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काल का पहिया घूमे भैया लाख तरह इंसान चले

काल के कपाल पर लिखता हूं एक कालजयी कविता है। इस कविता के कालजयी होने का

सिर्फ एक कारण यह नहीं है कि इसे स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी ने लिखा था। बल्कि

इस कविता के मर्म को उस कालखंड के लिहाज से सामाजिक और राजनीतिक

परिस्थितियों का सही चित्रण कर पायी थी यह कविता। शायद इसी वजह से कविता न

सिर्फ लोकप्रिय हुई बल्कि आज भी किसी खास मौके पर इसे कोई न कोई दोहराता रहता

है। खैर काल के बीच वर्तमान काल की बात करें, भूतकाल पीछे जा चुका है और भविष्य

काल का कोई अता पता नहीं है। तो वर्तमान काल में तो बिहार चुनाव ही सबसे बड़ा मुद्दा

है। इस बार वइसे भी लगता है कि कांटे की टक्कर होने जा रही है। अइसा सिर्फ सुनी

सुनायी बातों पर बोल रहा हूं। कोरोना के संकट के बीच चुनाव का हाल जानने बिहार कउन

जाता है। वइसे भी सोशल मीडिया में ज्ञानी इतने भरे पड़े हैं तो सारा कुछ जोड़ घटाव, गुणा

भाग कर यह बता देते हैं कि क्या होने जा रहा है। कई बार तो अचरज होता है कि इतने

ज्ञानी लोग आखिर निजी स्तर पर सफल क्यों नहीं हैं। खोज खबर लेने पर उनके बारे में

और ही जानकारी मिलती है। तब जाकर पता चलता है कि जनाव सिर्फ कागजी शेर हैं

वरना निजी आचरण में तो जवानी से ही ढेर हैं।

मोर्चा तो बिहार चुनाव पर बना हुआ है

खैर बिहार चुनाव पर लौटते हैं तो मोर्चा सजा हुआ है लेकिन पब्लिक अजीब तरीके से चुप

है। आज कल की पब्लिक भी बहुत सयाना हो गयी है। जइसा देस वइसा भेस वाली बात

करती है लेकिन अंदर में क्या कुछ चल रहा है, यह तो रिजल्ट आने के बाद ही पता चलता

है। हद तो यह है कि रिजल्ट आने के बाद भी किसे वोट दिया था, यह खुलकर नहीं बोलते।

शायद इसी वजह से तमाम पॉलिटिकल पार्टियों को अब अपने अपने स्तर पर सर्वेक्षण

और मीडिया मैनेजमेंट का सहारा लेना पड़ता है। फिर भी लगता है कि इनदिनों बिहार में

मीडिया मैनेजमेंट का काम कुछ कमजोर हो गया है। सोशल मीडिया पर जो कुछ

झंडाबरदार नजर आते थे, वे आजकल बहुत कम एक्टिव हैं। या तो उन्हें माल नहीं मिल

रहा है अथवा वे किसी अन्य किस्म का कमाल करने में जुटे हुए हैं। इसी बात पर एक

पुरानी फिल्म का गीत याद आने लगा है। इस गीत को लिखा था प्रसिद्ध लेखक और कवि

गोपालदास नीरज ने और संगीत में ढाला था शंकर जयकिशन ने। इसे मन्ना डे साहब ने

अपने स्वरों में ढालकर मधुर बना दिया था। कोरोना काल में भी यह गीत खुद को कई

किस्म का संदेश दे जाता है। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

काल का पहिया घूमे भैया, लाख तरह इन्सान चले
ले के चले बारात कभी तो, कभी बिना सामान चले
राम कृष्ण हरि …

जनक की बेटी अवध की रानी, सीता भटके बन बन में
राह अकेली रात अन्धेरी, मगर रतन हैं दामन में
साथ न जिस के चलता कोई, उस के साथ भगवान चले
राम कृष्ण हरि …

हाय री क़िस्मत कृष्ण कन्हैया, स्वाद न जाने माखन का

हँसी चुराये फूलों की वो, कंस है माली उपवन का
भूल न पापी मगर पाप की, ज्यादा नहीं दुकान चले
राम कृष्ण हरि …

अजब है कैसी प्रभु की माया, माला से बिछुड़ा दाना
ढूँढे जिसे मन सामने है वो, जाये न लेकिन पहचाना
कैसे वो मालिक दिखे तुझे जब, साथ तेरे अभिमान चले
राम कृष्ण हरि …

कर्म अगर अच्छा है तेरा, क़िस्मत तेरी दासी है
दिल है तेरा साफ़ तो प्यारे, घर में मथुरा काशी है
सच्चाई की राह चलो रे, जब तक जीवन प्राण चले
राम कृष्ण हरि …

तो गाना सुनने के बाद झटके से झारखंड की दो सीटों पर भी झांक लीजिए। पहली बात तो

यह है कि बेरमो में भाजपा को आजसू की ताकत का लाभ मिलता नजर नहीं आ रहा है।

लगता है कि अपने चंद्रप्रकाश जी केंद्र में मंत्री बने बिना नहीं मानेंगे। खैर मौका देखकर

चौका लगाना ही कामयाब पॉलिटिशियन का काम होता है। यह सिर्फ पर्सनल एपियरेंस की

बात है वरना लंबोदर बाबू को लगातार एक्टिव देखा जा रहा है। आजसू के लोग भी मानते

हैं कि लंबोदर जी हैं मतलब चंद्रप्रकाश भी हैं। अपना हारा हुआ किला दोबारा जीत लेने के

बाद सुदेश किलेबंदी को अब दोबारा कमजोर होने देना नहीं चाहते हैं। दुमका की बात करें

तो भाजपा की तरफ से बाबूलाल मरांडी का सक्रिय नहीं होना ही कई सवाल खड़े कर रहा

है।

काल का पहिया तो दुमका में भी घूमता दिख रहा है

यह तो पहले से पता था कि प्रो. लुइस मरांडी उनकी पहली पसंद नहीं थे। लेकिन अपने रघु

दादा के दौरों से भाजपा को दोनों सीटों पर फायदा हो रहा है या नुकसान यह तो पार्टी को

समझना है। यह निपटे तो मध्यप्रदेश के रिजल्ट आने का इंतजार कर लेते हैं। इन राज्यों

में जैसी रूझान दिखेगी, काल के गाल में पल रहा बंगाल का चुनाव भी काफी हद तक उससे

प्रभावित होगा।

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