fbpx Press "Enter" to skip to content

यह बैक्टेरिया एक साल तक अंतरिक्ष में जीवित रहा है

  • विकिरण और अल्प गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव

  • आइएसएस में मांस के डब्बे में था बैक्टेरिया

  • उसके वहां जिंदा बचने की कोई उम्मीद नहीं थी

  • अब उसके माध्यम से ही अंतरिक्ष अभियान की तैयारी

रांचीः यह बैक्टेरिया नये किस्म का रिकार्ड कायम करने में सफल रहा है। आम तौर पर

पहले की धारणा थी कि अंतरिक्ष की गुरुत्वाकर्षण रहित परिस्थिति में कोई जीवन बचा

नहीं रह सकता है। इसके अलावा अंतरिक्ष में विकिरण का प्रभाव भी जीवन पर घातक

प्रभाव डालता है। लेकिन यह बैक्टेरिया इस वैज्ञानिक सोच को गलत साबित करने वाला

प्रमाणित हुआ है। इससे पहले अंतरिक्ष में एक साल जीवन बीताने वाले अंतरिक्ष यात्री

स्कॉट केली के शरीर पर पड़े प्रभावों की वजह से वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में जीवन के ऐसे

निष्कर्ष निकाले थे। अंतरिक्ष से लौटने के बाद यह पाया गया था कि उस अमेरिकी

अंतरिक्ष यात्री का डीएनए और हड्डियों का ढांचा काफी हद तक बदल गया था। वह वर्ष

2015 में अंतरिक्ष प्रवास पर गये थे। यहां तक कि लौट आने के बाद उनके पैर अगले तीन

महीने तक सूजे हुए थे। लेकिन यह बैक्टेरिया उन सारे सिद्धांतों को गलत प्रमाणित कर

गया। अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन पर बैक्टेरिया के होने का पता चलने के बाद ही उस पर

नजर रखी जा रही थी। वहां भेजे गये मांस भरे एक डब्बा में यह बैक्टिरिया पाया गया था।

इस बैक्टेरिया को डेइनोकोकूस रेडियोडूरांस कहते हैं। इस बैक्टेरिया के पाये जाने के बाद

पहले तो यही समझा गया था कि अंतरिक्ष में जीवन की संभावनाएं नहीं होने की वजह से

बैक्टेरिया के जिंदा रहने की उम्मीद नहीं है। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन के बाहरी

हिस्से में यह बैक्टेरिया अब तक जिंदा रहा है। अब इस बैक्टेरिया के जिंदा रहने की पुष्टि

होने के बाद वैज्ञानिक नये सिरे से सारे मामलों की जांच कर रहे हैं।

यह बैक्टेरिया जीवित रह पायेगा इसकी उम्मीद नहीं थी

इस बैक्टेरिया के जीवित पाये जाने के बाद भी उसमें भी कई किस्म के बदलाव आ चुके थे।

लगातार अंतरिक्ष के विकिरण के प्रभाव का असर उस पर भी देखा गया था। जहां पर यह

सुक्ष्माणु थे, वहां पर एक खिड़की से रोशनी आती थी। लेकिन उस खिड़की से 190

नैनोमीटर से कम की अल्ट्रा वॉयोलेट किरणें अंदर नहीं आती थी। इस बात का पता चलने

के बाद वैज्ञानिकों ने नये सिरे से प्रयोगशाला में भी वैसी ही परिस्थिति ने पैदा की है। इस

परिस्थिति को दोहराने के लिए शोधकर्ताओँ ने उसी तरह का माहौल भी बनाया था, जिसमें

एक सिलिकॉन डाईऑक्साइड की परत वाली खिड़की भी थी। यहां पर इस बैक्टेरिया के

समूहों की तीन साल तक रखा गया था। यहां पर भी बैक्टेरिया जीवित रहने में कामयाब

रहा है। इस विषम परिस्थितियों से सामान्य माहौल में लाये जाने की बाद जब उनकी जांच

की गयी तो पाया गया कि विकिरण और न्यूनतम गुरुत्वाकर्षण का कुप्रभाव उन पर पड़ा

है। इसके बाद भी वे जीवित रहने में कामयाब रहे हैं। उनके शरीर के अंदर भी काफी कुछ

बदलाव आया था। अब इनके शरीर के ऊपरी पर्त पर मौजूद प्रोटिन की गहन जांच हो रही

है ताकि यह पता चल सके कि किन कारणों से असंभव सा दिखने वाला यह काम भी हो

पाया है। इसके पीछे निश्चित तौर पर इस बैक्टेरिया के अंदर की ही संरचना है, जिसकी

पहचान वैज्ञानिक करना चाहते हैं।

लंबी अंतरिक्ष यात्रा की तरकीब इससे निकालना चाहते हैं वैज्ञानिक

इस अनुसंधान के जरिए भी वैज्ञानिक महाकाश में लंबी दूरी तय करने के दौरान अंतरिक्ष

यात्रियों की सुविधा के लिए हर संभव उपाय करना चाहते हैं। इससे महाकाश में काफी दूर

तक बिना किसी नुकसान के सफर करना और आसान हो जाएगा। वर्तमान में इंसान सिर्फ

चांद तक ही पहुंच पाया है। वैसे इंसान के बनाये अंतरिक्ष यान बहुत दूर तक पहुंच चुके हैं।

दरअसल पृथ्वी से बाहर जीवन किन परिस्थितियों में जिंदा रह सकती है, उसके गुण और

दोष की पहचान की जा रही है। इस बैक्टेरिया की संरचना के माध्यम से इंसान को भी

अंतरिक्ष की कठिन परिस्थितियों में जिंदा रखने की तकनीक जानने के लिए ही यह सारी

कवायद चल रही है।


 

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
More from HomeMore posts in Home »
More from जेनेटिक्सMore posts in जेनेटिक्स »
More from ताजा समाचारMore posts in ताजा समाचार »
More from प्रोद्योगिकीMore posts in प्रोद्योगिकी »
More from शिक्षाMore posts in शिक्षा »

One Comment

Leave a Reply

... ... ...
%d bloggers like this: