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पृथ्वी के उथलपुथल के बारे में अब नई जानकारी मिली वैज्ञानिकों को




इस सामूहिक विनाश की घटना का पहले पता नहीं था
टेक्टोनिक प्लेटों में भी परिवर्तन हुआ था
अफ्रीका का इलाकों से मिल रहे हैं साक्ष्य
दांतों की संरचना भी बदल गयी थी उनकी
राष्ट्रीय खबर

रांचीः पृथ्वी के उथलपुथल के बारे में पहले से ही हमें जानकारी है। लेकिन इस बार यूनिवर्सिटी ऑफ सालफोर्ड के वैज्ञानिकों ने इस सामूहिक विनाश की घटना का पता लगाया है, जिसके बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं थी।




इस एक घटना से अफ्रीका और अरब क्षेत्र के वर्तमान इलाकों में रहने वाली करीब 63 प्रतिशत जीवन समाप्त हो गया था। इनमें से प्राचीन काल की कुछ प्रजातियों की संख्या बहुत कम हो गयी थी।

जिसकी वजह से और पृथ्वी के वातावरण में हुए बदलाव की वजह से वे भी धीरे धीरे समाप्त हो गयीं। वैज्ञानिक शोध के मुताबिक सामूहिक विनाश की यह घटना करीब तीस मिलियन वर्ष पहले घटी थी। पूर्व के वैज्ञानिक अनुसंधानों में इसके बारे में जानकारी नहीं मिल पायी थी।

वैसे इस एक घटना के अलावा भी पृथ्वी पर अलग अलग कारणों से सामूहिक विनाश होने के रिकार्ड और प्रमाण पहले ही मिल चुके थे। इसके तहत यह भी पता चला था कि भीषण उथलपुथल के दौर में कई बार उस वक्त की टेक्टोनिक प्लेटें ही पृथ्वी के गर्भ में समा गयी थी।

इस घटना के बारे में वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि इस घटना के बाद भी पृथ्वी का दलदल युक्त माहौल अचानक से बदलकर पूरी तरह बर्फीला हो गया था।

इस वजह से भी अनेक प्रजातियां विलुप्त हो गयी थी क्योंकि उनका शरीर इस ठंड को झेलने के लिए तैयार नहीं था। इस शोध दल के नेता डॉ डोरियन डी व्राइस और उनके दल ने पृथ्वी के उथलपुथल से संबंधित इस घटना का पहली बार पता लगाया है।

पृथ्वी के उथलपुथल की इस घटना के साक्ष्य अफ्रीका से मिले

शोध दल ने अपने शोध और उससे संबंधित साक्ष्यों की भी तलाश की है। जिसके आधार पर जो प्रजातियां इस वजह से विलुप्त हो गयी थी, उनका भी पता लगाया गया है।

इनकी कुल संख्या उस दौर की प्राचीन पृथ्वी पर मौजूद जीवन का 63 प्रतिशत है। दरअसल इस घटना का पता प्राचीन अवशेषों के वैज्ञानिक अध्ययन से लगाया गया है। उस प्राचीन काल में जो जीव मौजूद थे, उनका बाद के कालखंड में कोई पता नहीं चल पाया है।

इसी वजह से माना जा रहा है कि इस दौर के उथलपुथल की वजह से यह प्राणी धरती पर से गायब हो गये। कुछ के बारे में अनुमान है कि वे अचानक से टेक्टोनिक प्लेटों के धरती के गर्भ में समा जाने के दौरान ही जिंदा दफन भी हो गये थे।

जो प्राणी उस दौर में समाप्त हो गये थे, उनके फॉसिल से पता चला है कि इनमें मैमल समूह के अनेक प्राणी थे, जो आकार में काफी बड़ा हुआ करते थे। साथ ही बड़े आकार के चूहे और गिलहरी प्रजाति के प्राणी भी थे। इनके फॉसिल्स खुदाई में मिले हैं।




साथ ही बंदर और उसके मिलती जुलती प्रजाति के कई जीव भी इसके प्रभाव में पूरी तरह गायब हो गये। अफ्रीका के कई इलाकों से इस काल के फॉसिल्स इकट्ठा करने के बाद क्रमवार तरीके से उन प्राणियों का रिकार्ड बनाया गया है, जो बाद के काल में मौजूद नहीं पाये गये हैं। दरअसल ऐसी भी कोई घटना घटी थी, इस बारे में भी इससे पहले कुछ भी पता नहीं चला था।

ऐसी कोई घटना घटी थी उसका पता पहले नहीं चल पाया था

समझा जाता है कि उस काल में पृथ्वी की भौगोलिक संरचना भी अलग थी और टेक्टोनिक प्लेटों की टक्कर की वजह से ऐसे सामूहिक विनाश की प्रक्रिया प्रारंभ हुई थी।

एक प्लेट के धरती के गर्भ में पूरी तरह समा जाने की वजह से उस दौरान हुए भूकंप के अति विनाशकारी होने का भी अनुमान व्यक्त किया गया है।

लेकिन यह पता चला है कि जब पृथ्वी की ऊपरी सतह ऐसे दलदल से युक्त थी, उस वक्त हुए बदलाव की वजह से अचानक से शीतकाल आ गया था और पूरी पृथ्वी फिर से बर्फ से ढक गयी थी।

इस बदलाव की वजह से भी अनेक प्राणियों के क्रमिक विकास की दिशा बदल गयी थी। इनमें बंदर से क्रमिक विकास कर आगे बढ़ने वाले आज के इंसान भी है।

डॉ डी व्राइस कहते हैं कि यह दरअसल किसी कंप्यूटर के रि सेट बटन को दबाने जैसी स्थिति थी। जिसकी वजह से उस काल तक जो कुछ भी विकास हुआ था, वह लगभग समाप्त हो गया था और नये सिरे से हर जीवन की शुरुआत हुई थी।

इस बारे में स्टोनी ब्रूक यूनिवर्सिटी के डॉ स्टीफन हेरिटेज कहते हैं कि यह वाकई एक सामूहिक विनाश का बहुत बड़ा दौर था, जिसके प्रमाण अब मिल रहे हैं।

शोध के निष्कर्ष है कि इसी बदलाव की वजह से अनेक प्राणियों जिनमें बंदर भी शामिल हैं, के दांतों की संरचना बदली और इससे क्रमिक विकास की गति पहले के लिहाज से दूसरी दिशा में आगे बढ़ने लगी।

प्राचीन काल में मौजूद प्राणियों की वर्तमान प्रजातियों को देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि लगभग हर प्राणी के दांतों को संरचना को इस सामूहिक विनाश और उसके बाद के घटनाक्रमों ने बदलकर रख दिया था।



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