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तीन साल में बड़े गरदनों तक नहीं पहुंचा सीबीआई का पंजा

राष्ट्रीय खबर ने ही सबसे पहले छापी थी खबर

  • जिला की जांच में ही बहुत कुछ पता चला था

  • सीबीआई की जांच से अभियुक्तों को खुली छूट

  • अनेक लोग अपनी संपत्ति बेचकर निकल गये

  • मुख्य अभियुक्त अब भी कानून की पकड़ से बाहर

दीपक नौरंगी

भागलपुरः तीन साल हो गये सृजन घोटाले का पता चले। पहले भागलपुर पुलिस फिर

बिहार पुलिस की सीआईडी और बाद में यह केस आनन फानन में सीबीआई को सौंप दिया

गया।

बहुचर्चित सृजन घोटाले पर रोशनी डालती यह वीडियो रिपोर्ट

जब भागलपुर पुलिस इस मामले की छानबीन कर रही थी तो चूहे के बिल से ऐसे सांप

निकलते नजर आ रहे थे, जो बिहार और झारखंड की राजनीति में भूचाल ला सकते थे।

इसी सृजन घोटाला के तीन साल पूरे होने पर राष्ट्रीय खबर को भी इसे दोबारा याद दिलाना

पड़ रहा है।

यह उल्लेख भी प्रासंगिक है कि स्थानीय स्तर पर इस घोटाले की चर्चा आम होने के बाद

भी भागलपुर और बाद में बिहार के इस सबसे बड़े घोटाले की पहली खबर राष्ट्रीय खबर में

ही छपी थी। उसके कई दिनों तक इसका फॉलोअप भी राष्ट्रीय खबर में प्रमुखता के साथ

प्रकाशित होता रहा। लगातार खबरों की चर्चा बढ़ते जाने के बाद अन्य बड़े मीडिया घरानों

में बाद में इस खबर को छापना प्रारंभ किया। इस विषय पर कई बड़े नेताओं की

मिलीभगत की भनक तो भागलपुर पुलिस को ही लग चुकी थी। भागलपुर और अन्य

स्थानों पर इस घोटाले के पैसे से खरीदी गयी संपत्ति का विवरण भी हाथ लग चुका था।

अचानक इस पूरे मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गयी।

तीन साल से सीबीआई की जांच पर है लोगों को संदेह

मामला सीबीआई को सुपुर्द होने के तुरंत बाद ही सीबीआई के एसपी स्तर के अधिकारी का

लगातार यहां नहीं आना ही लोगों के संदेह को पुख्ता करता गया। जिन्हें इस घोटाले के

बारे में पता नहीं है अथवा याद नहीं है, उन्हें यह बता दूं कि यह दरअसल सरकारी धन का

घोटाला था। जिला ट्रेजरी का पैसा एक एनजीओ को गया और उस एनजीओ से अनेक

लोगों को कर्ज बांटे गये। जाहिर है कि जिला ट्रेजरी का पैसा बिना सरकारी अधिकारियों की

अनुमति के किसी निजी संस्था को नहीं जा सकता था। लेकिन उसके दस्तावेज जिस

तरीके से गायब होने लगे, उससे भागलपुर पुलिस को भी इसमें बड़े लोगों के शामिल होने

का अंदेशा हो गया था।

आनन फानन में सीबीआई को यह मामला सौंपे जाने के बाद भी अब तक इस मामले में

किसी बड़े अफसर की गिरफ्तारी तो क्या उनसे पूछताछ तक नहीं हो पायी है। बीच में

राजद नेता लालू प्रसाद यादव ने यहां आकर जब इस मुद्दे को उठाया तो सरकार सतर्क हुई।

लेकिन जांच की गाड़ी तब भी आगे नहीं बढ़ पायी। सीबीआई की सुस्ती के लाभ उठाकर

अनेक अभियुक्तों को भागलपुर की अपनी संपत्ति बेचकर भागने का खुला अवसर भी

मिल गया। जांच की कड़ी में कई वरीय पदाधिकारियों के नाम आने के बाद भी कार्रवाई

नहीं होना अब भी यही दर्शाता है कि दरअसल सीबीआई को यह मामला शायद जांच कर

दोषियों को सजा दिलाने के लिए नही बल्कि इस मामले को लटकाये रखने के लिए ही

दिया गया है। यही वजह है कि इस कांड के मुख्य अभियुक्तों की भी तीन साल में कुछ

अता पता नहीं चल पाया है।


 

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