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इंसानी फेफड़ों में नये किस्म का फंगस दे रहा है कोरोना वायरस




  • जमीन और पौधे में होता है यह फंगस

  • प्रारंभिक शोध में इसके हाईब्रिड होने की पुष्टि

  • आम फंगस से तीन गुणा अधिक शक्तिशाली है

  • प्रारंभिक जांच में मरीजों के नमूनों की गहन जांच हुई

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः इंसानी फेफड़ों के अंदर कोरोना वायरस की वजह से नये किस्म का फंगस पैदा

हो रहा है। अब मरीजों का मौत का आंकड़ा तेजी से ऊपर जाने के दौरान ही शोधकर्ताओं ने

इसे खोल निकाला है। अब इस फंगस के बारे में नये सिरे से शोध प्रारंभ किया जा चुका है।

फंगस के बारे में प्रारंभिक शोध के संबंध में पहली बार यह जानकारी सामने आयी है।

दरअसल जिस किस्म का वायरस इंसानों की मौत के बाद उनके फेफड़ों में पाया जा रहा है,

वह एस्परागिलोइसिस श्रेणी का है। आम तौर पर यह फंगस मिट्टी और पौधों पर ही पाया

जाता है। पहली बार इन्हें किसी अस्पताल के अंदर इस अवस्था में पाया गया है। इससे

कोरोना संक्रमण के स्वरुप के बारे में बिल्कुल नई जानकारी मिली है।

जिस फंगज की पहचान हुई है, उसके बारे में शोधकर्ताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि यह

हाईब्रिड श्रेणी का है, यानी इसे भी कृत्रिम तरीके से संशोधित किया गया है। आम

स्परागिलोइसिस फंगस के मुकाबले इसकी प्रतिरोधक क्षमता भी तीन गुणा विकसित है।

इस खास ताकत की वजह से आम दवाइयों का इस पर कोई असर नहीं होता है।

इंसानी फेफड़ों में यह क्यों आया, इसकी जांच जारी है

जर्मनी के वैज्ञानिक गुस्तावो हेनरिक गोल्डमैन, साओ पाओलो विश्वविद्याल, ब्राजिल के

प्रोफसर और अमेरिका के वैंडरविल्ट विश्वविद्यालय के अध्यापक सह वैज्ञानिक एंटोनिस

रोकास इस बारे में ताल मेल बैठाकर आगे का शोध कर रहे हैं। इनलोगों ने मरीजों के

फेफड़ों से इस फंगस के नमूने एकत्रित किये हैं। अब उन फंगसों की संरचना का एक एक

कर विश्लेषण किया जा रहा है। इस शोध का असली मकसद लोगों को इस वायरस के

हमले से बचने और अन्य संक्रमण से बचाव के रास्तों के बारे में नई पद्धति का विकास

करना है। इसके बारे में एक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में शोध प्रबंध प्रकाशित भी हो चुका है।

वैज्ञानिक अपनी प्रारंभिक शोध के आंकड़ों की वजह से ही इस कोरोना वायरस से उपज रहे

फंगज की स्थिति को देखकर काफी चौकन्ने हैं। उनलोगों ने साफ कर दिया है कि आम

तौर पर एस्परागिलोइसिस श्रेणी का फंगस फूमिंगाटूस की वजह से पैदा होता है। इंसानों में

भी यह फंगस पहले भी पाये जाने के वैज्ञानिक रिकार्ड मौजूद हैं। लेकिन वैसे लोगों में यह

वायरस सिर्फ जेनेटिक बीमारियों की वजह से पैदा होता था। आम तौर पर इंसानों तक यह

फंगस पहुंचता ही नहीं है। शोध में पाया गया कि दस में से छह ऐसे नमूने खोजे गये,

जिनके बारे में पहले कभी इंसानों के प्रभावित नहीं होने की जानकारी नहीं मिली थी। इस

वजह से इसकी संरचना को देखते हुए ही इसे हाईब्रिड का फंगस करार दिया गया है।

तमाम नमूनों के कड़ी से कड़ी को जोड़ने की कवायद

अब मरे हुए मरीजों के जिनोम के विश्लेषणों से इसकी कड़ी को जोड़ने की कोशिश हो रही

है। अब तक चार अलग अलग किस्म की पहचान को रेखांकित किया गया है। यह सारे

मरीज यूरोप के हैं और जिनोम के विश्लेषण के माध्यम से उनकी संरचना में समानता की

पहचान करने का प्रयास जारी है। इसके पता चलने से यह स्पष्ट हो जाएगा कि दरअसल

कोरोना वायरस किस तरीके से फेफड़ों में ऑक्सीजन के प्रवाह को रोकते हुए मरीजों को

मौत के करीब पहुंचा रहा है। जैसे जैसे यह फंगस फेफडों के अंदर बढ़ते जाते हैं, वैसे वैसे

मरीज के सांस लेने की क्षमता कम होती चली जाती है। इसी वजह से गंभीर किस्म के

रोगियों को ऑक्सीजन और वेंटीलेटर की जरूरत पड़ती है। इस फंगस के बनने में प्रमुख

भूमिका ए फूमिंगाटूस की होती है। यह फूमिंगाटूस अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी खुद

को जिंदा रख लेता है। यहां तक कि यह सत्तर डिग्री तापमान भी झेल सकता है और कुछ

नहीं होने की स्थिति में वह सिर्फ पानी से ही अपने लिए पुष्टि हासिल कर जीवित रहता है।

इंसानी शरीर के अंदर उसके पनपने लायक सारे गुण विद्यामान होते हैं लेकिन यह आम

तौर पर इंसानों तक नहीं पहुंचने वाला फंगस है। फिर भी यह इंसान के फेफड़ों तक कैसे

पहुंच रहा है, इस गुत्थी के सुलझ जाने से कोरोना के संबंध में फैली भ्रांतियों में से ढेर सारी

खुद ब खुद दूर हो जाएंगी।


 



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2 Comments

  1. […] इंसानी फेफड़ों में नये किस्म का फंगस द… जमीन और पौधे में होता है यह फंगस प्रारंभिक शोध में इसके हाईब्रिड होने की पुष्टि आम … […]

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