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अस्सी हजार साल में एक बार नजर आता है यह धूमकेतु




  • साल के अंत में नजर आकर आगे बढ़ जाएगा
  • सूर्यास्त के बाद कुछ देर के लिए दिखेगा
  • सूर्य की तरफ से आकर उधर ही लौटेगा
  • दक्षिण पश्चिमी आसमान पर दिखेगा
राष्ट्रीय खबर

रांचीः अस्सी हजार साल में एक बार अपनी धुरी पर चलता हुआ यह पृथ्वी के करीब आता है। उसकी धुरी की गणना कर लेने के बाद ही खगोल वैज्ञानिकों ने यह बताया है। लियोनार्ड नाम का यह धूमकेतु अस्सी हजार वर्ष पूर्व इसी रास्ते से गुजरा था।




इस बार फिर वह आ रहा है और एक बार इस धुरी से आगे निकल जाने के बाद वह दोबारा अस्सी हजार वर्षों के बाद ही नजर आयेगा। तब तक की दुनिया कैसी होगी, इस बारे में अभी कुछ कह पाना संभव नहीं है। लिओनार्ड को अगले शुक्रवार से रविवार तक धरती से आसमान पर चमकते हुए देखा जा सकेगा।

यह हम जानते हैं कि इन खगोलीय पिंडों के तेज गति से गुजरने की वजह से आस पास के सौर कण आवेशित होकर चमकने लगते हैं।

अस्सी हजार साल की गणना उसकी धुरी पर आधारित

इस वजह से उनके पीछे एक पूछल्ला चमकने वाला हिस्सा बन जाता है। हम पहले भी हैली धूमकेतु के अलावा कई अन्य धुमकेतुओं के पृथ्वी के करीब से गुजरने के वक्त ऐसा देख चुके हैं। लिओनार्ड धूमकेतु गत 12 दिसंबर को पृथ्वी के सबसे करीब था। उस वक्त यह खगोलीय पिंड धरती से करीब 21 मिलियन मील की दूरी पर था।

उस वक्त वह शुक्र ग्रह और मरकरी ग्रह के पीछे नजर आया था। अब उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध पर लोगों को यह और साफ नजर आने वाला है। सूर्य की तरफ से आने वाले इस धूमकेतु को सबसे पहले ग्रेग लिओनार्ड ने खोजा था।




इसी वजह से इसका नामकरण भी लिओनार्ड हुआ है। एरिजोआना विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ लिओनार्ड की इस खोज के बाद से ही खगोल दूरबीनों से लगातार उस पर नजर रखी जा रही है।

इसकी तमाम गतिविधियों पर नजर है वैज्ञानिकों की

अब बताया जा रहा है कि यह धीरे धीरे पृथ्वी से दूर जाते वक्त सूर्यास्त के ठीक बाद दक्षिण पश्चिमी आसान पर अपना पूछल्ला छोड़ता हुआ नजर आयेगा। अपनी धुरी पर आगे बढ़ता हुआ यह धूमकेतु सूर्य की तरफ बढ़ जाएगा और आगामी 3 जनवरी को वह सूर्य से करीब 56 मिलियन मील की दूरी पर होगा।

उसका भविष्य क्या होगा, इस बारे में भी वैज्ञानिक दो राय रखते हैं। पहले वर्ग का मानना है कि यह पहले की तरह अपनी धुरी पर आगे बढ़ जाएगा। दूसरे समूह के वैज्ञानिक मानते हैं कि यह आगे चलकर विभिन्न गुरुत्वाकर्षणों की वजह से पूरी तरह विखंडित होकर आसमान में बिखर जाएगा।

आम लोगों के लिए आसमान पर इसकी पूंछ नजर आती है तो तेज रोशनी फैलाती है। दूसरी तरफ वैज्ञानिक इसकी रासायनिक संरचना को समझते हैं ताकि इस ब्रह्मांड की रचना कैसे हुई है, उस बारे में और अधिक जानकारी मिल सके।



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