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आधुनिक पृथ्वी के लिए सबसे अजीब संयोग लेकर आ रहा है यह धूमकेतु

  • छह हजार साल में सिर्फ एक बार नजर आता है

  • वर्तमान प्रजाति के इंसान पहली बार इसे देख पायेंगे

  • गत तीन जुलाई से इस पर लगी है वैज्ञानिक नजर

  • 22 और 23 की रात उत्तर पूर्वी छोर पर दिखेगा

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः आधुनिक पृथ्वी के नजर आने के लिहाज से यह पहली घटना है। ऐसा इसलिए

है कि आधुनिक सभ्यता के संबंध में तो ऐतिहासिक तथ्य और पौराणिक साक्ष्य हैं, वे पांच

हजार वर्ष के हैं। इसी वजह से यह माना जा सकता है कि यह धूमकेतु पहली बार आधुनिक

पृथ्वी में रहने वालों को नजर आने वाला है। यह धूमकेतु इसी माह पृथ्वी के बगल से

गुजरने वाला है। वैसे इसे सूर्य की तरफ आते देखा जा रहा है। अनेक लोगों ने खुली आंखों

से इसे देखा भी है और उसकी तस्वीरों को भी सोशल मीडिया पर शेयर किया है। अत्यंत

तेज गति से गुजरने की वजह से यह अपने आस पास के सौर कणों को गर्म करता हुआ

आगे बढ़ रहा है। इसी वजह से उसकी राह में झाड़ू जैसी रोशनी भी दिखती है। किसी भी

धूमकेतु के साथ ऐसा ही होता है। कई बार पूच्छल तारे भी ऐसे ही नजर आते हैं। जो अंधेरे

आसमान पर और भी साफ साफ नजर आते हैं।

जिस धूमकेतु की चर्चा हो रही है उसका नाम सी- 2020 एफ 3 है। इसके पृथ्वी पर इसी

माह सबसे करीब आने की वजह से ऐसा माना जा रहा है कि पृथ्वी पर अभी मौजूद इंसानों

की प्रजाति अपनी विकसित प्रजाति में वह पहली पीढ़ी होगी, जो इसे देख पायेगी। वैसे

इसके करीब आने की वजह से खगोल वैज्ञानिकों को भी इसके प्रति काफी रूचि है। पहले ही

इसकी धुरी के बारे में पता चलने की वजह से यह प्रमाणित है कि यह छह हजार वर्षों में

सिर्फ एक बार पृथ्वी के पास से होकर गुजरता है। लिहाजा यह हमलोगों के लिए भी एक

ऐतिहासिक अवसर है।

आधुनिक पृथ्वी पर मौजूद इंसान पहली बार इसे देखेंगे

तीन जुलाई को जब यह सूर्य के काफी करीब से गुजरा तब भी सूर्य से इसकी दूरी 44

मिलियन किलोमीटर थी। वैज्ञानिक यह देख पाने में सफल रहे हैं कि सूर्य के इतने करीब

से गुजरने की वजह से इस उल्कापिंड के बाहरी आवरणों पर उसका प्रभाव पड़ा है। उसकी

ऊपरी सतह के जल जाने की वजह से उसकी राह में धूलकणों का अंबार खड़ा हो गया है।

साथ ही इस भीषण ताप के प्रभाव में आने की वजह से उसके अंदर से गैसों का गुबार भी

रास्ते में छूट गयी है। जिन्हें देखा जा सकता है। अब अपनी धुरी पर चलते हुए यह पृथ्वी

पर अगले सप्ताह से नजर आने वाला है। यह उत्तर पूर्वी आसमान पर दस डिग्री ऊपर से

गुजरता हुआ नजर आयेगा। अपने आकार और गति की वजह से यह रात के अंधेरे में साफ

साफ दिखाई भी देगा। इसके नजर आने का क्रम अगस्त माह तक जारी रहेगा। उसके बाद

यह फिर से अपने छह हजार वर्ष की परिक्रमा पर आगे निकल जाएगा। इस दरम्यान यह

पृथ्वी के सबसे करीब आगामी 22 और 23 जुलाई के बीच होगा। उस वक्त उसकी दूरी पृथ्वी

से करीब एक सौ मिलियन किलोमीटर होगी।

इतने दिनों बाद दिखना अपने आप में ऐतिहासिक घटना

उसकी गतिविधियों पर नजर रखने वाले वैज्ञानिकों ने बताया है कि यह गत तीन जुलाई

को सूर्य के सबसे करीब था। इसपर नजर रखने के लिए नियमर अर्थ ऑब्जेक्ट फील्ड

इंफ्रारेड एक्सप्लोरर के टेलीस्कोप का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। वैज्ञानिकों ने इसे

आगे आते हुए तो गत 27 मार्च को ही देख लिया था। उसके तुरंत बाद यह गणना की गयी

थी कि यह पृथ्वी के कितने करीब से गुजर सकता है। दरअसल इस किस्म के धूमकेतु का

पृथ्वी के काफी करीब गुजरने का भी पृथ्वी पर असर पड़ता है। कई बार करीब से गुजरते

हुए उल्कापिंड भी अचानक पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में आकर पृथ्वी की तरफ खींचे

चले आते हैं। इनदिनों वैसे भी उल्कापिंडों का पृथ्वी के करीब से गुजरने का एक सिलसिला

सा चल रहा है।

इसपर नजर रखने वाले नासा के दल के प्रमुख और नासा जेट प्रोपल्सन लैब के डिप्टी

प्रिंसिपल जोसेफ मासेरिओ ने कहा कि टेलीस्कोप के आंकड़ों के आधार पर यह माना जा

सकता है कि यह धूमकेतु आकार में करीब पांच किलोमीटर चौड़ा है। उस पर मौजूद अन्य

निशान यह बता रहे हैं कि यह करीब 4.6 बिलियन वर्ष पूर्व के धूलकणों से घिरा हुआ है।

इस लिहाज से इसे काफी प्राचीन माना जा सकता है। इसके माध्यम से भी वैज्ञानिक

प्राचीन सौर जगत और उसके विकास के बारे में और जानकारी एकत्रित करना चाहते हैं।


 

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