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पानी का पौधा मार रहा है बाज और अन्य प्राणियों को

  • वर्ष 1994 से मौतों की तरफ ध्यान गया था

  • वैज्ञानिकों ने पाया दूसरे प्राणी भी मर रहे हैं

  • स्पेक्ट्रोमीटर से रसायन को तैयार होते देखा

  • जर्मनी और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने इसे तलाशा

राष्ट्रीय खबर

रांचीः पानी का पौधा नजर तो आता है। जब तक खतरे का पता नहीं चला था तो इस पर

अधिक ध्यान भी नहीं दिया गया था। अब जाकर इस बात का खुलासा हुआ है कि

अमेरिका के उस इलाके में अचानक से बाजों से मर जाने के पीछे का असली कारण यही

पानी का पौधा है।

वीडियो में देखिये इस प्रजाति के बाज को मछली शिकार करते हुए

अमेरिका के दक्षिणी भाग में वर्ष 1990 से बाल्ड प्रजाति के बाजों के अचानक मर जाने की

तरफ वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों का ध्यान गया था। लेकिन तब यह माना गया

था कि शायद गिद्धों की तरह मृत प्राणियों के अवशेष खाने की वजह से उनमें मौजूद

रसायनों से उनकी मौत हो रही है। अमेरिका में इस रसायन पर प्रतिबंध लगाने जाने के

बाद भी जब मौत का सिलसिला जारी रहा तो पर्यावरण विशेषज्ञों का दिमाग ठनका। अब

मार्टिन लुथर यूनिवर्सिटी (जर्मनी) और जॉर्जिया यूनिवर्सिटी (अमेरिका) इसकी जड़ तक

पहुंचने में सफल हुए हैं। इस शोध का निष्कर्ष आने के बाद ही पता चला है कि इस प्रजाति

के बाज के अलावा अन्य वन्य प्राणी भी पानी के इस पौधे की वजह से अचानक ही काल

कवलित हो रहे हैं। लगातार इसकी खोज होने के बाद पता चला है कि यह पानी का पौधा

अपने अंदर एक टॉक्सिन पैदा करता है। इस टॉक्सिन की उत्पत्ति पौधे में मौजूद

साइनोबैक्टेरिया की वजह से होती है। वैज्ञानिक शोध के बाद इस नतीजे पर पहुचे हैं कि

अत्यधिक रसायनों के इस्तेमाल की वजह से ऐसी गड़बड़ी आयी है।

पानी का पौधा बैक्टेरिया के प्रभाव में विष तैयार करता है

अमेरिका के अराकांस में जब लगातार ऐसे बॉल्ड प्रजाति के बाज मरने लगे तो स्वाभाविक

तौर पर इस तरफ लोगों का ध्यान आकृष्ट हुआ था। मरने से पहले उनके आचरण को

देखकर ऐसा लगता था कि वे अपने ही शरीर पर अपना नियंत्रण खो चुके हैं। खास तौर पर

किसी भी प्राणी का उसके अपने शरीर पर नियंत्रण नहीं होना ही सबसे बड़ा खतरा है।

सामान्य तौर पर समझा जा रहा था कि किसी रसायन के असर की वजह से उनके दिमाग

पर गलत प्रभाव पड़ रहा है। यह पहले ही पता चल चुका था कि खेतों में चरने वाले

मवेशियों के शरीर तक भी उर्बरकों से तैयार रसायन पहुंच गया था। जब यह मवेशी मरते

थे तो उन्हें खाने वाले गिद्ध भी इसी रसायन की चपेट में आकर मर जाते हैं। लेकिन जांच

में बाजों के मौत का कारण यह नहीं पाया गया। आगे जब जांच हुई तो बाजों के सर में

अजीब किस्म के छेद भी पाये गये। इससे पता चला कि किसी खास वजह से इन शिकारी

पक्षियों का दिमाग क्षतिग्रस्त हो रहा है। तब तक इसके बारे में और कोई जानकारी नहीं

मिल पायी थी। सिर्फ यह बात समझ में आ रही थी कि किसी वजह से इन जानवरों के

दिमाग में कोई बीमारी पैदा हो रही है। मार्टिन लुथर यूनिवर्सिटी के प्रोफसर टिमो

नेइडरमेयर कहते हैं कि इस बीमारी की असली वजह के बारे में तब तक कुछ भी पता नहीं

चल पाया था।

अनुसंधान में पाया कि दूसरे प्राणी भी इसके शिकार हैं

इस शोध से जुड़े अमेरिकी अनुसंधानकर्ताओं ने यह देखा कि सिर्फ बाज अथवा ईगल

प्रजाति ही नहीं बल्कि कई अन्य प्रजातियों में भी ऐसी ही बीमारी तेजी से बढ़ती जा रही है।

तब जाकर वैज्ञानिकों ने इस पानी के पौधे हाईड्रीलिया वार्टिसिल्लाटा की पहचान की। यह

वहां से मीठे पानी के झीलों में पैदा होता है। वैसे इसका पता चलने के बाद कुछ ऐसे भी

झील मिले, जहां इस प्रजाति के पौधों में यह जहर पैदा नहीं हो रहा है। साफ पानी के ऐसे

स्रोतों में तेजी से पनपने वाले इस पौधे में एक खास किस्म का बैक्टेरिया होने की वजह से

यह रसायन पैदा होने लगता है। जॉर्जिया विश्वविद्यालय के वारनेल स्कूल ऑफ फॉरेस्ट्री

एंड नेचुरल रिसोर्सेज की प्रोफसर सूसान बी वाइल्डे कहते हैं कि इसी पानी के पौधे में पहले

उस बैक्टेरिया की पहचान की गयी। यह साइनोबैक्टेरियम है। पानी के पौधे के पत्तों पर

यह होता है। वर्षों तक लगातार एक एक कर सारे संकेतों का विश्लेषण करने के बाद यह

नतीजा निकाला गया है। पहले तो यह समझा गया था कि यह बैक्टेरिया ही बाजों की मौत

का कारण है लेकिन जब प्रयोगशाला में जांच हुई यह तो सोच गलत प्रमाणित हुई।

प्रोफेसर के शोध दल के सदस्य स्टीफन ब्रेइनलिंगर ने स्पेक्ट्रोमीटर की मदद से इस पानी

के पौधे के पत्तों का अध्ययन किया। इसी अध्ययन में यह पाया गया कि जब यह

बैक्टेरिया संख्या में बढ़ने लगता है तो एक नया यौगिक भी पैदा होता है। इसी नये यौगिक

का भी रासायनिक विश्लेषण किया गया।

हर माहौल में पानी का पौधा ऐसा रसायन नहीं बनाता

तब जाकर यह राज खुला कि दरअसल यही वह रसायन है जो पानी के पौधे में बैक्टेरिया

की अधिकता की वजह से पैदा होता है और उसी की चपेट में आकर बाल्ड प्रजाति के बाज

और इलाके में रहने वाले अन्य प्राणी दिमागी गड़बड़ी की वजह से मर रहे हैं। यह रसायन

उनके दिमाग में छेद पैदा कर रहा है। पानी में मौजूद ब्रोमाइड के संपर्क में आने की वजह

से यह प्रतिक्रिया होती है वरना बैक्टेरिया के होने के बाद भी यह जानलेवा रसायन तैयार

नहीं होता है।

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