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हमारी पृथ्वी शायद चार नहीं पांच परतों में बनी हुई है

  • हमें पता था कि यह चार पर्तों में बंटा है

  • सूर्य का खौलता हुआ हिस्सा इसके केंद्र में

  • उसके ऊपर भी शायद एक और पर्त मौजूद है

  • भूकंप को समझने के शोध के दौरान नई जानकारी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः हमारी पृथ्वी के चार आंतरिक हिस्से हैं, यह अब तक के विज्ञान का स्थापित सत्य

है। इस बारे में लगातार चल रहे शोध के दौरान अब यह अनुमान लगाया जा रहा है कि

दरअसल इसके चार नहीं पांच परत हो सकते हैं। धरती की भौगोलिक संरचना के बारे में

चल रहे निरंतर शोध का लक्ष्य पृथ्वी की गहराई में स्थित तमाम किस्म की संरचनाओं को

समझना है। इसके जरिए पृथ्वी का निर्माण दरअसल कैसे हुआ था, इसे समझने की

कोशिश चल रही है।

वीडियो में समझिये इस वैज्ञानिक सोच और सिद्धांत को

हमारी पृथ्वी पर इंसान और अन्य अधिकांश जीवन इसके ऊपरी पर्त पर ही रहते हैं।

लेकिन इसके नीचे मैंटर की पर्त है। इसे पृथ्वी का सबसे बड़ा हिस्सा माना जाता रहा है।

यह मेंटल हमारी पृथ्वी के 67 प्रतिशत में हैं। इसके नीचे एक और पर्त आती है जो तरल

अवस्था में है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि करोड़ों वर्षों के निरंतर बदलाव के दौरान जो

कुछ यहां बदलाव हुए हैं, उसका प्रमाण इसी तरल अवस्था में स्थित पर्त में हैं। इसका

अधिकांश भाग लोहा और निकेल का बना हुआ है लेकिन वह भी तरल अवस्था में है।

लेकिन यहां लोहा के तरल अवस्था में होने से ही इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है

कि वहां का तापमान और दबाव कैसा होता होगा। इसके नीचे तरल अवस्था का खौलता

हुआ लावा है। यह लावा दरअसल पृथ्वी की सृष्टि का पहला चरण हैं।

जानकारी के लिए बता दें कि किसी कारण से सूर्य से टूटकर अलग हुआ एक टुकड़ा इतनी

दूर आ गया था। सूर्य के गुरुत्वाकर्षण की वजह से वह सूर्य से एक खास दूरी बनाकर

चक्कर काटने लगा। इस क्रम में निरंतर घर्षण और गुरुत्वाकर्षण के दबाव में वह

गोलाकार होता चला गया। बीच में इसका एक और टुकड़ा टूटकर अलग हुआ तो चांद बन

गया। लेकिन यह वैज्ञानिक सिद्धांत भी कितना सत्य है, इसे परखने का काम भी निरंतर

चल रहा है।

हमारी पृथ्वी की जांच भूकंप को समझने के लिए की गयी थी

वैसे हमारी पृथ्वी की पर्तों की जांच दरअसल भूकंप को समझने के लिए कि गयी थी।

ऑस्ट्रेलिया नेशनल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता पृथ्वी की गहराई में उत्पन्न होने वाले भूकंप

कितने समय के भीतर ऊपर तक आते हैं, इसे समझने की कोशिश कर रहे थे। इसी बात

को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने तमाम किस्म के आंकड़ों का लगातार विश्लेषण किया।

इन विश्लेषणों के आधार पर तैयार कंप्यूटर मॉडल से यह बात निकल कर सामने आयी है

कि हमारी पृथ्वी के चार नहीं पांच पर्त हैं। पृथ्वी के सबसे अंदर के खौलते लावा के ऊपर भी

शायद एक पर्त है। वैज्ञानिकों ने सबसे अंतिम पर्त से उबलकर आने वाले खौलते लावा के

ज्वालामुखी से फटकर बाहर निकलने की स्थितियों का गहराई से अध्ययन किया है। वहां

के अत्यधिक दबाव की वजह से जब उसके आवरण कहीं से टूटते हैं तो उसे पृथ्वी के सतह

तक आने के दौरान क्या कुछ होता है, इसे समझने की कोशिश की गयी है। इसी क्रम में

यह देखा गया है कि हमारी पृथ्वी के सबसे आंतरिक हिस्से से जब यह ऊर्जा बाहर आती है

तो वह अचानक से करीब 54 डिग्री के कोण में मुड़ने के बाद ऊपर आने लगती है। रास्ता

बदलने के इस आचरण की वजह से समझा जा रहा है कि वहां शायद एक और पर्त है, जो

दबाव को झेलने के क्रम में उसका रास्ता बदल देता है। वहां से जो भूकंप के झटके बाहर

आते हैं वे पृथ्वी के घूर्णन के अक्ष्य के समानांतर ही आगे बढ़ते चले जाते हैं। इस शोध से

जुड़े वैज्ञानिक डॉ जोयाने स्टीफेनसन कहते हैं कि शायद यह पर्त भी लोहे जैसा मजबूत है

इतनी अधिक ऊर्जा को कोई  मजबूत पर्त ही रोककर दिशा बदल सकता है

जिसे तोड़ने के दौरान ही ऊर्जा अपना रास्ता बदल लेती है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि

वर्तमान में यह एक पहेली के जैसी ही है लेकिन नये तथ्यों के आधार पर इस पहेली को भी

शीघ्र ही सुलझा लिया जा सकेगा। उनके मुताबिक अगर वहां कोई अतिरिक्त और मजबूत

पर्त नहीं होती तो भूकंप के झटके सीधे ऊपर की तरफ आते। लेकिन वास्तव में भूकंप

नापने के यंत्र ऐसा कोई संकेत नहीं देते हैं कि वे सीधे ऊपर की तरफ आती हैं। महिला

वैज्ञानिक ने कहा कि शायद यह पर्त भी लोहा के जैसा मजबूत है और आसानी से ऊर्जा को

बाहर आने से रोकता रहता है। इस बारे में काफी अरसा पहले भी एक वैज्ञानिक सोच

विकसित हुई थी लेकिन उस वक्त इतने उन्नत किस्म के आंकड़े उपलब्ध नहीं थे। डॉ

जोयाने स्टीफेनसन कहती हैं कि अगर यह वाकई सच बात निकली तो हमें अपने विज्ञान

की पुस्तकों को नये सिरे से लिखने की भी आवश्यकता होगी।

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