न तुम हम रहे न हम
वक़्त ने किया
बेक़रार दिल इस तरह मिले
जिस तरह कभी हम जुदा न थे
बेक़रार दिल इस तरह मिले
जिस तरह कभी हम जुदा न थे
तुम भी खो गए, हम भी खो गए
एक राह पर चलके दो क़दम
वक़्त ने किया क्या हंसीं सितम
तुम रहे न तुम हम रहे न हम
वक़्त ने किया
जाएंगे कहाँ सूझता नहीं
चल पड़े मगर रास्ता नहीं…

वक्त ने किया तभी तो सभी को याद आयी

वक्त ने किया को याद करते हैं तो झारखंड में रघुवर दास वनाम सुदेश महतो की भी याद

आ जाती है। कभी सुदेश महतो को नीचा दिखाने में अपने मुखिया जी ने कोई कसर नहीं

छोड़ी थी। यह तो ऊपर का दबाव था वरना तो दास बाबू अपने नवीन को भी मिनिस्टर

बनाकर ही मानते। ऐसा नहीं हुआ तो सुदेश को निपटाने में एड़ी चोटी का जोर लगाये रहे।

लेकिन अपने सुदेश भइया भी शातिर खिलाड़ी निकले। सारा पेंच काटते रहे और अपनी

पतंग उड़ाते रहे। मौका देखकर चुनाव के पहले ही ऐसा तीखा तेवर अपना लिया कि

भाजपा को भी उनकी कई बातों को मानना पड़ा जबकि रघुवर भइया यह नहीं चाहते थे कि

सुदेश के साथ कोई समझौता भी हो। मतलब साफ था फिर से सुदेश को सिल्ली में ही

निपटा देंगे। और अपनी कुर्सी तो अगले पांच साल के लिए रिजर्व है। वक्त ने किया ऐसा

खेल की सब कुछ उलटा पुलटा हो गया। सरयू पार करने की कोशिश में रघुवर खुद तो डूबे

साथ में पूरी पार्टी को भी डूबा दिया। अब जाकर मोटा भाई को यह होश आया है कि अब

इस घोड़े पर दांव लगाया तो नुकसान अधिक हो जाएगा। आनन फानन में बाबूलाल जी को

लाया गया है। राज्यसभा में भी आस बंधी थी कि शायद रघुवर दास को टिकट मिल जाए।

यहां पर सुदेश ने फिर से लंगड़ी मार दी। उनका टिकट काटकर दीपक प्रकाश को दे दिया

गया। इतना कुछ करने के बाद सुदेश भइया फिर से दिल्ली की तरफ निकल पड़े हैं


 

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