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यह पानी माइनस 44 डिग्री में भी नहीं जमता है




  • जल के हिमांक को हम स्कूल से जानते हैं

  • बहुत छोटे आकार के जलकणों पर किया प्रयोग

  • आसमान पर बादलों की संरचना भी कुछ ऐसी है

  • शोध के बाद सुपर कूल वाटर बनाने में सफलता पायी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः यह पानी शून्य से 44 डिग्री के नीचे के तापमान पर भी पानी ही बना रहता है। वरना हम स्कूल में ही पानी के हिमांक के बारे में जानते आये हैं। हमें यह पढ़ाया गया है कि चार डिग्री तापमान पर पानी का घनत्व सबसे अधिक होता है तथा शून्य डिग्री तापमान पर यह पानी जमकर बर्फ बन जाता है।




इसलिए वैज्ञानिक लंबे समय से इस पर शोध कर रहे थे कि ऐसा कोई सुपर कूल वाटर यानी अति ठंडा पानी तैयार किया जाए तो शून्य डिग्री से नीचे भी बर्फ ना बने और अपने मूल स्वरुप यानी जल की अवस्था में रहे।

अब यह पानी हमारे सामने हैं जो अत्यधिक ठंडे तापमान पर भी जमता नहीं है। वैसे वैज्ञानिकों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इसे यह गुण प्रदान करने के लिए कुछ फेरबदल करने पड़े हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ हाउस्टन के वैज्ञानिकों के दल ने डॉ हादी घासेमी के नेतृत्व में इस पर काम किया है।

जिस पानी के जमने से रोका गया है वह बहुत ही छोटे आकार के जलकण हैं। इतने छोटे आकार के जलकण सामान्य तापमान पर पलक झपकते ही भाप बनकर उड़ जाते हैं। शोधकर्ताओँ ने यह पाया था कि अल्युमिनियम ऑक्साइड के छोटे कण अगर तेल से घिरे हों तो वे दूसरे किस्म का आचरण करने लगते हैं।




अल्युमिनियम के छोटे कण तापमान के गिरने से प्रभावित तो होते हैं लेकिन उसके बाहरी आवरण पर मौजूद तेल उस पर दबाव डालता रहता है।

यह पानी सामान्य आकार से भी बहुत छोटे छोटे कणों में हैं

इसके पहले ही शोध में यह पता चल गया था कि कमसे कम 275 अणु मौजूद होने के बाद ही पानी का बर्फ में तब्दील होना प्रारंभ होता है। इन दोनों सूचनाओं को मिलाते हुए बहुत छोटे आकार के जल कणों पर यह शोध किया गया और वे प्रयोग के दौरान शून्य से 44 डिग्री नीचे के तापमान में भी पानी के बूंद के तौर पर बने रहे।

इसी आधार पर वैज्ञानिक यह भी मान रहे हैं कि शायद कड़ाके की ठंड में रहने वाले पशु भी अपने शरीर की जल की जरूरतों को पूरा करने के लिए आतंरिक तौर पर किसी ऐसी प्रक्रिया का पालन करते हैं

वैसे इस प्रयोग के सफल होने के बाद एयरोनॉटिक्स से लेकर अंग प्रत्यारोपण तक में इस विधि के अत्यंत कारगर साबित होने की उम्मीद जतायी गयी है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि शायद आसमान की ऊंचाई पर बहुत कम तापमान होने के बाद भी पानी के बादल इसी वजह से जमते नहीं हैं और इसका मौसम विज्ञान के साथ भी नजदीकी रिश्ता है।



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