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165 साल बाद ऐसा संयोग, पितृपक्ष के 1 महीने बाद आएगी नवरात्र

रांचीः 165 साल बाद फिर से ऐसा संयोग आया है कि इस बार पितृपक्ष के तुरंत बाद

नवरात्रि प्रारंभ नहीं होगी। हर साल पितृ पक्ष के समापन के अगले दिन से नवरात्र का

आरंभ हो जाता है और घट स्थापना के साथ 9 दिनों तक नवरात्र की पूजा होती है। यानी

पितृ अमावस्या के अगले दिन से प्रतिपदा के साथ शारदीय नवरात्र का आरंभ हो जाता है

जो कि इस साल नहीं होगा। इस बार श्राद्ध पक्ष समाप्तद होते ही अधिकमास लग जाएगा।

अधिकमास लगने से नवरात्र और पितृपक्ष के बीच एक महीने का अंतर आ जाएगा।

आश्विन मास में मलमास लगना और एक महीने के अंतर पर दुर्गा पूजा आरंभ होना ऐसा

संयोग करीब 165 साल बाद होने जा रहा है। लीप वर्ष होने के कारण ऐसा हो रहा है।

इसलिए इस बार चातुर्मास जो हमेशा चार महीने का होता है, इस बार पांच महीने का

होगा। ज्योतिष की मानें तो 160 साल बाद लीप ईयर और अधिकमास दोनों ही एक साल

में हो रहे हैं। चातुर्मास लगने से विवाह, मुंडन, कर्ण छेदन जैसे मांगलिक कार्य नहीं होंगे।

इस काल में पूजन पाठ, व्रत उपवास और साधना का विशेष महत्व होता है। इस दौरान देव

सोये होते हैं। देवउठनी एकादशी के बाद ही देव जागृत होते हैं। इस साल 17 सितंबर 2020

को श्राद्ध खत्म होंगे। इसके अगले दिन अधिकमास शुरू हो जाएगा, जो 16 अक्टूबर तक

चलेगा। इसके बाद 17 अक्टूबर से नवरात्रि व्रत रखे जाएंगे।

165 साल बाद आया है यह अधिक मास का अवसर

इसके बाद 25 नवंबर को देवउठनी एकादशी होगी। जिसके साथ ही चातुर्मास समाप्त

होंगे। इसके बाद ही शुभ कार्य जैसे विवाह, मुंडन आदि शुरू होंगे। पंचांग के अनुसार इस

साल आश्विन माह का अधिकमास होगा। यानी दो आश्विन मास होंगे। आश्विन मास में

श्राद्ध और नवरात्रि, दशहरा जैसे त्योहार होते हैं। अधिकमास लगने के कारण इस बार

दशहरा 26 अक्टूबर 2020 को दीपावली भी काफी बाद में 14 नवंबर 2020 को मनाई

जाएगी।

क्या होता है अधिक मास

एक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, जबकि एक चंद्र वर्ष 354 दिनों का

माना जाता है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है। ये अंतर हर तीन वर्ष

में लगभग एक माह के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को दूर करने के लिए हर तीन साल

में एक चंद्र मास अतिरिक्त आता है, जिसे अतिरिक्त होने की वजह से अधिकमास का

नाम दिया गया है। अधिकमास को कुछ स्थाानों पर मलमास भी कहते हैं। दरअसल

इसकी वजह यह है कि इस पूरे महीने में शुभ कार्य वर्जित होते हैं। इस पूरे माह में सूर्य

संक्रांति न होने के कारण यह महीना मलिन मान लिया जाता है। इस कारण लोग इसे

मलमास भी कहते हैं। मलमास में विवाह, मुंडन, गृहप्रवेश जैसे कोई भी शुभ कार्य नहीं

किए जाते हैं। पौराणिक मान्यनताओं में बताया गया है कि मलिनमास होने के कारण

कोई भी देवता इस माह में अपनी पूजा नहीं करवाना चाहते थे और कोई भी इस माह के

देवता नहीं बनना चाहते थे, तब मलमास ने स्वचयं श्रीहरि से उन्हेंय स्वी कार करने का

निवेदन किया। तब श्री हरि ने इस महीने को अपना नाम दिया पुरुषोत्त म। तब से इस

महीने को पुरुषोत्ताम मास भी कहा जाता है। इस महीने में भागवत कथा सुनने और

प्रवचन सुनने का विशेष महत्व‍ माना गया है। साथ ही दान पुण्य करने से आपके लिए

मोक्ष के द्वार खुलते हैं।

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