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विलुप्त समझी गयी मछली तो जीवित हालत में मिली

  • 23 मिलियन वर्ष पहले की सुरक्षित फॉसिल मिले थे

  • दक्षिण अफ्रीका के तट पर मिली जीवित मछली

  • वर्ष 1938 में इसकी सुरक्षित फॉसिल पायी गयी थी

  • प्राचीन पृथ्वी के समुद्री जीवन पर रोशनी डालेगी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः विलुप्त समझी गयी मछली अब दक्षिण अफ्रीका के तट के करीब देखे जाने से

वैज्ञानिक उत्साहित हैं। दरअसल वैज्ञानिक रिकार्ड में इस प्रजाति की मछली को विलुप्त

मान लिया गया था। दरअसल शोध के दौरान सुरक्षित फॉसिल मिलने के बाद दोबारा इस

मछली के बारे में कुछ पता नहीं चल पाया था। इसी वजह से समुद्र विज्ञान के वैज्ञानिकों ने

यह मान लिया था कि यह प्रजाति विलुप्त हो चुकी है। विलुप्त समझी गयी इस मछली का

नाम शीलालाह कांथ है। उसके अवशेष वर्ष 1938 में पाये गये थे। उसके बाद से उसके बारे

में कुछ भी पता नहीं चल पाया है। लेकिन हाल ही में इस प्रजाति की मछली फिर से देखे

जाने के बाद यह माना जा रहा है प्राचीन पृथ्वी में वास करने वाली इस प्रजाति की

मछलियां अब भी मौजूद हैं।


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वैसे प्रारंभिक साक्ष्यों और तथ्यों से यह पता चला है कि क्रमिक विकास का असर इस

प्रजाति की मछलियों पर भी पड़ा है। उनके जिनोम में भी कई बदलाव हुए हैं। इस प्रजाति

की मछली दोबारा देखे जाने के बाद इसके बारे में मॉलिक्यूलर बॉयोलॉजी एंड इवोल्युसन

में एक शोध प्रबंध भी प्रकाशित किया गया है। यूं तो प्राचीन प्रजाति की मछलियों के

अनेक स्वरुप बदल चुके हैं। लिहाजा प्राचीन अवशेषों से वर्तमान प्रजाति का मेल तलाशना

कठिन हो चुका है। लेकिन विलुप्त समझी गयी मछली के वर्तमान स्वरुप में उतने बदलाव

नहीं हुए हैं, जिससे उन्हें अलग प्रजाति की मछली मान लिया जाए। इतने प्राचीन काल की

मछली के अब भी मौजूद होने के बाद वैज्ञानिक उसके माध्यम से भी पृथ्वी के समुद्री

जीवन में हुए बदलावों को समझने की कोशिश कर रहे हैं। 

यह भी पता चला है कि क्रमिक विकास के दौर में इस मूल प्रजाति से भी अन्य प्रजातियां

विकसित हुई हैं और उनमें जेनेटिक बदलाव अधिक हुए हैं।

विलुप्त समझी गयी इस मछली का आकार बड़ा है

आकार में काफी बड़ी मछली की दूसरी विशेषता यह है कि पृथ्वी के समुद्र में करीब तीन सौ

मिलियन वर्ष पूर्व जो मछली बनी थी, उसके मूल जेनेटिक स्वरुप के अनेक अंश इसमें

विद्यमान हैं। दक्षिण अफ्रीका के तट पर इस मछली के होने लेकिन बहुत कम संख्या में

होने की जानकारी दी गयी है। जेनेटिक आधार पर इन प्रजातियों की पहचान करने के

दौरान 62 ऐसे जिनोम की पहचान हुई थी, जिन्हें जपिंग जिन कहा जाता है। दरअसल यह

ऐसे जिन हैं जो जिनोम कड़ी में कहीं भी घूमते रहते हैं और जरूरत पड़ने पर अपनी

प्रतिकृति भी खुद ही बना लेते हैं। लेकिन जिनोम श्रृंखला में इनके स्थान बदलने से प्राणी

का आचरण बदलता है। इन्हीं 62 जिनों के माध्यम से इस शीलालाह कांथ मछली के बारे

में अधिक जानकारी मिली है। इसके आधार पर ही वैज्ञानिक यह कह पा रहे हैं कि जेनेटिक

बदलावों के बाद भी यह मछली अपने असली स्वरुप के काफी करीब बनी हुई है।


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शोधकर्ता इसी क्रम में इस नतीजे पर भी पहुंचे हैं कि इन जपिंग जिनों की वजह से कई बार

गड़बड़ी भी हो जाती है क्योंकि जिनोम कड़ी में किसी दूसरे स्थान पर पहुंचने के बाद वे पूरे

शरीर के आचरण को ही बदल डालते हैं। टोरंटो विश्वविद्यालय के इस शोध दल ने विलुप्त

समझी गयी मछली के आधार पर पृथ्वी के समुद्री जीवन में जेनेटिक तौर पर क्या कुछ

बदलाव हुआ है, उसे समझने की कोशिश की है। सबसे अच्छी बात यह है कि प्राचीन काल

से इस प्रजाति की मछली में बहुत ज्यादा कुछ भी नहीं बदला है। लेकिन वर्तमान में इनकी

तादाद इतनी कम है कि उन्हें विलुप्त प्रायः जीवन की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसके

बारे में अन्य विवरण भी दर्ज किये जा रहे हैं।

इससे मिलती जुलती प्रजाति इंडोनेशिया के इलाके में है

इसी क्रम में मछलियों सहित अन्य समुद्री जीवन को प्रभावित करने वाले परजीवियों की

तरफ भी वैज्ञानिकों का ध्यान गया है। वह मानते हैं कि पानी के अंदर बहुतायत में पाये

जाने वाले ऐसे परजीवी कई प्रजातियों के लिए भीषण खतरा बन जाते हैं। दूसरी तरफ

संबंधित प्राणी के पास इस परजीवी से बचने का कोई रक्षा कवच भी नहीं होता है। शोध के

क्रम में यह जानकारी भी मिली है कि इस प्राचीन और विलुप्त समझी गयी मछली का

नजदीकी जेनेटिक रिश्तेदार लैटीमेरिया मेनाडोनिस है, जो इंडोनेशिया के इलाकों में पाया

जाता है। वैज्ञानिकों का यह भी अनुमान है कि हो सकता है कि समुद्र के स्थान बदलने

अथवा टेक्टोनिक प्लेटों के खिसकने के दौरान समुद्र का वह हिस्सा दो हिस्सों में बंट गया

था। जिसकी वजह से एक ही प्रजाति की मछली अलग अलग इलाकों में अलग अलग

जेनेटिक गुणों के साथ विकसित होती चली गयी है।

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