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इस बार की बेरुखी परेशान करेगी नीतीश कुमार की सरकार को

  • कोरोना संकट के दौरान सरकारी स्तर पर नाकाफी इंतजाम

  • सुशासन सरकार से इस बार जनता निराश

  • गरीबों तक नहीं पहुंच पा रही है राहत

  • सवालों का उत्तर सरकार ही देगी

दीपक नौरंगी

भागलपुरः इस बार की सरकारी बेरुखी अंततः सरकार पर भारी पड़ने जा रही है। नीतीश

कुमार के मुख्यमंत्री रहते यहां की व्यवस्थाओं की वजह से ही इस सरकार को सुशासन

सरकार की संज्ञा दी गयी थी। यही सुशासन की सरकार इस बार कोरोना संकट में लोगों के

दर्द को दूर करने में लगातार विफल साबित हो रही है।

वीडियो में जानिए क्यों ऐसी हालत है

सरकार की तरफ से चलाये जाने वाले राहत अभियानों के काफी हद तक ठीक होने के बाद

भी राशन कार्ड वितरण की बहुत बड़ी प्रशासनिक विफलता बार बार इसकी राह में रोड़े

अटका रही है। दूसरी तरफ दोबारा लॉक डाउन लागू किये जाने के बाद गरीब और

साधनहीन परिवारों के लिए दो वक्त की रोटी जुटा पाना फिर से कठिन हो चुका है। ऐसे

परिवारों तक सरकारी राहत की रोशनी नहीं पहुंच पाने की वजह से समाज के अंदर जो

नाराजगी उपज रही है, उस नाराजगी के उपजे सवालों का उत्तर तो इसी सरकार को बाद

में देना पड़ेगा।

स्थिति का जायजा इस बात से भी लिया जा सकता है कि अपने परिवार की जरूरतों को

पूरा करने के लिए अब घर के बच्चों तक को दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए जद्दोजहद

करने की चुनौती का सामना करना पड़ा रहा है।

इस बार की स्थिति में उदाहरण है खिलौने बेचने वाला परिवार

इस स्थिति को समझने के लिए हमलोगों ने सड़क पर खिलौने बेच रहे संजीव दास से भी

बात की। श्री दास हाथ से लाचार हैं। उन्होंने बताया कि बचपन में ही एक हादसे की वजह

से उनके दोनों हाथ कट गये थे। इसके बाद भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी और जिंदगी की

जंग में अपनी पूरी ताकत से जूझते रहे। कोरोना संकट के दौरान अपनी तीन बेटियों और

दो बेटों को पालने की बड़ी चुनौती उनके सामने है। बाजार में भीषण मंदी होने की वजह से

उन्हें खिलौने बेचना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि किसी तरह पचास साठ रुपये हर दिन

कमा लेने की वजह से किसी तरह गुजारा हो रहा है। लेकिन सरकार की तरफ से उन्हें कोई

राहत नहीं मिली है। यही हाल अन्य गरीब परिवारों और दिहाड़ी कमाई करने वाले

अधिकांश लोगों का है। संजीत को यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि कई बार

कमाई नहीं होने की स्थिति में घऱ पर कम खाना बनता है अथवा नहीं भी बनता है।

संजीव की बेटी राखी भी अपने पिता की दुकानदारी में मदद करने उनके साथ ही बैठ रही

है। सभी की मंशा है कि खिलौने कुछ ज्यादा बिक जाए तो घर के बाकी लोगों के लिए

भोजन का प्रबंध हो सके। राखी के साथ ही बगल में संजीत का पुत्र मोहित भी बैठा है।

तीनों लोग मिलकर दिनभर इसी संघर्ष में जुटे हैं कि किसी तरह सम्मानपूर्वक दो वक्त की

रोटी का इंतजाम हो सके। सरकार की तरफ से निराश हो चुके ऐसे लोगों का आसरा अब

सामाजिक संगठनों से है। लेकिन यह जो आग अंदर ही अंदर सुलग रही है, उस आग में

आने वाले दिनों में कौन झूलसेगा, इसे समझना कठिन भी नहीं है।


 

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