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जिन्हें नकारा बताया जा रहा था संकट में वे ही असली काम आये

  • सरकारी नजरों में फालतू थे उन्होंने ही जान बचायी
  • प्रवासी मजदूरों की वापसी अभूतपूर्व काम
  • विदेश से वापसी में एयर इंडिया का भरोसा
  • सूचना तकनी का आधार है बीएसएन का ढांचा
रजत कुमार गुप्ता

रांचीः जिन्हें नकारा बताने की हरसंभव कोशिश की गयी। अनेक केंद्रीय मंत्रियों ने इन्हें

नकारा बताने और देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ बताते हुए बयान तक जारी किये। अब

कोरोना से उत्पन्न परिस्थितियों ने यह साबित कर दिया कि जिन्हें नकारा बताया गया

था, वे कितना काम आते हैं। राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका एक बार फिर से साबित हो

गयी। यह कल्पना सहज है कि जिन्हें नकारा बताया गया था, वे नहीं होते तो आज देश

और किसी अत्यंत विकट स्थिति से गुजर रहा होता और अनेक स्थानों पर गृहयुद्ध जैसी

नौबत भी आयी होती। रकार की नजर में जो बेकार संस्थान थे, उन्होंने अपनी संरचना को

सही साबित किया है। इस कोरोना संकट में सरकार की जान और जनता को राहत दोनों में

इन्हीं संस्थानों ने भूमिका निभायी है। ध्यान देने लायक बात है कि अभी के कोरोना संकट

के दौर में प्रवासी मजदूरों की घर वापसी में भारतीय रेल 24 घंटे तैनात हैं। दूसरी तरफ

विदेश तक दवाई पहुंचाने और विदेशों में फंसे भारतीयों को भारत लाने में एयर इंडिया

मुस्तैद है। लोगों को हाल-चाल भेजने पहुंचाने में डाक विभाग मौजूद है। इनके अलावा देश

में दूरसंचार आधारित कोरोना व्यवस्था को बनाये रखने की पूरी जिम्मेदारी अकेले

बीएसएनएल की है। इन चारों को सरकार ने बेकार और नकारा साबित करने में कोई कसर

नहीं छोड़ी थी। किसी ने इससे पहले यह सोचना जरूरी तक नहीं समझा होगा कि आखिर

इन सरकारी संस्थाओं को लाभ क्यों नहीं होता है। इससे पहले कि अन्य मुद्दों पर चर्चा हो

एक स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है कि क्या निजी संस्थान इस तरीके से लोक

कल्याणकारी काम कर सकते थे।

जिन्हें नकारा बताया गया था उन्हें बेचने की जल्दबाजी क्यों है

राज्य सरकारें भी अपने फायदे के लिए जब अधिक कीमत पर शराब बेच रही है तो इन

सरकारी संस्थानों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बने रहने में किसने रोक रखा है। सबसे पहले

बीएसएनएल की बात करें तो आधारभूत संरचना के मामले में आज का सबसे अधिक

लोकप्रिय जिओ कहीं नहीं ठहरता है। लेकिन बीएसएनएल को लगातार अनुरोध के बाद भी

स्पैक्ट्रम आवंटित नहीं किये गये। नतीजा है कि बीएसएनएल के पास डाटा भेजने की

असीमित सुविधा होने के बाद भी स्पेक्ट्रम नहीं होने की वजह से गति नहीं है। साफ शब्दों

में कहें तो बीएसएनएल का एक पैर बांधकर कहा गया है कि वह अंतर्राष्ट्रीय दौड़ में भाग

लें। अब रेलवे की बात करें तो लगातार रेलवे के निजीकरण की प्रक्रिया के बीच निजीकरण

का क्या लाभ कोरोना संकट के दौरान मिला है, इसे समझने की जरूरत है। दरअसल यह

भारतीय रेल का विशाल ढांचा ही है जो इतनी बड़ी जिम्मेदारी को निभा सकता है। निजी

स्तरों पर कूरियर का कारोबार बहुत तेजी से आगे बढ़ा है लेकिन ग्रामीण इलाकों तक पहुंच

की बात करें तो अकेला डाक विभाग ही हैं जिसके पास यह क्षमता है। इनसे अलग एयर

इंडिया का उल्लेख कर लें तो उसे बेचने की प्रक्रिया चल रही है। ग्राहक नहीं मिलने की

वजह से अब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पायी है। वरना शायद आज वंदे भारत अभियान

के लिए भारत सरकार को निजी विमान किराये पर लेने पड़ते।

सरकारी मुफ्तखोरी से वे आजाद हों तो सच का पता चले

इसलिए यह भी विचार करने का वक्त है कि आखिर इन सारी सरकारी संस्थाओं ने

राष्ट्रहित में बिना मुनाफे के कितना योगदान दिया है। यदि उनके योगदान को आर्थिक

तराजू पर तौल दें तो शायद सिर्फ इस कोरोना संकट के दौरान उनका योगदान विश्व के

किसी भी कंपनी के कारोबार से ज्यादा महत्वपूर्ण और आर्थिक ढांचा का है। इसलिए यह

सिर्फ कोरोना संकट ही नहीं देश की राष्ट्रीय संपदा और सरकारी आधारभूत संरचना को

बचाने की भी सीख दे रहा है। जिस तरीके से अब स्वदेशी के आगे बढ़ाने की बात हो रही है,

ठीक उसी तरह सरकारी संस्थानों में सरकार की मुफ्तखोरी अगर बंद हो तो यह पता चल

पायेगा कि दरअसल कौन सी संस्था की कमाई और परिचालन खर्च क्या है। इस अनुपात

को समझने के बाद अगर हम अपने राष्ट्रीय संपदा को बचा सके, शायद कोरोना संकट हमें

यह सीख भी दे गया है।


 

 

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