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इस बार सत्तारूढ़ भाजपा की जल्दबाजी कहीं घाटे का सौदा तो नहीं

इस बार सत्तारूढ़ भाजपा को बाहर से नहीं बल्कि गठबंधन के अंदर से अधिक चुनौतियों

का सामना करना पड़ रहा है। देश भर में जिन राज्यों में किसान राजनीतिक तौर पर

मजबूत है, वहां के आंदोलन की आंच को स्थानीय स्तर पर भाजपा नेता बहुत अच्छी तरह

महसूस कर पा रहे हैं। यदि इसमें नुकसान का सौदा नहीं होता तो कमसे कम सबसे पुराना

सहयोगी यानी शिरोमणी अकाली दल इस तरह गठबंधन तोड़कर बाहर नहीं चला जाता।

जिस तरीके से अकाली दल के नेता अब इन किसानों से संबंधित कृषि सुधारों पर सरकार

को घेर रहे हैं, उससे कमसे कम इतना साफ है कि अकाली दल को भी अपने पंजाब में

किसानों के नाराज होने का एहसास है। इस बार की जल्दबाजी इस वजह से भी शंका के

घेरे में है क्योंकि नोटबंदी और जीएसटी की जल्दबाजी तक तो भारतीय जनता का धैर्य

कायम था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बातों पर जनता के बहुमत को भरोसा था। अब

परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी है। देश में भाजपा क्या सभी राजनीतिक दलों के

जनाधार का जबर्दस्त तरीके से क्षरण होता जा रहा है। कोरोना संकट की मार से

राजनीतिक दल भी अप्रभावित नहीं है। इसलिए जल्दबाजी में बिल लाने और असली

किसानों से इस पर व्यापक चर्चा नहीं करने का मुद्दा भाजपा को परेशान कर सकता है।

इस बार का संकट बिहार का विधानसभा चुनाव भी

यह परेशानी इसलिए भी है क्योंकि अब बिहार में चुनाव होने वाले हैं। उसके बाद पश्चिम

बंगाल और अन्य वैसे राज्यों का नंबर लगना हैं, जहां की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित ही

है । ऐसे में किसानों के सवालों का उत्तर तो उन्हें ही देना है, जो इस नई व्यवस्था के

पक्षधर हैं। संसद में जल्दबाजी में पारित तीन कृषि विधेयकों के खिलाफ किसानों का

भारत बंद, कुछ राज्यों में जोरदार तो कुछ में ढीला रहा। सबसे ज्यादा असर पंजाब और

हरियाणा में देखने को मिला। पंजाब में अमृतसर, फरीदकोट समेत कई शहरों में किसान

रेलवे ट्रैक पर बैठे दिखे । जिस तरह बहुमत के बल पर जल्दबाजी से तीन कृषि अध्यादेशों

को नये कानूनों में बदला गया है,उसका विरोध भी प्रजातंत्र में आस्था रखने वाले लोग कर

रहे हैं। इस सम्पूर्ण घटनाक्रम से हमारी संसदीय लोकतांत्रिक पद्धति के भविष्य को लेकर

कई सवाल पैदा होते हैं।जैसे विपक्ष की आवाज़ को अनसुना कर दिया जाना । वास्तव में

यह मुद्दों पर सार्थक बहस न होने देने वाली ताकत का गलत नमूना ही तो है। अब तक

स्थापित परंपरा यही है कि सरकार सदन में कानून का मसौदा रखते वक्त इसकी

उपयोगिता गिनाती है और चर्चा होती है, किंतु पिछले कुछ वक्त से बहस करवाने की

जरूरी प्रक्रिया की अनदेखी करते हुए विधायी प्रक्रिया का ह्रास करना नित्यक्रम हो गया है।

लोकतंत्र में प्रक्रियाओं के उल्लंघन की घटनाएं बढ़ रही हैं

यह दृश्य राज्य विधान सभा में तो आम हो गया है । सदन के सत्रावसान का उपयोग “वीटो

पावर “की तरह होने लगा है। लोकतंत्र में कोई ऐसा कानून, जिसे सरकार जोर-जबरदस्ती

से लाद कर यह कहे कि जनता खुशी से कबूल रही है और पालना करेगी, तो यह दावा

करना सही नहीं,बल्कि चिंगारी को हवा देना है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि स्वतंत्र भारत के

कृषक समुदाय की प्रतिष्ठा कायम करने के स्थान पर सरकार उसे वोट बैंक समझती है ।

सब यह जानते हैं कि किसी कानून की प्रभावशीलता उसके न्यायोचित होने और सार्थकता

महसूस करने पर आधारित होती है। पहले से ही कोरोना महामारी से बनी अति विकट

स्थितियों के बावजूद नये विवादित कृषि कानूनों को लेकर आज सड़कों पर जनाक्रोश

देखने को मिल रहा है । पंजाब के मुख्यमंत्री इस प्रतिक्रिया ने कि “जिस तरह संसद में

कानूनों को धक्के से पारित करवाया गया है, उसे न्यायलय में चुनौती दी जाएगी “।

भारतीय शासन व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं

भारतीय संघीय व्यवस्था के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। नये कृषि कानूनों और

पारित करने के तरीके का विरोध देशभर में हो रहा है और भिन्न राजनीतिक विचारधारा

वाले दल इन्हें बनाने एवं लागू करने के खिलाफ हैं। कांग्रेस, डीएमके, तृणमूल कांग्रेस,

एआईएडीएमके, बीजेडी, आरजेडी, टीआरसी, शिरोमणि अकाली दल और वाम दलों ने

अपना पक्ष रखते हुए मांग की है कि तीनों कानूनों को राज्यसभा के चुनींदा सदस्यों वाली

समिति के पास विस्तृत पुनः समीक्षा के लिए भेजा जाए। होना तो यह चाहिए था, विपक्ष

शासित राज्य सरकारों और संबंधित पक्षों से पहले समर्थन जुटाया जाता। बहस के लिए

मान भी लें कि सारा कुछ विरोधियों का कुप्रचार है तब भी यह सरकार की जिम्मेदारी

बनता ही कि वह सबसे पहले किसानों को पूरी जानकारी देकर उनका भरोसा हासिल करे।

इसके विपरीत केवल खुद को सही समझने वाली सरकार अपने निर्णयों को सही सिद्ध

करने पर अड़ी है।सरकार का प्रदर्शन संसद के अंदर और बाहर ऐसा ही दिखा । बाहर जो

हालात हैं उससे ऐसा प्रतीत होता है इस बार की जल्दबाजी शायद सरकार को संकट में डाल

सकती है।


 

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