चुनाव में राजनीतिक दलों की बढ़ रही परेशानी

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चुनाव करीब आ रहे हैं यह तो राजनीतिक दलों के नेताओं की भाषा से ही स्पष्ट होने लगा है। हर पांच साल में होने वाले चुनाव की यह प्रारंभिक पहचान है।

लेकिन इसके बाद भी पिछले चुनाव से इस चुनाव के बीच का सीधा अंतर मतदाताओं की जागरुकता का है।

सोशल मीडिया पर चल रहे प्रचार युद्ध के बीच आम मतदाता अपनी जरूरतों पर ध्यान गड़ाये हुए हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो मतदाता रूपी अर्जुन का पूरा ध्यान मछली की आंख पर है।

तमाम राजनीतिक दल इधर उधर की बात कहकर भी इस ध्यान को अब तक भंग नहीं कर पाये हैं।

दरअसल आम मतदाता निजी जिंदगी और अपने अनुभवों के आधार पर अब राजनीतिक फैसला करने को मानसिक तौर पर काफी तैयार हो चुका है।

दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने एक गंभीर बात कही है कि कोई भी राजनीतिक दल अपने चुनावी एजेंडा में बच्चों और खासकर स्कूली छात्रों के बारे में इसलिए कुछ नहीं कहता क्योंकि ये बच्चे वोट नहीं देते।

लेकिन उनकी बात की गंभीरता का आकलन भी दिल्ली के चुनाव में होगा, जहां तमाम विरोधाभाषों के बीच भी आम आदमी पार्टी की सरकार ने स्कूली शिक्षा व्यवस्था में गुणात्मक सुधार करने में सफलता पायी है।

यह सफलता तब मिली है जबकि पार्टी को केंद्र सरकार से हर मुद्दे पर संघर्ष करना पड़ा है।

वैसे दिल्ली की बात करें तो इस बार के चुनाव में खास तौर पर भाजपा के लिए परेशानी की बात यह है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के बाद भी भाजपा के सभी सांसदों ने दिल्ली में अपनी सरकार बनने के बाद इस पर जुबान तक नहीं खोली।

दरअसल उन्हें आम आदमी पार्टी की प्रचंड बहुमत की सरकार के होते दिल्ली में पूर्ण राज्य का अधिकार होने से कई किस्म का खतरा था।

इसी तरह भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर ही जनता का ध्यान केंद्रित है।

सरकार की तरफ से महंगाई दर में निरंतर कमी आने के बाद भी आम आदमी अपनी खाली होती जेब से परिस्थितियों को तौल रहा है।

कांग्रेस को जिन निरंतर भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से जनता ने गद्दी से बेदखल कर दिया था, उन आरोपों पर कार्रवाई के मुद्दे पर भाजपा की सुस्ती और चुप्पी संदेह पैदा करने वाली साबित हुई है।

साथ ही पिछले चुनाव से पहले जिन मुद्दों पर भाजपा के नेताओं ने कांग्रेस की लगातार आलोचना की थी, उन्हीं मुद्दों पर अपने पूर्व के रुख से अलग हट जाने की वजह से भाजपा पर भी जनता का संदेह बढ़ा है।

इसमें एक अत्यंत गंभीर और उल्लेखनीय बदलाव यह हुआ है कि तमाम किस्म के दावों का भारतीय जनता अब अपने पैमाने पर मूल्यांकन करना सीख रही है।

यह शायद सोशल मीडिया का ही कमाल है, जिसकी मदद से आम जनता हर पहलु के हर पक्ष को जांचने के तरीकों को सीख रही है।

पिछले चुनाव में जिन मुद्दों पर सोशल मीडिया के प्रचार को आंख मूंदकर स्वीकार कर लिया गया था, इस बार ऐसा स्थिति नहीं है।

दूसरी तरफ जनता ने भी उन अदृश्य चेहरों को पहचानना सीख लिया है जो किसी राजनीतिक एजेंडा के तहत मुद्दों पर अपनी राय जाहिर कर रहे हैं।

इसलिए जनता को भरमाने की पहले जैसी कोशिशों का पहले जितना सकारात्मक नतीजा नहीं निकल पाया है।

इतना तय है कि भारत पाकिस्तान सीमा पर उत्पन्न तनाव की वजह से माहौल में बदलाव आया है। पर यह बदलाव इतना पर्याप्त नहीं है कि

वह चुनावी संघर्ष को पूरी तरह एक तरफा बना दे। लेकिन इन्हीं प्रचारों की वजह से देश का आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का भी पूरी दुनिया में संदेश बहुत स्पष्ट गया है।

इससे और कुछ नहीं तो कमसे कम पाकिस्तान में बैठकर लगातार भारत में हिंसा फैलाने की साजिश रचते लोगों का अंतर्राष्ट्रीय समर्थन कम हुआ है।

लेकिन यह भी आगामी लोकसभा चुनाव में शायद ही मतदाताओं की प्राथमिकता का विषय होगा।

राजनीति के मंच पर खास तौर पर भाजपा औऱ कांग्रेस एक दूसरे पर आरोप लगाने के ही खेल में जुटी हुई है।

इनसे अलग आम भारतीय मतदाता, अपने जीवन यापन और जीवन स्तर में सुधार के तौर तरीकों पर विकल्प की तलाश में व्यस्त है।

यही मुख्य वजह है कि राजनीतिक दलों के प्रचार का अपेक्षित प्रभाव अब तक नजर नहीं आ रहा है।

इतना स्पष्ट होता जा रहा है कि वर्तमान समीकरणों के बीच भाजपा के लिए पिछले चुनाव के जितना सफलता हासिल करना आसान नहीं रह गया है।

लेकिन भाजपा के लिए बेहतर बात यह है कि उनके नेता नरेंद्र मोदी है। नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता से ही भाजपा की गाड़ी अब तक दौड़ में आगे नजर आ रही है।

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