fbpx Press "Enter" to skip to content

बिना सांस लिये भी जीवित रहता है पानी का परजीवी प्राणी

  • हमें पता था बिना ऑक्सीजन लिये जीवन संभव नहीं

  • जेलीफिश आकार के इस सुक्ष्म प्राणी का पता चला

  • इजरायल के शोधकर्ताओं ने पहली बार ऐसी खोज की

  • तो क्या अंतरिक्ष का जीवन कुछ ऐसा भी हो सकता है

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः बिना सांस के हम जीवित नहीं रह सकते। यहां तक कि यह वैज्ञानिक सोच थी

कि पृथ्वी पर कोई भी जीवन बिना सांस लिये जिंदा नहीं रह सकता है। यह सोच थल और

जल के साथ साथ नभचरों के लिए भी समान रुप से थी। पहली बार यह वैज्ञानिक सोच

गलत साबित हो रही है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसे प्राणी का पता लगाया है कि जो बिना

ऑक्सीजन के भी जीवित रह सकती है। शोध का निष्कर्ष है कि इस प्राणी को दरअसल

जिंदा रहने के लिए सांस लेने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। बहुकोशिय यह परजीवी सुक्ष्म

प्राणी समुद्र में पाये जाने वाले जेलीफिश के आकार का ही है। इसका पता चलने के बाद

अब वैज्ञानिक यह सोच रहे हैं कि शायद इस पृथ्वी के बाहर भी कुछ ऐसा ही जीवन हो

सकता है। ऑक्सीजन की मौजूदगी से जीवन के तलाश करने की सोच को अब बदला जा

रहा है। जब पृथ्वी पर ऐसा परजीवी मौजूद है तो अंतरिक्ष के अन्य इलाकों में भी, जहां

ऑक्सीजन नहीं है, वहां जीवन हो सकता है। भले ही यह जीवन हमारी सोच से अलग हो।

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि काफी प्राचीन काल में किसी एक

कोष वाले जीवन ने एक बैक्टेरिया को अपने अंदर शामिल कर लिया था। यह पृथ्वी की

उत्पत्ति का प्रारंभिक काल था। यह संभवतः 14.5 करोड़ वर्ष पूर्व की घटना हो सकती है।

बिना सांस के जीवन की उत्पत्ति प्राचीन पृथ्वी से हुई थी

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के बारे में शोध एक प्रमाणित तथ्य है। जिसके बारे में वह

एमिबा और प्रोटोजोया के बारे में जानते हैं। लेकिन इस आर्चेयन और बैक्टेरिया के मेल के

बाद शायद दोनो की आंतरिक संरचना इसके लायक साबित हुई। इसी वजह से दोनों एक

साथ हो गये। दोनों के इसी मेल से जीवन की एक नई संरचना आगे बढ़ी। जिसकी वजह से

अंदर का बैक्टेरिया भी अंततः कोष धारण करने वाला प्राणी बन गया। इस किस्म के कोष

को मिटोचोंडिया कहा जाता है। हमारे अपने शरीर में भी लाल रक्त कोष के छोड़कर ढेर

सारे मिटोटोंडिया होते हैं। यह सांस लेने की प्रक्रिया के लिए मददगार हैं। इसका काम

ऑक्सीजन को तोड़कर उससे एक अणु तैयार करना होता है, जिसे ट्राईफॉस्फेट कहते हैं।

यह भी बहुकोषिय जीवन होता है जो ऊर्जा के विखंडन में शरीर के अंदर काम आता है। यह

जीवन का सामान्य स्वरुप है, जो ऑक्सीजन से सांस लेने पर आधारित है।

अब तक पृथ्वी पर जीवन के इसी स्वरुप की कल्पना की जाती थी। लेकिन तेल अबीब

विश्वविद्यालय के एक शोध दल ने उससे अलग हटकर काम किया है। इस दल का नेतृत्व

दायाना याहोलोमि कर रहे थे। इस दल ने साल्मोन मछली में मौजूद परजीवियों का गहन

अध्ययन किया। आम तौर पर उनमें पाये जाने वाले एक सामान्य परजीवी हेनेगुया

सालमिनिकोला पर शोध को फोकस किया गया था। इसी के माध्यम से यह नया तथ्य

हमारी जानकारी में आ पाया है। इसके तहत स्नीडारियन का पता चला है जो जल जीवन

के अन्य जीवों में भी मौजूद होता है। यह परजीवी उस जीवन को कोई नुकसान नहीं

पहुंचाता, जिसपर वह आश्रित होता है।

यह परजीवी अपने मूल जीवन पर बुरा असर नहीं डालता

इसी वजह से किसी सालमॉन मछली में मौजूद परजीवी आजीवन वहां बने रहते हैं। जब

इस परजीवी के डीएनए का विश्लेषण किया गया तो अजीब तथ्य सामने आते चले गये।

डीएनए कड़ी विश्लेषण और फ्लूरोसेंस माइक्रोस्कोपी से इसी हेनेगुया सालमिनिकोला से

नये तथ्य उजागर होते चले गये। यह पाया गया है कि विवर्तन की प्रक्रिया के दौरान यह

सांस लेने की अपनी पद्धति को त्याग चुका है। इस वजह से उसके शरीर का हर अणु सांस

लेने की प्रक्रिया को अपने तरीके से निभाने लगा है। इसका पता चलने की वजह से

वैज्ञानिक चौंक गये थे क्योंकि उनका अध्ययन किसी ऐसे निष्कर्ष की कल्पना भी नहीं

करता था। आगे और गहन शोध हुआ तो पता चला कि इस एक कोष वाले जीवन की

आंतरिक संरचना में ऐसी बारिक छन्ने हैं जिन्हें आम तौर पर पहले देखा ही नहीं गया था।

इसके माध्यम से ही वे बिना सांस लिये ही अपने जीवन को आगे बढ़ाते हैं। इस तथ्य की

जानकारी मिलने के बाद कई अन्य जलज प्राणियों के अंदर मौजूद परजीवियों की भी जांच

की गयी। उनमें भी ऐसा सुक्ष्म परजीवी पाया गया। जिसके आधार पर यह निष्कर्ष

निकाला गया कि यह एक बहुकोषिय परजीवी है, जिसे जिंदा रहने के लिए सांस लेने की

जरूरत ही नहीं पड़ती है। इसके आगे के शोध में अभी वैज्ञानिक जुटे हुए हैं क्योंकि

वैज्ञानिक सिद्धांत के उलट यह जानकारी बिल्कुल नई है। लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि

अगर बिना ऑक्सीजन के इस पृथ्वी पर जीवन है तो अंतरिक्ष में जहां ऑक्सीजन नहीं है,

वहां भी जीवन हो सकते हैं।

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
More from जेनेटिक्सMore posts in जेनेटिक्स »
More from पर्यावरणMore posts in पर्यावरण »
More from लाइफ स्टाइलMore posts in लाइफ स्टाइल »
More from विश्वMore posts in विश्व »
More from समुद्र विज्ञानMore posts in समुद्र विज्ञान »

2 Comments

Leave a Reply

error: Content is protected !!