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इस मछली की चमड़ी में रोशनी सोखने के अजीब गुण

  • स्मिथसोनियन संस्थान के वैज्ञानिकों की नई खोज

  • वैज्ञानिकों को नजरों में पकड़ में नहीं आ रहा था

  • शिकार देकर ललचाया गया तब तस्वीर खींची गयी

  • कैमरे के फ्लैश की रोशनी को भी सोख लेती है यह

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः इस मछली को देखने में ही वैज्ञानिकों को काफी समय लगा था। अत्याधुनिक

यंत्रों से किसी जलज प्राणी के होने का पता तो चल रहा था लेकिन वैज्ञानिक उसे सही

तरीके से देख नहीं पा रहे थे। काफी प्रयास के बाद जब इसे देखा जा सका तब इसके बारे में

और अधिक जानकारी मिल पायी। गहरे काले रंग की इस मछली पर और शोध हुआ तो

यह बात सामने आयी कि इस मछली की चमड़ी में अजीब किस्म का गुण है। इसी वजह से

अपने ऊपर पड़ने वाली रोशनी का 99.5 प्रतिशत वह सोख लेती है। रोशनी को सोख लेने

की वजह से ही वह अधिकांश अवसरों पर नजरों से ओझल ही रहती है। वैसे भी यह गहरे

समुद्र की मछली है और वहां के अंधेरे से बाहर नहीं आती है।

स्मिथसोनियन के वैज्ञानिकों ने कुछ और शोधकर्ताओं के साथ मिलकर इस क्रम में समुद्र

में 16 नई प्रजातियों की खोज की है। इन सभी के बारे में अभी और आंकड़े एकत्रित किये

जा रहे हैं। सारे आंकड़े एकत्रित कर लेने के बाद भी इन सभी प्रजातियों का एक एक कर

विश्लेषण किया जाएगा। शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने साफ कर दिया है कि रोशनी सोख लेने

के गुण की वजह से ही सामान्य परिस्थितियों में इंसान की आंखे इस मछली को देख ही

नहीं सकती है। शायद यह भी एक कारण रहा है जिसकी वजह से यह अब तक इंसानी

खोज के दायरे में बाहर रहने में सफल रही है। लेकिन अब इसे खोज लिया गया है और

उसके बारे में अधिक अनुसंधान किया जा रहा है।

इस मछली के होने के बाद भी उसे देखा नहीं जा रहा था

शोध करने वाले वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि समुद्र की गहराई में सीधी पड़ने वाली सूर्य

की किरणें भी अधिकतम बीस मीटर की गहराई तक जाती है। इस गहराई के बाद वे हल्की

पड़ने लगती हैं और दो सौ मीटर के बाद सूर्य का अता पता नीचे से नहीं चलता है। इससे

और अधिक गहराई में हमेशा ही घुप्प अंधेरा छाया रहता है। इस अंधेरे की वजह से भी पूरी

दुनिया के समुद्र के अधिकांश हिस्सों के बारे में अब तक पूरी जानकारी नहीं मिल पायी है।

वैसे एक वैश्विक अभियान चल रहा है। जिसके तहत पूरी दुनिया के समुद्र के अंदर की

स्थिति की मैपिंग कर एक मानचित्र बनाने की योजना है। इस रोशनी सोखने वाली मछली

को खोजने वाले अनुसंधान दल से जुड़ी कैरन ऑसबर्न ने कहा कि प्रारंभिक तौर पर घने

अंधेर में किसी प्राणी के होने का पता चलने के बाद भी वह न तो खुली आंखों से दिख रही

थी और न ही आधुनिक उपकरण उसे साफ तरीके से कैमरे में कैद कर पा रहे थे। उन्होंने

बताया कि समुद्र की इस गहराई में रोशनी का सबसे बड़ा स्रोत प्राणियों के अपने शरीर से

चमकने वाली रोशनी ही है। इस रोशनी को भी सोखने की क्षमता रखने की वजह से यह

मछली अब तक इंसानी आंखों से ओझल रहने में कामयाब रही थी।

जब नजर आया तो अन्य आंकड़े भी जुटाये गये

समुद्र में गतिविधि होने के बाद भी प्राणी के पकड़ में नहीं आने की वजह से शोध दल ने

इसे ललचाने के लिए शिकार पेश किया था। भोजन की तलाश में आने और वहां ठहरने की

वजह से वैज्ञानिक इसे पहली बार आधुनिक यंत्र की मदद से सही तरीके से देख पाये। एक

बार देख लेने के बाद उसके शारीरिक बनावट के अन्य हिस्सों के आंकड़े भी जुटाये गये

और उनका क्रमवार तरीके से विश्लेषण किया गया। वैसे अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया

है कि काले रंग की इस मछली की चमड़ी में वह कौन सा गुण है, जिसकी वजह से वह

रोशनी सोख लेती है। उसकी तस्वीर लेने के लिए वैज्ञानिकों ने आधुनिक कैमरे और फ्लैश

भी लगाये थे। हर बार वह मछली रोशनी सोख लेने में कामयाब रही।

वैसे इस मछली को खोज लेने के बाद अन्य वैज्ञानिक इसकी मदद से फिर से फिर से गहरा

काला रंग बनाने की सोच पर आगे काम कर रहे है। गहरे काले रंग का दुनिया में काफी

वैज्ञानिक उपयोग भी है। अभी पिछले वर्ष ही एमआइटी के वैज्ञानिकों ने दुनिया के एक

गहरा काला बनाने में कामयाबी पायी है। वह रंग 99.96 प्रतिशत रोशनी सोख लेने में

सक्षम है। इस मछली की मदद से हो सकता है कि यह और बेहतर काला रंग बनाने में

मददगार बने।


 

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