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अंतरिक्ष में भी वर्षों तक जीवित रहते हैं यह अति सुक्ष्म प्राणी

  • कुछ बैक्टेरिया के प्रचंड शक्तियों का पता चला

  • जापान के शोध दल के परीक्षण का नतीजा

  • एक पर्त के सारे बैक्टेरिया अंतरिक्ष में मर गये

  • मरे बैक्टेरिया के नीचे उसकी प्रजाति जीवित रही

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः अंतरिक्ष में जब पहली बार स्पेस स्टेशन पर बैक्टेरिया पाया गया था तो कई

सवाल खड़े हो गये थे। आपको याद दिला दें कि इसी दौरान अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन में

अचानक रहस्यमय तरीके से एक छेद भी हो गया था। इस मुद्दे पर भी अमेरिका और रुस

एक दूसरे को संदेह की नजर से देख रहे थे। अब पता चला है कि बैक्टेरिया अंतरक्ष के अति

कठिन परिस्थितियों में भी कई वर्षों तक जीवित रह सकता है। जापान के वैज्ञानिकों ने

बैक्टेरिया के इस गुण का पता लगाया है। इस खोज से उस आकलन की भी पुष्टि हो गया

है कि बैक्टेरिया और वायरस हमारी पृथ्वी के बाहर भी मौजूद हैं। कुछ उल्कापिंडों और ग्रहों

में भी इनके होने का आकलन पूर्व में किया गया है।

जापान के वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया है कि अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन में तीन वर्षों तक

ऐसे बैक्टेरिया मौजूद रहे और वे इस स्पेस स्टेशन के आवरण के बाहर लगातार जीवित

रहे। इस दौरान इन सुक्ष्म प्राणों पर विकिरण और तापमान का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

जापान के वैज्ञानिकों की इस खोज को अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका माइक्रोबॉयोलॉजी में प्रकाशित

किया गया है।

अंतरिक्ष में बैक्टेरिया पर बाकायदा शोध हुआ

जापान के वैज्ञानिकों ने इस पर शोध के लिए एक अलग अभियान ही प्रारंभ किया था। इस

अभियान को तानापो अभियान नाम दिया गया था। इसके माध्यम से एस्ट्रोबॉयोलॉजी पर

अध्ययन करते हुए यह पता लगाना था कि एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जीवन को

स्थानांतरित कैसे किया जा सकता है। शोध के इसी दायर में पृथ्वी से थोड़ी ऊंचाई पर

लेकिन वायुमंडल से बाहर जीवन के होने की परिस्थितियों का अध्ययन करना था। इसके

जरिए उस पैनस्परमिया सिद्धांत को भी परखना था कि अति सुक्ष्म जीवन एक ग्रह से

दूसरे ग्रह तक जाकर जीवन का विकास कर सकते हैं।

इसी शोध के लिए जापान के वैज्ञानिकों ने एक परीक्षण अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन पर भी

किया था। इनलोगों ने डेइनोकोकूस नामक बैक्टेरिया को सूखी हुई अवस्था में एक

अल्युमिनियम के प्लेट पर रखकर अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन के पैनल के बाहर रख छोड़ा

था। जहां पर इस खास पैनल को रखा गया था वह लगातार सौरमंडल के विकिरण के

प्रभाव में था। वैसे हरेक की जानकारी के लिए यह बताना जरूरी है कि इस खास किस्म के

डेइनोकोकूस नामक बैक्टेरिया की खोज वर्ष 2018 में हुई थी। यह बैक्टेरिया पृथ्वी से

करीब चार सौ किलोमीटर की ऊंचाई पर पहले से ही मौजूद है। जापानी शोध दल के नेता

आकिहिको यामागाशी और उनकी टीम ने इसी खास बैक्टेरिया को खास पैनल पर रखकर

अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन तक पहुंचा दिया था। वह देखना चाहते थे कि अंतर्राष्ट्रीय स्पेस

स्टेशन की स्थिति में इस बैक्टेरिया पर क्या कुछ प्रभाव पड़ता है और क्या यह सुक्ष्म

जीवन वहां भी जीवित रह सकते हैं।

स्पेस स्टेशन के बाहरी पैनल पर जिंदा रहा यह बैक्टेरिया

इसे जांचने के मकसद जीवन को एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक पहुंचने की कड़ी की तलाश

करना था। अलग अलग प्रकार की पर्तों में इस श्रेणी के बैक्टेरिया को वहां भेजा गया था।

इनके नमूनों को एक से लेकर तीन साल तक की जांच की गयी है। वहां से लौटाकर लाये

गये बैक्टेरिया की बाद में जांच की गयी। इस जांच में यह पाया गया कि जो आकार में 0.5

मिलिमीटर से अधिक थे वे जीवित तो थे लेकिन उनके डीएनए को जबर्दस्त नुकसान

पहुंचा था। सतह पर रखे गये एक पर्त के सारे बैक्टेरिया पूरी तरह मर भी गये थे। लेकिन

अजीब बात यह थी कि ऊपर के बैक्टेरिया की जो पर्त पूरी तरह मर गयी थी, वे अपने नीचे

के बैक्टेरिया के लिए बचाव की छतरी के तौर पर काम करते रहे। लिहाजा नीचे की पर्त के

बैक्टेरिया जीवित रहे। इस शोध से अब जापान के वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि

इस विधि से यह प्रमाणित हो गया है कि सुक्ष्म जीवन एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक भी पहुंच

सकता है। अंतरिक्ष के अति कठिन परिस्थितियों में भी वे इसी पद्धति का आचरण करते

हुए जीवित रह सकते हैं। अंतरिक्ष स्पेस स्टेशन के बाहर का तापमान अत्यंत कम होता है

जबकि वहां सूर्य का विकिरण अत्यंत घातक स्थिति में होता है। वहां बैक्टेरिया को पोषण

मिलने की कोई स्थिति भी नहीं होती। इस हाल में जीवित रहने वाले सुक्ष्म प्राणी निश्चित

तौर पर दूसरे ग्रह तक का सफर भी तय कर सकते हैं। आकार में एक सौ माइक्रोमीटर या

उससे बड़े बैक्टेरिया के मर जाने से उनके नीचे रहे अन्य छोटे आकार के बैक्टेरिया को

बचाव की छतरी मिली हुई थी। इस मृत बैक्टेरिया की पर्त के नीचे 500 से एक हजार

माइक्रोमीटर के आकार के बैक्टेरिया जीवित रहने में सफल रहे हैं।

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