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बिच्छू के डंक जैसा जहरीला है यह सामान्य पेड़

  • वर्षा वनों के अंदर मिला यह जहरीला पेड़

  • दिल के आकार का चौड़ा पत्तेदार पौधा है

  • आग लगने जैसा कष्ट देता है इसका जहर

  • ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में शोध में नई जानकारी

रांचीः बिच्छू के डंक का कष्ट वही जानता है, जो उस जहर के दौर से कभी गुजरा है।

लेकिन उसके अनुभव के आधार पर उसके आस पास के अथवा प्रत्यक्षदर्शी भी इसे अच्छी

तरह महसूस कर सकते हैं। इस जहर का असर औसतन चौबीस घंटे तक रहता है और

जहर की वजह से पूरे शरीर में आग लगने जैसा कष्ट महसूस होता रहता है। अब पहली

बार पता चला है कि ऑस्ट्रेलिया में एक ऐसा पेड़ भी है, जिसके अंदर बिच्छू के डंक जैसा ही

जहर भरा है। ऑस्ट्रेलिया के जंगलो मे वैसे भी जहरीले प्राणी अधिक पाये जाते हैं। वहां के

मकड़े, सांप के अलावा समुद्री जीवों में भी जहर होता है। लेकिन शोधकर्ताओं को पहली बार

एक पेड़ मिला है, जिसमें ऐसा खतरनाक जहर ह । वैज्ञानिक परिभाषा में इस पेड़ को

डेनड्रोकनाइड पेड़ कहा जाता है। जिस जंगल के अंदर इसे पाया गया हैं, वहां के स्थानीय

निवासी इसे अपनी भाषा में गिम्पी गिम्पी कहते हैं। ऑस्ट्रेलिया के वर्षा वन में यह

जहरीला पेड़ खोजा गया है। वैसे तो दुनिया के कई अन्य भागों में भी जहरीले पेड़ होते हैं

लेकिन इसके जहर का सबसे तेज और खतरनाक माना गया है। शोधकर्ता मानते हैं कि

इस पेड़ का जहर असर डालने पर उसका कष्ट एक सप्ताह तक जारी रह सकता है। दिल

के आकार के बड़े पत्ते वाला यह पेड़ देखने में किसी आम पत्तेदार पेड़ के जैसा ही होता है।

लिहाजा प्रारंभिक दृष्टि में इसके इतने खतरनाक होने का पता भी नहीं चलता है। उत्तरी

पूर्व क्वींसलैंड के इलाके में यह पेड़ पाया गया है। ऑस्ट्रेलिया के एक शोध दल ने इस पेड़

के बारे में और अधिक अनुसंधान करना प्रारंभ किया है ताकि उसकी अन्य विशेषताओं का

भी पता लगाया जा सके।  

बिच्छू के डंक का असर सिर्फ पत्ता से रगड़ खाने पर

आम तौर पर ऐसे वर्षा वनों से गुजरने वाले लोग अगर इस पेड़ के पत्तों से रगड़ कर आगे

बढ़ गये तब भी उसका जहर बिच्छू के डंक के जैसा काम करने लगता है। इसकी चपेट में

आने वालों का अनुभव है कि पत्ते से बदन रगड़ाने के कुछ देर बाद से जलन जैसी महसूस

होने लगती है। धीरे धीरे यह जलन आग के जैसी बढ़ती है और पूरा शरीर इसकी चपेट में

आ जाता है। कई घंटों तक यह स्थिति रहने के बाद इसका प्रभाव धीरे धीरे कम होने

लगता है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि इसके पत्तों में रोएंदार हिस्से ही दरअसल जहरीले डंक

के जैसा काम करते हैं। बाद में आग जैसी जलन समाप्त होने के बाद पीड़ित को ऐसा

महसूस होता है कि जिस हिस्से में पत्ते की रगड़ लगी थी, वह हिस्सा मानों की किसी के

दरवाजे के बीच दब गया है। यह दर्द कई दिनों तक जारी रहता है। यूनिवर्सिटी ऑफ

क्वींसलैंड के वैज्ञानिक इस पर अनुसंधान कर रहे है । अजीब स्थिति यह है कि आग जैसी

जलन से छुटकारा पाने के लिए अगर आप पानी से स्नान भी करते हैं तो जहर का असर

फिर से तेज हो जाता है और कष्ट कम होने के बदले बढ़ता जाता है।

जहर दरअसल एक न्यूरोटॉक्सिन मिनी प्रोटिन

इस शोध से जुड़ी विश्वविद्यालय के मॉलिक्यूलर बॉयोसाइंस की की प्रोफसर इरिना वेटर

ने कहा कि इस पेड़ के अंदर न्यूरो टॉक्सिन मिनी प्रोटिन पाये गये हैं। यह न्यूरो टॉक्सिन

मिनी प्रोटिन ही शरीर में जहर का प्रभाव पैदा करते हैं। इस पेड़ के अंदर के जहर का भी

विश्लेषण किया गया है और यह पाया गया है कि यह गॉयपीटाइड्स श्रेणी का है, जो आम

तौर पर कुछ जानवरों में भी होता है। इस शोध के बारे में अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका जर्नल साइंस

एडवांसेज में शोध प्रबंध प्रकाशित किया गया है। जिसमें इस जहर का मस्तिष्क के साथ

साथ शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव तथा जहर के अन्य तरीकों से बतौर दवा इस्तेमाल की

संभावनाओं पर भी अनुसंधान अभी जारी है।

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